Sunday, 28 September 2025

मेरा पता

आज यह शहर का नाम बदल गया 
चौराहे पर लिखा नेम प्लेट भी 
निकल गया 
मैंने मेरे दरवाजे से मेरा नाम 
भी मिटा दिया 
तो आप मुझे कैसे ढूंढ पाएंगे ?

मैंने बर्षों  आप  की प्रतीक्षा की है 
कई बार आप के शहर, 
आप के मोहल्ले, आप  के गली, 
आप के  चौराहे और  आप के घर के सामने 
आई हूँ, आप के 
 रूह को ढूँढा है मैंने हर बार 
मगर मैं आप के आत्मा को 
वहाँ नहीं पाया .....
शायद इस लिए की 
आप आप के आत्मा को 
मुझसे दूर रखना चाहते थे....

इस का क्यूँ और कैसे ,
यह मुझे पता नहीं, 
इस का जवाब शायद आप को, 
नहीं तो वक़्त या खुदा को पता होगा....

मगर कभी अगर आप 
मुझे दिल से ढूँढे 
रूह से आवाज दें 
कभी अगर आप को  मेरी 
 जरूरत हो, 
आप मेरी आत्मा की खोज से निकले....
तो दुनिया की कोई भी शहर, 
कोई भी कस्बे, कोई भी चौराहे  
कोई भी गली में जाइए, 
कोई भी घर में झाँक लीजिए 
जहाँ आप को एक मुक्त आत्मा 
महसूस होगी ,
जहाँ आप को कोई बेनक़ाब रूह 
की साया दिख जाएगा 
समझ लेना 
वही मेरा शहर, वही मेरा कस्बा, 
वही मेरा चौराहा, वही मेरा घर....
वहीँ मुझे ढूंढना, 
सारे नकाब, सारे दुनियादारी छोड़ आना 
सारे अभिमान, सारे नाराजगी 
पगडंडी पर भूल आना...
मैं आप को वहां जरूर मिल जाऊँगी...



इस से अच्छा पता मैं आप को 
क्या दे सकती हूँ....




Tuesday, 23 September 2025

ख्वाहिश

मालूम नहीं था हमें 
हमारे मकसद क्या था 
और ख्वाहिश भी क्या थी 
यूँ अचानक आप रास्ते पर मिले 
कुछ कहा था की नहीं याद नहीं, 
हमने कुछ सुना था की नहीं वह भी याद नहीं 
बस याद यही थी की 
हम चलते चलते यूहीं चल दिए आपके साथ...
कुछ दूर, कुछ देर तक चले, चलते रहें ....
वक़्त से पहले और वक़्त के बाद....

पता नहीं चला हम क्या बात किए 
किस के बारे मे बात किए...
एक दूसरे के साथ...
बात रास्ते के थी, या मंजिल की 
या बात थी कुच्छ ख्वाहिशों की 
या चलते चलते खुद को तलाशने की..
या फिर वह था कोई खामोशी की दौर की...

दिन में चले थे 
हुई गहरी रात 
बेबाक, बेजुबान, वीरान रात 
चाँद छत पर नहीं था, 
शायद कहीं पीपल पर अटका हुआ था 
खिड़कियां बंद हो गए थे मगर 
आंगन में अपने हजारों कहानियां 
बिछा रखे थे....

तारों के घर में मेला तो नहीं था 
फिर भी वह एक दूसरे से कुछ 
गहरा सवाल कर रहे थे 
एक दूसरे के तरफ देखते हुए 
मुस्कुरा रहे थे....
चकोर भी जैसे जमीं पर खड़े
 सपनों का जाल बुना जा रहा था...
शायद उसे इसकी परवाह नहीं थी 
चाँद जमीन पर उतरता या नहीं 
वह तो बस प्यार की संगीत 
गाया जा रहा था....
उसे न पाने का जश्न था
न था खोने का गम ...
उसे न भूलने की कोई ख्वाहिश थी 
न बिछड़ने की परवाह ..
उस की बस एक ही ख्वाहिश थी 
वहीँ  खडे खडे 
ज़माने भर चांद को याद 
देखता रहे और उसकी रोशनी से भीगते रहे....

