Sunday, 24 August 2025

खामोशी की एक दौर

आज यह चांद इतना चुप क्यों है?
क्या किसी ने उस से कुछ कहा है?
आज ना ही चौदवी ना ही अमावस है 
फिर तारों में इतनी हलचल क्यूँ है...

एक अर्से बीत गए, और सालों खो गए 
फिर आज वक़्त के रेत पर यह एहसास क्यूँ है 

किस दौर की बात करें हम आज....
वह तस्वीर जो आपको नाराज सी खड़ी 
मेहसूस हुई - या वह घडी 
जो खामोश और बेजुबान 

या हम बात करें  वह कुछ पल के 
जिस में आप ने कुछ कह दिए, 
हवा से वे लफ्ज मिल गए 
आईना के पीछे आप खडे मुस्कराते रहे और हम जुल्फों के छाँव में आप को ढूंढते  रहें..

या हम आज बात करें 
बारिश में भीगी वह कुछ घंटों के 
या खुले आसमान के नीचे 
गुजारे हुए वह कुछ लम्हों के 

या हम याद कर के हंस पडें
वह फुटपाथ पर चलते चलते 
फिसले हुए पैरों के निशान पर..
या स्कूटर पर बिताए हुए जिंदगी के 
वह अनमोल बत्तीस मिनट पर...

यह सोच ही रही थी गुमसुम बैठ कर 
फिर आप ने याद दिलाया 
कुछ अर्से की, जहां बत्तीस 
मिनट कब बत्तीस साल के 
बोझ के तले दब गये थे 
कब से फसिल फाइल में 
बंद हो गए थे..
अचानक आप ने मुझे कुछ पूछा...

कुछ कहना नहीं मुझे आज...
कुछ पूछना नहीं आप से अब...
फिर एक सन्नाटा छा गया 
वक़्त उस पन्नों पर एक खाली 
दस्तखत कर दिया 
और आँखों ने समय के रेत पर 
कई बूंद आंसू  गिरा दिया 
और आप ने आप के वादे ना भूले 
उनको अपने हाथों से पोंछ दिया...
और शायद वे अश्कों ने जाते जाते 
यही कह दिया...

उस दौर के बारे में हम क्या कहें...
या वक़्त कहे या आप 
हमारे लिए तो वह दौर वहीं खडा है
एक बेखुदी की तरह 
बेजुबान और खामोश....








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