कौन खोटा और कौन खरा है...
थोड़ी बुराई
तो कर्ण में भी होगी
दुर्योधन में भी कुछ अच्छाई तो हुई होगी....
हुस्न वालों के नगर में आज यह कैसा मेला
हर किसी के हाथ में आईना टूटा हुआ....
बेशुमार भीड़ है
फिर भी हर शख्स यहां
दिख रहा है बेबसी में
क्यूँ अकेला खडा हुआ....
जिन्दगी का यह खेल है
दो पल का तो मेल है
फिर भी क्यूँ हर कोई यहां
परेशान बेशुमार हैं....
हर कोई क्यों यहां
जीत के दौड़ में भाग रहा है
भूल चुका है यह खेल है
यहाँ हार जीत में क्या ही है
वह सिकंदर हो गया
सच में जो बेमिसाल खेल खेला....
खुदा, सिर्फ खुदा ही गवाह यहां
सिर्फ वही है खेल के रेफरी और
वही करेगा आखिरी फैसला यहां....
खेल के मैदान है यह
जीवन का यही रंग मंच...
जो समझ पाया,
वह अपना खेल बखूबी खेल गया
अपना किरदार बेहतर निभा गया
जो ना समझा वह जीवन भर
शतरंज के पासा में उलझा ही रह गया...
जो हार जीत के उलझन में फंस गया
जीवन क्या है, खेल के मैदान में वह क्यूँ आया
यही बात भूल गया,
वह जीत कर भी हार गया
सिकंदर बनते बनते रह गया
और ऐसे कोई और भी होगा
जो खुदा के मंजर को समझ पाया
और हंसते हंसते खेल गया....
हार कर भी जीत गया
हार जीत के कशमकश से परे हो गया....
जो समझ गया,
ना यह रास्ता ज्यादा खूब सूरत है
ना मंजिल बेमिसाल है
यह साथ चलने वाले साथी ही है
जो वाकई सिकंदर बनाते हैं...
रास्ता कोई भी हो,
मंज़िल मिले या नहीं
उसके परवाह किए बैनर
जो साथ निभाते हैं
वही साथी जीवन के
अनमोल तोहफे होते हैं
हर मुकद्दर के सिकंदर बना जाते हैं....
फिर क्यूँ सोचना कौन अच्छा यहां
और कौन बुरा
क्या खोटा और क्या खरा....
जो मुकद्दर में वह तो अता हो गया
पाप की झील में डूबकर भी
कोई इंसान देवता हो गया....
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