और हम सोच रहे थे हमारे ख्वाहिश क्या थी  
क्या था वह खयाल, आरजू भी क्या थी..
शायद हम एक हवा की तरह 
बह जाना चाहते थे 
कुछ खुशबू तुम्हारे रास्ते 
पर  बिखेर देना चाहते थे 

आज गुमसुम बैठे सोचते हैं हम, 
कब ज़माने बीत गए....
जब भी आप को याद किए,
जब भी आप खयाल में  आए 
दिल से कुछ दुआएं ही निकले....
हर हाल में खुदा आप को महफूज रखें
गम का साया भी न गुजरे 
आप के आसपास से ....


शायद यही हमारी ख्वाहिश थी, 
 यही हमारी आरजू भी 
 हर सुबह और शाम की दुआ भी 
 शायद इस जिंदगी के साथ भी.....
और यह जिन्दगी की बाद भी....


Monday, 15 September 2025

बंद घडी....

यह दीवार पर लटकी हुई घडी बंद पडी है 
कितने सालों पहले से ही बंद हो गई है....

आप को कैसे यह यकीन हो चला था 
इस घडी में जो एक पल कैद हो गया 
समय वहीँ ठहर गया है ...
इसीलिए आप उसे ठीक नहीं कराए 

कितनी अजीब बात है ...
कैसे सोच लिया आप ने 
वक़्त एक घडी की कांटों के मोहताज है 
घडी बंद हो गई तो वक़्त रुक जाता है 
और समय घडी में कैद हो जाता है...

समझाने तो चाहे थे हम बहुत 
मगर आप समझे तो सही...
जीवन ना कहीं ठहरा है कभी 
ना यह नाव पर रुका है कहीं 

यह धार है कुदरत का, नाव क्या 
किनारे भी बह जाते हैं यहाँ 

ना वक़्त किसी का इजाजत लेता है...
ना समय कभी पीछे  मुड़कर देखता है....

हम न चले तो चल देते राहें 
अंधी से, तूफान से वे डरते नहीं है 
कभी किसी का वक़्त भला रुका है  
घडी के कांटों से रिश्ते जोड़ा है !

हो सके तो आज समझ लेना यह बात 
वक़्त से पहले या वक़्त के बाद 
जो ठहर जाता है 
वह वक़्त नहीं कुछ लम्हें होते हैं 
शायद जीवन सालों में नहीं 
ऐसे कुछ पलों में जिया जाता है...

घडी के कांटों पर नहीं 
वक़्त इन्हीं लम्हों में कैद हो जाता है...
जिंदगी सदियों की नहीं 
यही चंद लम्हों की मोहताज होती है...






Saturday, 13 September 2025

शपथ के चक्रव्यूह

साथ चलते चलते जब पीछे मुड़कर हम देखे 
तुम वहाँ नहीॅ थे , 
कहाँ रह गए?
घडी दो घडी वहीँ खडे हो कर सोचे 
फिर वह घडी दिनों,महीनों, सालों में 
बदलते चले गए ....
और वह सोच एक इंतजार में
बदल गए, और वह धीरे-धीरे एक 
कभी न खत्म होने वाले इंतजार हो गये...

सपने जो देख रहे थे वह अधूरे रहे,
जो समझ रहे थे ,वह बिखर गए 
लम्हें जो हाथ में आते आते फिसल गए 
और वक़्त के साहिल पर चुपचाप खडे
 हम सोचते रहें...

जिंदगी और जीने के बीच में यह फासले 
कैसे आ गए ?
सपने जो अपने ही थे उस में यह अजीब दरारे कैसे पड गए....

पता नहीं कब  कैसे यह सोचते सोचते, 
जवाब ढूंढते ढूंढते 
सुबह शाम हो गए  
दिन महीने और सालों में बदल गये 
बहार पतझड में समा गए 
सावन अपने पहचान, अपने वजूद को 
रेगिस्तान के रगों में  तलाशते रहे .....

