Saturday, 1 November 2025

क्यों ढूंढ़ते हो ???

यह इंसान भी क्या ग़ज़ब चीज है 
जो खुशबू उसकी साँसों में बसी है 
उसे ऊपर, नीचे, 
अंदर, बाहर ढूंढता रहता है ....

जो यह समझ गया, 
वह समझदार हो गया, 
जो नहीं समझा, 
वह उम्र भर नासमझ रह गया...

कभी जिसे पालकों पर 
बिठाये रखता था, 
उसे फिर  रुखसत  कर दिया 
अपने अश्कों से,अपने पलकों से 
और उम्र भर दरबदर 
उसको ही ढूंढता रह गया...

एक अजीब मंजर की है यह जिंदगी 
ना सुकून से मुलाकात हुआ 
ना मंजिल से बात कर पाया 
ना रास्ते अपने हुए 
ना सफर भी साथ रहे ....

जो बहार कभी  रख लिए थे 
धडकनों के जेब मैं, 
उसे   ताउम्र ढूँढते रहें 
कभी कारोबारी दोपहर में 
तो कभी बदमिजाज शाम में....

अब यहां किसी के लिए 
कौन सोचता है जनाब 
ना फुर्सत किसी के लिए
किसीके पास है ! ....

अब दुआओं के बरकत 
कौन मांगता है 
किसी अजीज दोस्त के लिए,
कौन देता है 
नसिहतें या हिदायतें 
आज  यहां कोई अपना किसी के लिए...

अब कहाँ  मिलते हैं  यहाँ 
दिल दुखाने वाले कोई सच्चा दोस्त 
इन जरूरतों के ख़ुलूस और 
मतलबों के सलाम के दुनिया में...

फिर क्यों ढूंढते हैं आज 
आप अपने आप को 
कोई खोए हुए सावन और 
पतझड़ के खयाल से ?.....

क्या ढूंढते हैं आप यहां?
क्या पाएंगे आप 
यह बनावटी दुनिया और 
बेरहम बुनियादी दस्तूर से....







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