कभी मायूसी में भी तूने हंस दिए
तो कभी हंसी में भी भरे उदासी छाये...
ये जिन्दगी, तेरे इतने रंग कैसे...
कभी तू रही मेरे समझ से परे
तो कभी सिखाई तूने समझौते सारे
ये जिन्दगी, तेरे इतने रंग कैसे...
कभी रगों में दौड़ते लहू गिरे
तो कभी अश्कों में भीगे आन्चल मेरे
ये जिन्दगी, तेरे इतने रंग कैसे....
कभी पतझड़ में भी कोयल गाये
तो कभी सावन में भी मोरनी रोये
ये जिन्दगी तेरे इतने रंग कैसे....
पूरा ज़माना खडा था मेरे जनाजे पे मगर
एक तू नहीं आई थी मेरे मजार पर
किस्मत का यह कैसे तमाशे
ये जिन्दगी, तेरे इतने रंग कैसे....
जिंदगीभर हमने तेरे लिए
तुझ से ही लडते रहे
ये जिन्दगी तेरे इतने रंग कैसे
कैसे तेरा यह अजीब खेल ,
कैसी है यह तेरे समझ बोल,
या है ये कहीं समझौते ऐसे
ये जिन्दगी ,तेरे इतने रंग कैसे...
कभी तूने बेहिसाब समझ भेंट दिए
तो फिर कभी बेशुमार समझौते किए
ये जिन्दगी, तेरे इतने रंग कैसे.....
ये जिन्दगी तेरे इतने रंग कैसे....
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