Saturday, 9 August 2025

यह क्या हो गया....

बड़ी मुद्दत के बाद हम  यह शहर में आए है, 
 मगर इस शहर में अब इतना सन्नाटा क्यूँ है!
क्यूँ लगता है यहां हर रास्ता बेबस है 
भरे बाजार में  भी हर शख्स अकेला है

यह शाम भी क्यूँ इतनी बदली सी है
यह सेहर भी  क्यूँ इतनी खामोश है..

 ये गालियाँ  क्यूँ खो चुके हैं अपने रौनक, 
ये सड़के भी  क्यों भूल चुके हैं अपने मासूमियत, 
यह हवा भी  क्यों खो दिए हैं अपनी रंगत, 
यह फिजा भी  क्यों भूल  चुके हैं अपने फितरत 

किसी से पूछ लिया, ये सब क्या हो गया, 
कोई धीरे से कहा, कल रात एक हादसा हो गया...
शायद दरिया में एक कश्ती डूब गया, 
 और शायद ही उस में से कोई बचा होगा, 
  जह्नोदिल से एक अजीब सी सिसकी उठा, 
शायद उस कश्ती में मेरा कोई अपना था. ..

वो ज़मीन भी उदास थीं, जहां कुछ लम्हे
आप गुजारे थे, 
वो शाम भी खामोश थी, वो सेहर भी बेबस ही थे, 
वो शजर भी परेशान थे, 
यह सूरज  के  किरनें भी  बुझा-बुझा से थे, 
चांद पर रोशनी की कुछ कमी सी थी 
चमन मे फ़ूलों की   भी कमी भी थी 
इस जहां से  एक रुसवाई थी....


 ऊपर   देखा  तो  उस जहां से रूह की  एक आवाज थी 
 वहां मायूसी नहीं एक महफ़िल सी थी...
बारिशों की बूंदे नहीं, साँसों की ग़ज़लें ही थी
एक अर्से के बाद हमने वो रूह  से फिर मिलें....
 आसमान मैं  बादल  की परछाई थी 
 और फिर एक नई सितारे की  ख्वाब  सी थी.....

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