Sunday, 30 November 2025

रु के लिए एक पैगाम

पता नही आज अचानक बहुत रोना आ गया फिर.... वजह तो मुझे भी नहीं पता.  लगा जैसे बहुत रोने से कुछ अच्छा हो जाएगा. कितनी अजीब इत्तफाक है, यह नमक  में  कोई खुदाई जरूर  होगी, यह हमारे आंसू में भी है और समुंदर मैं भी, जरूर दोनों के बीच कोई गहरा ताल्लुक होगा.....
अगर मरने से पहले आप से कभी मुलाकात हो गया, तो मुझे जरूर जी भरकर रोने का इजाजत दे देना, शायद इस से मन हल्का हो जा जाए और मैं फिर समुंदर की तरह जीना सीख जाऊँ....
शायद आज जिंदगी से कोई शिकायत नहीं है मुझे, जो थोड़ा रोना आ गया...पता है, जिंदगी में ऐसे बहुत कम वक़्त आते हैं जब कोई रोना चाहे और रो पाए..यह  रू के लिए एक संदेश है, उसे जरूर बताना...
 उस से  यह कह देना, "अरे पगली, क्यूँ परेशान हो रही हो, क्य़ा खोने को डर रही हो, तुम्हारे पास जो कुछ है, वे सब तुम्हारा ही है,  💯 ". पिछले बार जब वह बहुत परेशान थीं, मन करता था,  उसे समझा दूँ, "अरे पगली, हम तुम्हें कैसे समझाए, जो शख्स को हम जानते थे, तुम्हारे साथ उनकी कोई ताल्लुक नहीं था, और जो आज तुम्हारा है, उस से तो हम वाकिफ भी नहीं है, वो तुम्हारा है, बिल्कुल तुम्हारा, तुम ने उस पर अपनी जिंदगी न्यौछावर कर दी है, तुम ने उन्हें घर, संसार दी है, उन को दुनिया के  सबसे अनोखा तोहफा दी है, माँ बन के  उस इंसान को तुम पिता होने का एहसास दिया है ....तुम ने उस की हर ग़म, हर खुशी, हर पल, हर मोड़ के साझेदारी निभायी है "...फिर उसे कोई कैसे तुम से ले जा सकता है.  और कुछ हो न हो यह भरोसा तुम मुझ पर बिल्कुल रख सकती हो, मैंने आजतक किसी का भरोसा नहीं तोड़ा है, यह मेरी जिंदगी की आखिरी और सबसे क़ीमती पूंजी है और इस जिंदगी के लिए यही  बहुत है...शायद किसी वजह से मैं तुम्हें यह कह न पाऊँ. हो सके तो यह तुम समझ जाना.  मेरा एक मानना है, की जो तुम खुद बनाए हो, वह तुम्हारा ही रहता है, कोई उसे क्या ले जाएगा. समुंदर से लेना क्या देना क्या  ! लोग कितने अजीब उलझन से जीवन के सुन्दर पल खो देते है.  किसी ने सच  ही कहा है, 
"मैं कल को तलाशते रहा, 
और शाम होते होते मेरा आज डूब गया "

आज जो तुम हो, जो कुछ तुम्हारे पास है, साथ है, उस का कद्र करो और हर पल को जितना हो सके जियो, कोई नहीं जानता , जिंदगी में यह जो " है " कब " था " में बदल जाता है. मेरी  छोटी-सी यह  जिंदगी  में एक मामूली समझ है, यह जीवन एक स्रोत है, कौन जाने कौन सी अनंत काल से अपने आप बहती जा रही है, जीवन का अंतिम लक्ष्य है अकेलापन से एकांत तक रास्ता तय करना, वह जितनी सफाई  से हो, जितनी गहराई से हो, उतना अच्छा है औऱ यह हम जैसे इंसानों को जितना जल्दी समझ आ जाए उतना अच्छा है. "