फिर जैसे एक दिन अचानक यह पता चला 

जीवन और जीने के बीच में एक 
चक्रव्यूह जो बन गया था 
फासले नहीं वह एक शपथ ही था 
एक शपथ का चक्रव्यूह ही था...
जिस में तुम अंदर चले तो गए थे 
तुम्हें उस से बाहर आने के 
रास्ता पता नहीं था...

सोचते रहें हम , तुम इस चक्रव्यूह में क्यूँ 
आ गए, क्या जरूरत थी ....

फिर अंदर से एक आवाज आई 
यह आवाज किस की थी ?
नजर ऊपर हो गई 
और दुआ बन गई....
और वह आवाज सुनी हमने,वह मेरी नहीं थी 
थी तो गोविंद की ही...
अपने शातिर मुस्कान ले कर 
सामने केशव खडे थे, 
कह रहे थे, समझा रहे थे हमें...
तुम इस खेल में अकेले नहीं थे 
सदियों से कहीं कितने लोग,  
कितने महान लोग इस 
शपथ के चक्रव्यूह में 
फंसते गए थे...
कभी गंगा पुत्र देवव्रत ही भीष्म हो गए थे
कभी द्रौपदी के खुले केश अपने शपथ के 
अभिमान बन गए थे 
कभी भीम के गदा  दुर्योधन, दुशासन के 
लहू के प्यासे हो गए थे 
तो कभी जयद्रथ के वध या 
अग्नि समाधि पर पार्थ अड गए थे...

क्यूँ फंस गए थे ये सब ?
ज्ञानी, गुणी, फिर भी ना समझ...

शपथ के चक्रव्यूह के मोह 
कहीं हस्तिनापुर जला दिया तो कहीं 
कुरुक्षेत्र लहू में बहा दिया, कहीं सूर्यास्त रोकने को केशव को मजबूर किया ,
कहीं दुर्योधन, दुशासन  से धरती को रिक्त
 करने के अभिमान ने 
अभिमन्यु खो दिया...

शायद चक्रव्यूह में केवल वह ही नहीं था....

थे तो पूरे कुरुवंश के सारे लोग 
था वह शपथ के चक्रव्यूह के मोह 
आहत ,नासमझी अभिमान, 
और धरती पर 
गिरे हुए अनगिनत बेबस,बेगुनाह लाश..

काश वे सब कभी उस शपथ के
चक्रव्यूह में न आ जाते 
और समझ पाते यह स्वाभिमान नहीं,
है तो यह अपने अपने अभिमान केवल 
और ना है  इस  में हस्तिनापुर,ना है 
कुरुवंश के भविष्य....

यह है तो केवल ऐसे अभिमान का जोश 
शपथ के वह चक्रव्यूह 
जिस में आ तो गए थे अनेक 
मगर वापस जाने का रास्ता तो 
केवल जानते हैं केशव...

अगर यही समझ लेते, शपथ नहिं सामर्थ्य से, अभिमान से नहीं अनुराग से
हुआ होता कुरुवंश के यश....

शायद शायद गोविंद रोक लेते थे 
वह महाभारत....

अब हमें समझ आया, यह फासले नहीं थे 
यह थे तुम्हारे कोइ फिर न  सोचे,
नासमझे  लिए गए शपथ ...
कभी ना बाहर आने की रास्ता 
मिलने वाली चक्रव्यूह के पथ...

यह भी था तुम्हारे एक और व्यर्थ अभियान, 
कैसे मुक्त होते तुम, कैसे रिक्त होते तुम 
जो महाभारत के अंत तक नहीं समझ पाये थे गंगा पुत्र भीष्म, महात्मा देवव्रत....

यह एक चक्रव्यूह ही तो है केवल, 
कैसा है यह शपथ.....





