Tuesday, 26 August 2025

कही -अनकही

यह हंसी के पीछे छुपे हुए दर्द, 
ये पलकों पर अटके हुए  अश्क 
कुछ कह गए,  कुछ कहते कहते रह गए...

वह रेत पर बिछे हुए ख्वाब 
वह हाथ पर  लिखे हुए नज्म 
वह आईना से ओझल हुआ चेहरा 
वह बारिशों में भिगा हुआ सेहरा 

कुछ कह गए,  कुछ कहते कहते रह गए...

अचानक जिंदगी में आए वे हादसे 
वह वक़्त से फिसले हुए रास्ते 
वह बैसाखी से रोंदें गए रातें
वह मायूसी से भीगे हुए आखें

कुछ कह गए,  कुछ कहते कहते  रह गए...

आप के आँखों से निकले वह चमक 
चेहरों से बरसे हुए वह रौनक 
सादगी के वह कुछ लम्हों के सफर 
कुछ पलों के सही वह बेमिसाल मंजर 

कुछ कह गए, कुछ कहते कहते 
रह गए...

हम यूँ ही बैठे हैं गुमसुम  
तब से ,मायूस, बेबाक, बेजान 
किस से दिखा लेते वह आईने 
किस से कह लेते  वह अफ़साने 
जो कुछ कह गए,  कुछ कहते कहते रह गए.....

आप किस दुनिया में चले गए 
जहाँ से लौट कर नहीं आए 
ये यादें, यह मायूसी ,यह बेबसी 
यह रेत पर लिखी हुई खामोशी 
कुछ कह गए, कुछ कहते कहते रह गए..

 जनाजे को देख कर आप के 
 हम कर भी पूछ लिए 
यह कहाँ जा रहे हैं 
और कब  लौट कर आयेंगे 
कुछ खामोशी से हमें देखते रहें 
कुछ अजनबी हमें  कह दिए 
यहां काट कर जिंदगी यह बनाए 
जहाँ से आए थे वहां जा रहे हैं 
वह खामोश लब ,वह अश्कों भीगे रास्ते 
 कुछ कह गए, कुछ कहते कहते रह गए.....

वह बेबसी, वह खामोशी 
कभी न खत्म होने वाले इंतजार भी 
कुछ कह गए, कुछ कहते कहते रह गए...

ये  खुदा ,
क्या होता, थोड़ा और वक़्त दे देते, 
कुछ लम्हें हम जी लेते, 
कुछ अश्क हम पी लेतें

जो कहना था उन्हें कह देते, 
कुछ सुनता था हमें,  सुन लेते...

कुछ कहते कहते रो लेते 
छलकते आँखों से बह जाते 
कुछ अनकहे बातेँ कह देते, 
कुछ कहते कहते सो जाते....




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