कितनी बड़ी सीख है.....  मेरी गुजारिश है दोबारा वह गलती कोई और न करें.  मेरे तरफ से उस से थोड़ा प्यार दे देना और समझा देना जो आज हमारे पास हैं उस के लिए खुदा के शुक्र करें और मेरी उमर उस से लग जाए.  पहले से जिंदगी तुम से बहुत कुछ ले चुकी है, बाकी जो कुछ है, वे सलामत रहें...मुझे कभी कुछ खोने का डर था ही नहीं, देता वह खुदा ही, ले तो वही सकता है.  इंसान इंसान को क्या दे सकता न ले सकता है....आजतक दुनिया में ऐसे रईस इंसान पैदा हुआ ही नहीं कि जो उसके  सारे जायदाद के बदले बीती हुई  एक पल भी खरीद सके.....  और आप और हम तो साधारण इंसान है, हम क्या दे सकेंगे, खरीद सकेंगे....मैंने तो एक एहसास के साथ कुछ लम्हे जी लिया जो मेरे अस्तित्व का अंश है, यह कर्ण का कवच-कुंडल भी नहीं जो मैं काट के किसी को दे सकूं.  जो मेरे साँसों के  साथ साथ सहज  चलते हैं, मेरे साथ ही जायेंगे, उस से अधिक मैं क्या कहूँ....यह तो कोई दैवी आशीर्वाद है....

मजे की बात है, अगर जब आप मेरे पास थे तब भी अगर वह वहां आ जाती थीं और आप को चाहती थीं, शायद मैं खुशी खुशी आपको उन्हें सौंप देती...प्यार तो दुनिया की सबसे अनोखा तोहफा है, अगर वह कोई दे पाए, तो उस से बड़ा भाग्य क्या हो सकता है?

उस से  यह कहना मेरी तरफ से....." इतना भरोसा मैं तुम्हें दिलाती हूं तुम्हें कभी कोई तकलीफ देना न मेरा मतलब रहेगी न मकसद.  ऐसे तो तुम्हारे मेरे ऊपर बड़ा एहसान है,जिंदगी में कुछ नाजुक मोड़ में तुमने ही उनके सहारा बने, प्यार लेने का नाम नहीं, देने का, मगर तुम तभी दे पाओगे जब तुम खुद पूर्ण हो, शायद तुम ने भी कुछ हदतक वही किया है मेरे अंदाज में, तो फिर क्यूँ परेशान हो? "

तुम्हारी उलझन, तुम्हारे परेशानी मुझे ताज्जुब तो नहीं किया था,  यह दुनिया की बहुत पहचानी सी दस्तूर है, कोई नया नहीं  है, फिर भी थोड़ा निराश तो ज़रूर हुई होगी मैं, क्योंकि  मेरा कुछ अलग  नजरिए रहे जिंदगी के तरफ, शायद कुछ थोड़ी देर लिए भी हो मैंने यह तुमसे उम्मीद कर ली होगी  की तुम शायद मेरी नजरिए से देख भी पाओगे, अंदर एक आवाज भी आई की, .....काश तुम मुझे समझ पाते, काश मैं तुम्हें समझा पाती....
खैर कोई बात नहीं, आज नहीं तो कल, इस जहां में नहीं तो कोई और जहां में शायद तुम यह समझ जाओगे.  तब तक के लिए यही दुआ है, कि तुम महफूज रहो, तुम्हारे सुन्दर दुनिया सलामत रहे, तुम्हारे हर ख़ाब पूरी हो जाए, और जो ख़ाब पूरी ना हो वह ख़ाब तुम्हें कभी न आए. "

खुदा हाफिज....


Saturday, 22 November 2025

तलाश

 मैंने तसव्वुर में एक तस्वीर खिंचा था 
आज आईने में झांकी तो दिखाई न दिया ....

जिंदगी जैसे अब धुंधली हो गई है 
अब सन्नाटे में वह ढूंढ रही है 
वह तस्वीर, वह तसव्वुर को 
वह बेमिसाल राह और बेजुबान अंदाज को...

आज बैठे बैठे माजी को परख रहा हूँ 
वह रास्ते जहाँ पर भटक गया था 
उसी राह को तरस गया हूँ 
उसी राह को बेइंतहा तलाश रहा हूँ...

कई रास्ते एक दूसरे से टकराते थे 
समझ नहीं आया था किस और जाएं 
कौन सा गलत और कौन सी सही है....
शायद वहीँ लडखडा गया 
वहीँ यह खयाल को पत्थरों की
लकीर मान लिया होगा ,
जैसे वही अड गया,
मैं सही हूँ, 
मैं ही सही हूँ...
यही ठान लिया...