Beyond a writer's personal boundary

A little while ago I read a beautiful article ' literature and beyond the writer's personal limits'. It really touched my soul. The writer,a senior poet, story teller and novel writer and most important an educationist writes... On reading a certain story written by him, his wife feels happy because she somehow feels she knows that lady character in the story resembles a lady whom they had met at x station while travelling sometimes.... And accuses she does not like to read his other stories as the characters are not known to her ! Here the writer comments beautifully something like this... In a writer's/poet's/novelist's life time he will write on innumerable subjects/characters , some of which he must have experienced on his own,some he must have observed so closely and made as his own experience even if it has happened outside his physical being and if everything he writes actually happens to him physically and then he writes ,then he might have to live thousand impossible years to literary experience the pain and pleasure of all his characters physically before he could write !'. I add a little more to this....'and  some he must have assimilated from the society he lives,his readings, the analysis,his everyday look at life and what not...That's why he is different, a creator. Again he writes it's actually not important who is the writer,what happened to him or in what personal mind state he wrote what he wrote.. But in literature it is important what he wrote,how close it is to universal truth,does it really happen in everyday life and does the true reader finds himself in the character, not the writer's ones and does it help him to live his life,does the literature the writer writes has the power to portray the pain, has the guts to bring a solution how anti contemporary it may look like or at the least does it have the power to sooth a wounded heart .... as someone somewhere feels his pain and cares to write about.... even  if he is unrelated to him.....That's the success of a writer, that's the pleasure of his being,to share someone's burden of life in his own way....
     Many a times writers use a pen name because readers are sometimes merciless to misinterpret things,not take in the right spirit... Sometimes the readers are also so seasoned to read very mediocre stuff they get fumbled and stumbled if someone dares to write in his /her own name and writes literature which has the power to live beyond million years on Earth but tells truth fearlessly.... Because such write ups have so much value to give to the society actually it is not necessary to read even the writer's identity. Someone once asked one of my most respected writer, Amrita Pritam 'you are telling so much truth,some homes are sure going to break'...she smiled and calmly answered...'Homes are anyway breaking everyday, only difference is they are taking the help of heap of lies,let some of them take the help of my truth'....
   When a human being per se,and a writer in particular goes beyond the limit of personal craze of pain and pleasure, appreciation and criticism and thinks beyond his entity then what he writes will be only truth and it will obviously start from his own experience/pain/pleasure/loneliness/loss/departure... But soon it will assimilate with the greater world beyond his self where he enters to an endless eternal truth and bottomless feeling of peace of looking beyond the horizon of his limited identity and seeking the divine blessings to write something to help someone,somewhere, someday...

Monday, 8 September 2025

फिर यह सावन के साथ....

फिर एक सावन आज यहाँ आया है 
मेरे झरोखा के बाहर चुपचाप खडा है 
कुछ सन्नाटे और कुछ सवाल साथ में लाया है 

फिर एक सावन आज यहाँ आया है....

सालों पहले किसी एक सुबह के फुट पाथ पर 
महज पडे हुए कुछ कदमों के निशान 
और चंचल हवा के झोंकों के  साथ 
बह गये हुए कुछ लफ्ज....
वह साथ लाया है...

फिर एक सावन आज यहां आया है...

साथ बिताए हुए एक खूबसूरत शाम 
के कुछ बेताब लम्हें
सिगरेट के धुएँ के साथ पिघले हुए 
कुछ नज्म, कुछ खयाल उस के साथ आए हैं...

फिर एक सावन आज यहाँ आया है...

यह सावन भी पहले जैसा ही है 
अजीब सवाल और बेजुबान जवाब की तरह 
साथ चले चंद कदम और गुमसुम एक नजर की तरह 
फिर एक सावन आज यहाँ आया है....

याद दिला रहा है बर्षों पहले बीते 
कुछ घडियां,कुछ पहर और कुछ जज्बातों के 
कुछ पुराने ग़ज़लें और खोए हुए 
कुछ  पुराने खयालों के 

फिर एक सावन आज यहाँ आया है...

