उस में कुछ परछाईयें, कुछ लम्हें ढूंढ रही थी
अर्से से जमें हुए धूल साफ़ करते करते
अखिर पन्ने पर एक तस्वीर पर अटक गई
पुरानी ,बेरंग, मासूम एक परछाई
शायद अर्से पहले खींची हुई तस्वीर थी...
वह तस्वीर किस की थी...
मेरी ही थी वह तस्वीर, पहचान गई
याद नहीं आया कब की थी
मगर थी तो पहचान सी, मेरी ही थी...
धुंधली सी नजर और बुझती हुई रोशनी
शायद कुछ कुछ कह रही थीं
कुछ लम्हें याद दिला रही थी....
कमजोर याददाश्त, बेबस आंखें
फ़िर भी कुछ याद किए,
कुछ अपने तस्वीरों से निकले
और सामने खडे हो गए
एल्बम के पन्नों पर से उतरे
और सीधे मेरे अन्दर आ गए....
कुछ साँसे बर्षों से हिसाब मांगें
कभी यादों से, कभी लम्हो से लडते रहें
कुछ धड़कनें खामोश अन्दाज से देखते रहें
कुछ अश्कों से सवाल किए
उस घडी से, वे लम्हों से
पिछे छुटा हुआ कल से
वह गली और रास्तों से
ओर वह तस्वीर से....
फिर कभी ना रुकता हुआ वह वक़्त से....
अचानक यह क्या हो गया ???
तस्वीर से एक नया चेहरा उभर आया
किसी की याद दिलाया
किस की याद आया???
आईना भी वही, अक्स भी वही
फिर मेरी तस्वीर कैसे नयी हो गयी...
सालों ठहर गए, तस्वीरें बोलने लगीं
एक परछाई, हकीकत हो गई...
एल्बम के चेहरे से उतर के
इंसान के बस्ती में नहीं
जैसे कोई फरिश्ता के घर आ गई
और अकेलापन से एकांत की
लम्बे सफर तय कर गई.....
मैं वहीँ खामोश खडे सदियाँ पार कर गई...
और एक परछाई हकीकत से बदल गई....
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