कोई और भी है, 
कोई और भी सही है 
कई रास्ता सही होते हैं 
यह खयाल ही छोड़ दिया...

और शायद वहीँ पर, उसी वक़्त
अपने आपको खो दिया
वह तसव्वुर और तस्वीर भी
वहीँ छुट गया...

चलते चलते ढेरों अजनबी मिले,
कई पानी के बुलबुले जैसे बिखर से गए 
कुछ सामने होते हुए भी नजर नहीं आए 
मगर वह एक ही तस्वीर थी 
जो बिखर जाने के बाद भी वहीँ खड़ी थी...

तलाश रहे थे  हम वह पुरानी चेहरा 
तसव्वुर से निकल के जो सच हो गया 
मन के आईने में जब जब झाँकी 
वही तस्वीर दिल की गहराई से उभर आई ....

जो साया के जैसे साथ रहती थी 
आईना की तरह सच बोलती थी 
और बेइंतहा, बेहिसाब मोहब्बत करती थी 
हमें सारे दुनियादारी से आजाद रखती थी....

जिस  के भरोसे आसमान से ऊंचे 
जिस के दिल की गहराई सागर जैसे 
जो धरती जैसी  सह भी लेती थी 
दिया की तरह हमें राह दिखलाती थी ....

कैसे, क्यूँ, कहाँ, कब हमने उसे खो दिए 
वह तस्वीर से हम जुदा हो गए....
सदियाँ बीती, सैकड़ों चेहरे आ कर मिले 
मगर वह तस्वीर या तसव्वुर से कोई ना मिले...

ये खुदा, 
तेरे दरबार में  यह  आखिरी दुआ है 
हमें आज  वही तस्वीर दे दे 
वही तसव्वुर के साथ रहने दे ....

जिस को हम पालकों पर बिठाये रखें 
तमाम उम्र उसी को ही महफ़ूज़ रखें
अब और कोई आलम नहीं
दे पाओगे  तो दे दो मुझे तस्वीर वही....

जो तस्वीर हम जिंदगी भर 
तलाशते रहे, 
दुआओं में तो वही मांगे थे 
फिर भी क्या बदनसीब हैं 
समझ ही न पाए...

Monday, 17 November 2025

कौन अच्छा और कौन बुरा है

कौन अच्छा यहां कौन बुरा है?
कौन खोटा और कौन खरा है...
थोड़ी बुराई
 तो कर्ण में भी होगी 
दुर्योधन में भी कुछ अच्छाई तो हुई होगी....

हुस्न वालों के नगर में आज यह कैसा मेला 
हर किसी के हाथ में आईना टूटा हुआ....

बेशुमार भीड़ है 
फिर भी हर शख्स यहां 
दिख रहा है बेबसी में 
क्यूँ  अकेला खडा हुआ....

जिन्दगी का यह खेल है 
दो पल का तो मेल  है 
फिर भी क्यूँ हर कोई यहां 
परेशान बेशुमार हैं....

हर कोई क्यों यहां 
जीत के दौड़ में भाग रहा है 
भूल चुका है यह खेल है 
यहाँ हार जीत में क्या ही है 

वह सिकंदर हो गया 
सच में जो बेमिसाल खेल खेला....

खुदा, सिर्फ खुदा ही गवाह यहां 
सिर्फ वही है खेल के रेफरी और 
वही करेगा आखिरी फैसला यहां....

खेल के मैदान है यह 
जीवन का यही रंग मंच...
जो समझ पाया, 
वह अपना खेल बखूबी खेल गया 
अपना किरदार बेहतर निभा गया
जो ना समझा वह जीवन भर 
शतरंज के पासा में उलझा ही रह गया...

जो हार जीत के उलझन में फंस गया 
जीवन क्या है, खेल के मैदान में वह क्यूँ आया 
यही बात भूल गया, 
वह जीत कर भी हार गया 
सिकंदर बनते बनते रह गया 
और ऐसे कोई और भी होगा 
जो खुदा के मंजर को समझ पाया 
और हंसते हंसते खेल गया....