हमें जैसे लगा वह पुराने सपनों में खोया है 
और हमारे तरफ उम्मीद से देख रहा है..
शायद उसको कुछ कहना है  
मगर कुछ कह नहीं पा रहा है...
चुपचाप खिड़की के बाहर खडा है..

फिर एक सावन आज यहाँ आया है...

हम ने कहना शुरू किया...

साथ चलो हमारे  कुछ दूर आज 
आँखों  में जमें  हुए कुछ अश्क 
और खामोशी जो समझे नहीं थे आप 
आज जुबानी आपको कह देंगे 
 कुछ जिक्र करेंगे गैरों के 
और अपनी कहानी कह देंगे..

जिस राह पर आप चल देंगे 
वहाँ अपने आंचल हम बिछा देंगे 
और  पथ पर आप के 
एक दिया हम ज़रूर जला देंगे ...

आप समझ ना पाए तो क्या हुआ 
कुछ शाम इधर  काट देना, 
कुछ वक़्त यहां ही जी लेना 
आज यह सावन से कुछ कह देना...


शायद जिंदगी आप को आजमा लें 
और आप आप को ही यहां ढूंढ लें....
कोई अधूरी ख्वाब के साथ हो 
या कोई खुली किताब की बात हो 
कर लेना कुछ बात 
फिर यह सावन के साथ.....
फिर यह सावन के साथ...



Saturday, 6 September 2025

निशान

कुछ लहू के निशान मिलें हैं 
आज इसी रास्ते पर   
अजनबी शहर में फिर किसी का
कत्ल हुआ होगा रात कल 
या शीशे पे  कोई चला होगा 
बहुत दूर यहां आज ....

यह शहर के छाती पर ,
यह सजर और पगडंडी पर
कुछ यादें सूखे, बिखरे मिले और 
कुछ लहू के दाग यहाँ आए फिर आज ....

कई छालों के निशानें मिले 
किसी के पैरों पर 
शायद कोई चला होगा जीवन भर
 बड़ी उसूलों पर 

फिर कलंक के कितने निशान मिलें 
कहीं किसीके  माथे पर 
शायद किया होगा बेइंतिहा मोहब्बत 
किसी अपनों से उम्र भर...
कहीं अश्कों के गहरे निशान मिलें 
किसी के पलकों पर 
शायद कोई खोया होगा अपना 
और ढूढ़ रहा होगा रात भर ...

एहसान के कई  निशान मिलें
किसी के दिल पर ,
सोचते सोचते बीत रहा है ताउम्र 
कैसे लौटाये वह  यह रिण भार...
शायद किसी ने बिना मांगे
 सब कुछ अपना  रख दिया होगा हथेली पर...

सोचता रहा कोई रात भर 
कैसे मिटाए यह निशान, 
कैसे चुकाए यह रिण
जो उम्र भर साथ निभाएं , 
और साथ चलते रहें 
जीवन के इस पार से उस पार...

कुछ लहू के निशान मिलें 
आज इस रास्ते पर.....



Thursday, 4 September 2025

ला पता

पता नहीं चला कभी हम 
होते हुए भी लापता हो गए 
एक ही जगह पर तो बैठे थे 
फिर बेख़बर कैसे हो गये 
और वक़्त बेवक्त पर कहां खो गए 

सच में क्या हम खो गए ?
होते हुए भी लापता हो गए ?

जीवन तो लगभग ऐसे ही चलती थी 
सुबह समय पर आती थी 
दोपहर ऐसे ही अलसाती थी 
शामें पहले जैसे ही ढल जाती थी 

बारिश भी नहिं भूली थी 
झरोखे पर अपनी दस्तक देना 
ना ही चाँद छोड दिया था 
घर के बाहर खडे पिपल पर आना 

फिर हम कैसे खो गए ?
होते हुए भी क्यूं लापता हो गए 

वक़्त से पूछा आज हम ने 
कैसे खो गए हम और 
क्यूँ ढूंढ़ नहीं लिया हमें तुम ने....

वक़्त ने क्या बेमिसाल जवाब दिया....

