Friday, 31 October 2025

अजीब इत्तफाक

कितनी अजीब इत्तफाक है दोस्त, 
समुंदर के गहराई से ताल्लुक रखने वाले भी 
कभी कभी तालाब जैसी बातेँ करते हैं ....

जिस समुंदर ने हजारों नदियां अपने सीने में 
समा लिया था,
उसी से ही पानी का हिसाब मांगते हैं....

जिस समुंदर ने सबकुछ लौटा दिया 
उसी की किनारे बैठे हुए 
खोने का एहसास जताते हैं ...

जिस दिया ने सदियों से एक ही लॅ
लेकर बैठी है 
उस से वफादारी की सबूत पूछते हैं ...

अजीब इत्तफाक है दोस्त 
हम जैसे एक अजीब दौर से गुज़रते हैं...

पास रहने वाले  अपनों को अपनों 
के खबर नहिं  है 
मगर अफवाह मिलों दूर फैली हुई है...

जिन अंधेरों ने सूरज को ढक लिया था 
वही सुबह से सवाल पूछते हैं...

जो  कभी कोई सवाल के जवाब नहीं देते थे 
वह आज खामोशी से हैरान हैं...

अजीब दास्तान है यह दोस्त, 
शायद हम कोई एक 
नायाब दुनिया में अब जीते हैं...

रात रानी के मुरझाने पर 
जिन के नजर भी नहीं गए थे कभी, 
आज वह एक पीले पत्ते के खातिर
 आँसू बहाते हैं...

जो इंसान को पत्थर समझ बैठे थे 
वह आज पत्थर में खुदा तलाश करते हैं...

अजीब इत्तफाक है दोस्त...
जो अश्कों के झील में नहाकर भी नमक की वजूद को नहीं समझ सके 
वही आज समुंदर के पानी में उसके ख्वाहिश को तलाशते हैं...

अजीब इत्तफाक है जनाब 
जो कल को तलाशते तलाशते 
अपनी आज को खो दिए 
वही आज बीते हुए लम्हों में 
अपने आप को, अपने आज को ढूंढते हैं....

अजीब इत्तफाक यह दोस्त
अजीब दास्तान है यह जिंदगी, 
जीते जी मौत से टकराती है 
और मरकर भी अमर कर जाती है...



No comments:

Post a Comment