हार कर भी जीत गया 
हार जीत के कशमकश से परे हो गया....
जो समझ गया, 
ना यह रास्ता ज्यादा खूब सूरत है 
ना मंजिल बेमिसाल है 
यह साथ चलने वाले साथी ही है 
जो वाकई सिकंदर बनाते हैं...
रास्ता कोई भी हो, 
मंज़िल मिले या नहीं 
उसके परवाह किए बैनर 
जो साथ निभाते हैं 
वही साथी जीवन के 
अनमोल तोहफे होते हैं
हर मुकद्दर के सिकंदर बना जाते हैं....

फिर क्यूँ सोचना कौन अच्छा यहां 
और कौन बुरा 
क्या खोटा और क्या खरा....
जो मुकद्दर में वह तो अता हो गया 
पाप की झील में डूबकर भी 
कोई इंसान देवता हो गया....




Thursday, 6 November 2025

जिम्मेदारी

जिंदगी ने कुछ जिम्मेदारी दी थी, 
कुछ आप के हिस्से में 
कुछ हमारे हिस्से में 
कुछ हम दोनों के हिस्से में...

कुछ जिम्मेदारी निभाए हम ने 
कुछ आप भी  निभाए होंगे, 
कुछ वक़्त ने खुद निभा लिया होगा 
और कुछ जिम्मेदारियां दुनिया के 
दस्तूर ने बदल दिया होगा ...

कुछ किस्से अभी भी गुमनाम हैं 
कुछ ज़ज्बात अभी भी बेजुबान हैं...

कुछ जिम्मेदारी अभी भी बाकी है, 
कुछ हमारे हिस्से के 
कुछ आप के हिस्से के 
कुछ फिर ज़माने या हालात के हिस्से के 
या हम दोनों के हिस्से के....

कुछ जिम्मेदारी हमारे हिस्से के 
आप ने निभाए होंगे, 
कुछ हमने भी आप के हिस्से के 
कुछ दोनों के हिस्से के 
भाग  भी कोई और भी निभा लिए होंगे ....

कुछ अखिर जिम्मेदारियां बचे हैं 
तुम्हारे और मेरे जनाजे पर शामिल होने के 
थोड़ी देर वहां ठहर जाने के 
एक दूसरे के मजार पर कुछ लम्हें 
गुजार देने के, 
कुछ दुआएं मांग लेने के....


खुदा के दुनिया के  एक  ही शर्त है ....
अपने कंधे पर कोई रो नहीं सकता 
अपने को कंधा कोई अपने आप
 दे नहीं सकता...

ये जिम्मेदारियां वह औरों के कंधे पर 
रख दिये हैं, 
अपने हिस्से में भी 
नहीं लिए हैं....

चलो जिंदगी की यह अखिर जिम्मेदारी भी 
पूरी कर लेते हैं 
एक दूसरे के जनाजे पर आने  का 
और  एक दूसरे के मजार पर 
कुछ पत्तियाँ, कुछ फूल और कुछ यादें 
बिखर देने का और कुछ दुआएं 
मांग लेने  का...

कुछ आप के हिस्से के 
कुछ हमारे हिस्से के 
और कुछ हम दोनों के हिस्से के....

तुम तुम रह गए और हम हम रह गए

कौन कहता है तुम बदल गए 
या हम बदल गए, 
या हम दोनों ही बदल गए....

गलत कौन था या गलती कहाँ हुई 
शायद गलती नहीं 
कोई गलत फहमी हो गई...

धूल चेहरे पर थी 
और तुम जिंदगी भर आईना साफ़ 
करते रहे, 
शायद वही गलत हुआ 
तुम्हें जैसे कोई गलत फ़हमी हो गई...

और हम भी क्या कम जिद्दी थे 
तुम अगर तुम रह गए 
हम भी हम ही रहें 
रत्ती भर भी बदल ना पाए...

जिंदगी भर तुम्हारे लिए 
तुमसे ही लडते रहे 
मगर तुम्हें उसके 
अंदाज भी आने न दिए....

लोग तो अपनों के लिए 
दुनिया के साथ लडते हैं 
हरदम कुछ पाने के लिए 
बैचैन रहते हैं...

कमबख्त हम ही एक थे 
जिनके ऊपर खुदा के 
यह ग़ज़ब मेहरबानी देखिए...

कमबख्त हम भी ऐसे 
ग़ालिब बन गए 
जो जिंदगी भर तुम्हारे लिए 
तुम्हारे साथ लडते रहें...

