Monday, 14 July 2025

एक संदेश तुम्हारे नाम पर

ये मेरे नज्म निगार, 
क्या कहूँ तुम्हें आज...
क्या संदेश लिखूं तुम्हारे नाम पर 
ये मेरे नज्म निगार...

ये कुछ नज्म के दस्तावेज नहीं 
ये जैसे लहू के एक सागर 
ये नज्म तुम्हारे कलाम से 
काग़ज़ तक बहती नदी नहीं 
ये तुम्हारे अंदर से निकला हुआ 
लहू का एक धार  ..

ये मेरे नज्म निगार, 
क्या कहूँ तुम से आज 
क्या संदेश लिखूं तुम्हारे नाम पर 
ये मेरे नज्म निगार 

आसमान से टयकता हुआ आँसू 
हैं ये, दर्द से पिघलता हुआ चट्टान 
बादल से घिरे हुए ग़ज़ले है ये 
अश्कों से सजा हुआ शान 
ये एक नज्म के गुलदस्ता नहीं 
ये किसी दरिया से उठा हुआ तूफान...

ये मेरे नज्म निगार 
क्या कहूँ आज तुम से 
क्या संदेश लिखूं तुम्हारे नाम पर 
ये मेरे नज्म निगार...

ये हीर के लहू से लतपत दास्तान है 
ये  रान्झा का खोया हुआ प्यार 
ये एक लैला नहीं हजारों लैलाओं के चीख 
सैकड़ों मजनूँओ के पुकार...

ये मेरे नज्म निगार 
क्या कहूँ आज तुम से 
क्या संदेश लिखूं तुम्हारे नाम पर 
ये मेरे नज्म निगार...

ये कोई कवि की कल्पना नहीं,
शायद  ये किसी मासूम दिल 
की छलती हुई धड़कने या 
बिखरती हुई श्रींगार...
ये तुम्हारे कलाम से बहती हुई केवल
 एक नदी  की धार नहीं 
ये शायद अंधेरे से मिटने से पहले 
जलती हुई दिया की आखिर लौ की
  बुझ न जाने की 
ना काम कोशिश की पुकार 

ये मेरे नज्म निगार 
क्या कहूँ तुम से आज 
क्या संदेश लिखूं तुम्हारे नाम पर 
ये मेरे नज्म निगार...
ये मेरे नज्म निगार....

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