तुम खो गए थे? सच में खो गए थे?
यह तो पता नहीं हमें, 

पता है तो बस इतना ही हमें 
तुम उतना ही रहे हमारे साथ 
जितना खुद को खुद ही रहने दिए....
कोई किसी को क्या पाएगा, 
क्या खो देगा, हम सब तो रेत पर आते जाते 
लहरें हैं, साहिल पर आते आते 
मौज में बह जाते और रेत पर 
लिखे हुए नाम हैं, जो, लिखते लिखते 
अगला मौज में मीट जाते.... 

समुंदर के लहर के साथ धुल जाते 
फिर भी दिल के कोने में कहीं रह जाते 
जितना  खुद को खुद ही रहने देते, 
दरिया के भीतर नहीं, किसी के 
दिल और रूह पर हम रह जाते...

तुम कहां लापता हुए नहीं, 
यह तो तुम्हारे भ्रम है, समय के 
धारा में बहती हुई नाम है, 
तुम मुझ में जो समा गए थे 
उसका तुम को खबर नहीं है, 
हो तो तुम हमेशा अन्दर मेरे,


कैसे और क्यों बाहर ढूंढ रहे हो अपने आप को 
तुम जो लापता कभी भी हुए नहीं हो....


Wednesday, 3 September 2025

परछाई और हकीक़त

सालों के बाद आज पुरानी एल्बम देख रही थी 
उस में कुछ परछाईयें,  कुछ लम्हें ढूंढ रही थी 
अर्से से  जमें हुए धूल साफ़ करते करते
अखिर पन्ने पर  एक तस्वीर पर अटक गई 

पुरानी ,बेरंग, मासूम एक परछाई 
शायद अर्से पहले खींची हुई तस्वीर थी...
वह तस्वीर किस की थी...

मेरी ही थी वह तस्वीर, पहचान गई 
याद नहीं आया कब की थी 
मगर थी तो  पहचान सी, मेरी ही थी...

धुंधली सी नजर और बुझती हुई रोशनी  
शायद कुछ कुछ कह रही थीं 
कुछ लम्हें याद दिला रही थी....

कमजोर याददाश्त, बेबस आंखें 
फ़िर भी कुछ याद किए,
कुछ अपने तस्वीरों से निकले
और सामने खडे हो गए 
एल्बम के पन्नों पर से उतरे 
और सीधे मेरे अन्दर आ गए....

कुछ साँसे बर्षों से हिसाब मांगें 
कभी यादों से, कभी लम्हो से लडते रहें
कुछ धड़कनें खामोश अन्दाज से देखते रहें 
कुछ अश्कों से सवाल किए 

उस घडी से, वे लम्हों से 
पिछे छुटा हुआ कल से 
वह गली और  रास्तों से 

ओर वह तस्वीर से....
फिर कभी ना रुकता हुआ वह वक़्त से....

अचानक यह क्या हो गया ???

तस्वीर से एक नया चेहरा उभर आया 
किसी की याद दिलाया 
किस की याद आया???

आईना भी वही, अक्स भी वही 
फिर मेरी तस्वीर कैसे नयी हो  गयी...

सालों ठहर गए, तस्वीरें बोलने लगीं 
एक परछाई, हकीकत हो गई...
एल्बम के चेहरे से उतर के 
इंसान के बस्ती में नहीं 
जैसे कोई फरिश्ता के घर आ गई 
और अकेलापन से एकांत की 
लम्बे सफर तय कर गई.....

मैं वहीँ खामोश खडे सदियाँ पार कर गई...
 और एक परछाई हकीकत से बदल गई....





Tuesday, 2 September 2025

अक्स

यह अक्स भी बड़ी अजीब चीज़ है दोस्त  ,

साथ साथ  तो  हर पल रहता 
मगर बात कुछ नहीं  करता....
बेजुबान फिर भी उसकी यह खामोश अन्दाज, 
कैसे एक अनोखा ,बेमिसाल आदत 
यह अक्स भी बड़ी अजीब चीज है दोस्त...