और कुछ पाने के लिए नहीं 
तुमसे जो अश्कों उधार लाए थे 
वही चुकाने के लिए....

समुंदर में एक चुटकी नमक हो के 
घुल जाने के लिए 
हम खाक हो गए...

तुम तुम ही रह गए...
         और 
हम भी अखिर हम ही रह गए....


Tuesday, 4 November 2025

मैं हूँ ना....

तुम जानना चाहते थे यही ना 
हम तुमसे प्यार करते की नहीं 
और करते तो कितना करते...

हमें बड़ी हंसी आ गई...
तुम्हारे  यह बचपना हरकत पर 
और मासूमियत अंदाज पर....

अगर " हमें तुमसे मोहब्बत है "
कह देने से मोहब्बत के ज़ज्बात 
पूरी हो जाती 
और मोहब्बत मुकम्मल हो जाती 
और मिसाल कायम कर लेती 
 तो मीरा- गिरिधर या राधा- मुरलीधर 
दिलों में नहीं बसते,
बाजार में मिलते ...

मोहब्बत में कोई कहेगा क्या 
वह तो एक एहसास है 
उसे मेहसूस कर लिया 
तो मिल गया, नहीं मेहसूस किया 
तो भ्रम में जीवन भर भटकता रहा...

प्यार में कोई कुछ लेता नहीं 
प्यार देने का ही नाम है 
मगर,  अगर यह समझ पाओगे 
तो यह जरूर देख पाओगे 
जिसे सच्चा प्यार मिला है 
वह तो धनवान हो गया
 और जिसने 
दिया वह भी बांटते बांटते कंगाल नहीं 
 और भी धनवान और महान हो गया...

प्यार कोई रीति रिवाज नहीं, 
उसका कोई साझा रंग या रूप नहीं 
वह ऐसी रंग है जो एक बार लग जाए 
वह चुनरी या तो राधा बना जाए 
या मीरा कहलाये...
प्यार तो ऐसी कोई इबादत है, 
उस पूजा के थाली में धूप, दीप नहीं रहते
उस में साँसे और रूह की आहुति होती है...

प्यार कोई चांदी या पीतल नहीं 
जो आग में जलते ही भस्म हो जाए 
यह  तो वह खरा सोना है 
जो आग में जलते जलते 
और शुद्ध हो जाए 
कभी याज्ञसेनी तो कभी 
सीता बन जाए....

फिर तुम अब क्यों पूछते हो 
हमें तुमसे सच में मोहब्बत है या नहीं...
और है  तो भी कितना है यह भी...
हम तो आर्यभट्ट के जैसे विद्वान नहीं 
शून्य कहाँ से आया और कहाँ जाएगा 
इसका गणित तो समझते नहीं 
बाएं में रहें तो शून्यता कहलाए 
दाहिने में सैकड़ों बनाए 
अगर ऊपर रहा सभी फल को मिटाए 
 एक ही शून्य ही कर जाए 
नीचे आया तो अनगिनत संख्या हो जाए....

हमें यह हिसाब किताब से क्या करना 
तुम भी उस से दूर रहना...
जब कभी कुछ मासूमियत बिखरने चाहो 
कोई हंसी बांट कर हंसना चाहो 
या कभी तुम्हें रोने को कोई 
कंधा चाहिए 
पाँव रखने को भरोसा चाहिए...
हमें बस याद कर लेना...
बेझिझक हमारे यादों के शहर में जाना...
हम हैं ना....
हमेशा की तरह....

मोहब्बत को किसी रोज साँसों में 
जोड़ कर देख लेना...
कुछ साँसे जिनके ऊपर थोड़े से
 भी हक थे हमारे,
 हम आपके लिए वही छोड़ दिए हैं 
उन्हें छोड़ आए हैं आप के लिए...

उसको जुबानी कैसे बताये कोई 
उसका क्या गिनती करे कोई...
कुछ देर हमारे साथ चलना साया की तरह 
वह खामोशी ही आप को बता ही देगी 
और वह ज़मीन से आसमान के 
तरफ  एक नजर देख लेना...
हम तुम्हें वहीँ खडे मिलेंगे 
हमेशा की तरह....
अब तो समझ आ गया होगा...
मैं हूँ ना.....
तब से अब तक, 
फिर अब से तब  तक 
मैं हूँ ना....
हमेशा की तरह....


