Friday, 22 August 2025

तुम्हें कहाँ ढूंढें....

सदियों के बाद जैसे यह आवाज आई है...
मुझ से मेरी परछाई पूछ रही है....

क्या तुम्हें मैं फिर मिल सकूंगी, 
क्या तुम्हें मैं फिर ढूंढ पाऊँगी...

अर्से बीत गए तुम्हें मिले हुए 
सदियाँ बीत गए तुम्हें सुनते हुए ...

 मेरे पास न तुम्हारा कोई पता है, 
न कोई संदेश, 
ना  कोई तस्वीर है  ना कोई अक्स...

ना है वक़्त की इजाज़त मेरे पास ,
ना ही  है मंज़र का कोइ पहचान-पत्र ...

है तो केवल एक परछाई का साथ 
और एक धुंधली सी अधूरी एहसास...

फिर हम कैसे ढूंढे तुम्हें 
कैसे तलाश करें वह एहसास....
             xxxxx
ऊपर से एक आवाज आई...

ये मेरे हमसफर, मेरे परछाई...
क्यूँ परेशान हो, मेरे हरजाई...

मुझे ढूंढना है तुम्हें तो.....
बारिश में भीगे हुए वह आसमान को देखो, 
वह जमीन जो रात से भारी बरसात में 
सहमी सी गई, उस के साथ 
धडी,  दो घडी बैठ कर तो देखो...

मैं तुम्हें वहाँ मिल जाऊँगी 
मैं मिल जाऊँगी कोई छोटी सी चिड़िया की चहचहाहट में 
या बाग में गिर पडे वह रात रानी की 
मुरझी हुई खुशबू में...

सागर की साहिल में मैं तुम्हें 
दिख जाऊँगी..
साहिल की हर रेत पर मैं तुम्हें
 मिल जाऊँगी...

ढूंढ लेना मुझे यह चांद की दाग में 
या तारों के महफिल में 
शायद मैं तुम्हें वहीँ मिलुगीं 
जहाँ जमीन और आसमान सदियों 
से बैठे हैं एक दूसरे के इंतजार में...

मैं वह नहीं जो मिलेगी 
कोई जिस्म की अलमारी में 
या दौलत की जेब में...
मैं वह भी नहीं जो 
रिश्तों के मतलब में छुपा है 
या जायदाद की पर्दो में...

मैं तो वह बेखौफ, बेमिसाल रूह हूँ 
जो पत्तों की सरसराहट में सुनाई देगी 
सावन के मेघ-मल्हार में भी मिल सकेगी 
तुम्हारे हर साँसों में एहसास होगी 
हर धड़कन में आवाज देगी...

फिर तुम मुझे ढूंढने में क्यूँ परेशान हो...

ये मेरे परछाई,  मेरे हमसफर...
दुनिया की कोई भी राह पर 
जिस दिन कोई भी गली में, 
कोई भी कस्बे या शहर में...
तुम्हें अश्कों भी भीगी हुई 
कुछ नज्म मिल जाए ,
जो दास्ताँ लिखें हैं 
वे आंसूओं के 
जो पलकों पर छलकते रहें 
मगर बह ना पाए...
वे धडकनों के,
जो चलते रहें 
मगर कुछ कह न पाए...
वे ज़ज्बातों  के 
जो जुबान पर आते आते 
खामोश हो गए...
वे साँसों के 
जो इंतजार में जिन्दगी भर बैठे रहें 
फिर भी अपनी वफादारी निभाते गए..

कभी फुर्सत मिले तो वे पन्नों को 
पढ़ लेना, वे नजमों को 
मेहसूस कर लेना...
मैं तुम्हें उसी पन्नों पर मिलुंगी...
क्यूँ की वहीँ मेरा घर है, 
वही मेरी जन्नत भी....









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