यह सुबह की रोशनी में खो जाता 
या  फिर अपनी खामोशी ढूंढ लेता
और शाम ढलते ही अपने अंदर सो जाता
यह  अक्स भी कुछ बेताब अदाएं रखता
बेजान, बेबाक, बेहिसाब....
यह  अक्स भी बड़ी अजीब चीज है दोस्त...

अक्सर आईना में झाँक कर 
अपने आपको तलाशता 
या तो कड़ी दोपहर में गिरे हुए पत्तों पर  
बड़े  आहिस्ते आहिस्ते चलते जाता
यादों के शहर में अपने आप के अंदर 
एक नायाब मंज़र बना लेता....
बेशुमार लम्हों के परछाई पर 
यह अक्स भी क्या अजीब चीज है दोस्त...

बीते कल पर कोई साया नहीं ,फिर भी 
अपने दामन में सारे लम्हें समा लेता 
बिना कुछ कहे बेजुबानों के भी 
हजारों कहानियां बयां कर जाता....
यह इस की ख्वाहिश या तो खाब 
यह अक्स भी क्या अजीब चीज है दोस्त....

ना काल पर कोई हक रखना चाहता 
ना  बीते हुए कल से लडता झगडता
ना आनेवाले कल से घबराता 
केवल इसी एक लम्हों से गुज़र जाता
कुछ ले चलता अश्कों के साथ 
यह अक्स भी क्या अजीब चीज है दोस्त...

दरिया के ठहराव हो या छलकता हुआ पानी
गहरा समुंदर हो या चंचल सी हिरनी 
नीशर्त, बेसबब, फिर भी बेबाक जुबानी 
सच, सिर्फ  सच है अक्स की कहानी 
चलते चलते हुए गहरे रात 
यह अक्स भी क्या अजीब चीज है दोस्त....

महलों के शीशे हों या मन के आईने 
हर  टूटे हुए हिस्से भी कहते ,हो नये या पुराने
टूटे हुए खाबों से चाहे आह भी निकल जाते 
लिखता जाता अक्स हर एक पैमाने 
फिर भी अक्स नहीं भूला एक भी वादे अपने 
हर पल, हर लम्हां साथ चलने
और सच और सिर्फ़ सच ही बताने
यह अक्स भी क्या अजीब चीज है दोस्त....

Monday, 1 September 2025

समझ और समझौते

ये जिन्दगी, तेरे इतने  रंग कैसे ....


कभी  मायूसी में भी तूने हंस दिए 
तो कभी हंसी में भी भरे उदासी छाये...
ये जिन्दगी, तेरे इतने रंग कैसे...

कभी  तू रही मेरे समझ से परे 
तो कभी सिखाई तूने समझौते सारे 
ये जिन्दगी, तेरे इतने रंग कैसे...

कभी रगों में दौड़ते लहू गिरे 
तो कभी अश्कों में भीगे आन्चल मेरे
ये जिन्दगी, तेरे इतने रंग कैसे....

कभी पतझड़ में भी कोयल गाये 
तो कभी सावन में भी मोरनी रोये 
ये जिन्दगी तेरे इतने रंग कैसे....

पूरा ज़माना  खडा था  मेरे जनाजे पे मगर 
 एक तू नहीं आई थी  मेरे मजार पर
किस्मत का यह  कैसे तमाशे
ये जिन्दगी, तेरे इतने रंग कैसे....

जिंदगीभर हमने तेरे लिए 
तुझ से ही लडते रहे
ये जिन्दगी तेरे इतने रंग कैसे

कैसे तेरा यह  अजीब खेल , 
कैसी है यह तेरे समझ बोल, 
या है ये कहीं समझौते ऐसे
ये जिन्दगी ,तेरे इतने रंग कैसे...

कभी तूने बेहिसाब समझ भेंट दिए 
तो फिर कभी बेशुमार समझौते किए 
ये जिन्दगी, तेरे इतने रंग कैसे.....
ये जिन्दगी तेरे इतने रंग कैसे....