Saturday, 1 November 2025

मथुरा से वृंदावन तक....

मैं कृष्ण हूँ, 

मथुरा के कारागार में जन्मा हूँ...
उस भादों के अंधेरे रात में 
कृष्ण पक्ष आठवीं नक्षत्र के 
रात के सन्नाटे के आठवीं प्रहर में...

हाँ , मैं वही कृष्ण हूँ...
जन्म होते ही मेरे पिता के कन्धे पर 
यमुना पार कर किसी नंद राजा के 
आँगन में पहुंचा हूँ...

हाँ मैं वही कृष्ण हूँ 
देवकी माँ के कोख से जन्मा 
यशोदा माँ के आंगन में खेला हूँ 
वहीँ पर पला बढ़ा हूँ 

लोग मुझे नटखट कहते थे 
शरारती मानते थे 
कोई ग्वाला कहा, 
कोई माखन चोर भी कह दिया...

किसीने गोपियों का सरताज़ कहा 
किसीने तो मुझे रणछोड का 
नाम भी दे दिया 
फिर किसी ने यह भी पूछ लिया 
मैं  हूँ सच  में  किसका ?
मैं देवकी माँ का आठवां पुत्र हूँ 
या यशोदा माँ की नयन का पुतला...

क्या जवाब दूँ ?
मैं सच में कौन हूँ 
किसका हूँ 
क्या मैं मथुरा का रह गया हूँ 
या वृंदावन के पास हूँ....

सच तो यह है...
मैं देवकी माँ के 
कोख से जन्मा कान्हा हूँ 
कारागार में उनके अश्कों का 
दाग हूँ, 
बेड़ियों में बंधे उनके पैरों के 
निशान हूँ, 
उनके पीड़ा के साझेदार हूँ...

उतना ही मैं यशोदा माँ की भी रुणी हूँ 
उनके आँखों के सपनों में रहा हूँ...

कैसे कहूँ मेरे लिए कौन बड़ा है 
कौन छोटा, 
कौन कम है  कौन ज्यादा...
यह न ही सम्पत्ति है  मेरा 
ना कोई जायदाद के पिटारा...

यह कैसे किस किस मैं बंटवारा होगा?
कोई नौ महीने के कोख दिए 
बेड़ियों के बोझ उठाते उठाते 
मुझे धरती पर जन्म दिए...

फिर किसी ने मुझे 
सिर्फ़ उसके आंगन नहीं 
दिल में ही बसा लिए 
आँखों से ओझल हुए 
तो अश्कों से नाह लिए...

अब तुम्हीं बताओ दुनिया वाले!
मैं कृष्ण, तुम्हें क्या उत्तर दूँ 
मैं किसका था या किसका हूँ 
किस का रुणी था या किसका रूणी हूँ...

शायद मैं सदियों से वहीँ था, वहीँ हूँ 
वही कृष्ण था, वही कृष्ण हूँ 
जितना मैं देवकी माँ का था 
उतना ही यशोदा माँ का हूँ...

यह तो विधि के विधान है 
कभी वह मथुरा के कारागार के 
बंद कोठरी में 
देवकी होते हैं 
तो कभी नंद की गाँव में 
यशो माता कहलाते है...

मैं कृष्ण हूँ 
शायद कभी विधाता के हाथ से 
देवकी के कोख से जन्म लिया था 
तो कभी यशोदा के आंगन में 
पला बढ़ा हूँ....

ये दुनिया वाले, 
मैं तुम्हें क्या उत्तर दूँ,
कैसे समझाऊं
समझ पाओगे तो आभार है 
ना भी समझो तो कोई बात नही है...


मैं वह खुश नसीब इंसान हूँ...
जो देवकी की कोख भी देखा 
और यशोदा के गोद में भी खेला 
कहीं माधव कहलाया 
तो कहीं गिरिधर हो गया...

यहां कोई बड़ा नहीं होता 
ना ही कोई छोटा 
कान्हा तो भाग्य से  कभी 
देवकी के हुए तो यशोदा के 
कहलाये ....

मगर कर्म से वह शुद्ध हो गए...
देवकी और यशोदा...दोनों में लिन हो गए 
कान्हा से कृष्ण हो गए 
और दोनों जहां से परे हो गए....