कैनवास पर तुली चलाते चलाते,
तुम खुदा के वह कहर से मिल गए थे....
तुम कौन थे ?
तुम वह काग़ज़ भी थे, वह कैनवास भी,
वह तुली भी तुम ही थे और
जीवन में रंग भी तुम ही तो थे...
तुम सिर्फ ख़यालों या
ख्वाबों में या एल्बम की तस्वीरों
में ही नहीं थे,
तुम सुबह की सूरज की
रोशनी की तरह सहज और
शाम की चाय की प्याले की
तरह सुकून भी थे
तुम सर्दियों में खिली हुई
एक टुकड़ा धूप हुआ करते थे
तो कभी पहली बारिश में भीगी हुई
मिट्टी की खुशबु थे,
कभी फिर रात रानी की
नीचे गिरे हुए मासूमियत भी थे,
कभी तुम मेरे लिए
वारिस शाह के पैगाम भी थे या
हीर -रन्झो के ख्वाहिशें थे
कभी तुम धड़कन से निकले
दुआ की बारिश भी थे
या सर्द सांसो में उठे
धुआं की तरह बेमिसाल थे
कभी तुम "प्रीतलडी" की
कवर पेज की चित्रकार भी थे
तो कभी तुम्हारे पीठ पर उंगलियों में
मेरा लिखा हुआ "साहिर" के नाम भी थे
मेरा साल गिरा में लाए हुए वह अनोखा तोफा के अंदाज भी तुम ही थे
वह न गुलदस्ते थे, न कपड़े,
न जेवर थे न जायदाद
वह था एक अनोखा अंदाज,
दुनिया की मशहूर कवियों के
शायरी से नवाजा हुआ एक घड़ी की डायल.
तुम शायर तो नहीं थे, न आशिक मिजाज़,
मगर तुम एक ऐसे हमसफर रहे,
जो मुझे ऐसे समझ गए थे,
न था कोई लफ्ज, न कोई अल्फाज,
खामोशी की खूबसूरती तो कोई
तुम्हारे नजरिए से देखे,
और मोहब्बत की सादगी
तो कोई तुम से ही सीखे....
तुम समय की तरह अंतहीन
और परछाई की तरह इत्मीनान...
दुनिया के हर शख्स से तुम अलग ही थे
और हर दस्तूर का बेजुबान जवाब भी थे...
तुम कौन थे...
तुम जिंदगी के साथ रहे, मौत पे भी कंधे दिए
तुम्हें न बदनाम होने का डर था
ना शोहरत कमाने की लालच...
तुम्हें तो बस वही किया
जो एक इंसान के लिए इंसान नहीं,
बस एक खुदा ने ही किया...
तुम कौन थे?
इस जहाँ से उस जहाँ तक
एक अनोखा एहसास थे ....
तुम मेरे इमरोज ही थे.....
अब तुम से मैं बिदा ले ली हूँ,
इस जहाँ से मैं उस जहाँ पर जब देखती हूँ,
तुम से क्या कहूँ ???
तुम्हारे लिए यही मेरी शुक्र गुजारी
और यही मेरी दुआ...
युग युग तुम वही रहो,
वहीँ रहो, ऐसे रोज रोज इमरोज़ बने रहो,
बन तो कोई कुछ भी सकता है ....
मगर मुश्किल है इमरोज़ होना...
रोज रोज क्या , एक रोज़ भी होना...
तुम्हारी अमृता....
(Dedicated to इमरोज़ and अमृता प्रीतम 's eternal journey )
No comments:
Post a Comment