दर्द क्या है....
दर्द श्वेत है, दर्द श्याम है,
दर्द क्या है !
कहीं ढली हुई शाम है,
तो कहीं भीगी हुई रात है
कहीं टूटी हुई ख़ाब है
तो कहीं बीती हुई बात है...
कहीं खामोशी के दौर है
तो कहीं आंसूओं के तैर है
दर्द क्या है?
कहीं खोई हुई धूप है
तो कहीं बारिशों की रूप है
दर्द क्या है
कहीं कांप उठे होंठ है
तो कहीं टूटी हुई साँस है
रूप अनेक, रंग अनेक
मगर जैसे एहसास एक है
शायद यही दर्द के
रिश्तों के एक ही पहचान है....
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