Saturday, 13 September 2025

शपथ के चक्रव्यूह

साथ चलते चलते जब पीछे मुड़कर हम देखे 
तुम वहाँ नहीॅ थे , 
कहाँ रह गए?
घडी दो घडी वहीँ खडे हो कर सोचे 
फिर वह घडी दिनों,महीनों, सालों में 
बदलते चले गए ....
और वह सोच एक इंतजार में
बदल गए, और वह धीरे-धीरे एक 
कभी न खत्म होने वाले इंतजार हो गये...

सपने जो देख रहे थे वह अधूरे रहे,
जो समझ रहे थे ,वह बिखर गए 
लम्हें जो हाथ में आते आते फिसल गए 
और वक़्त के साहिल पर चुपचाप खडे
 हम सोचते रहें...

जिंदगी और जीने के बीच में यह फासले 
कैसे आ गए ?
सपने जो अपने ही थे उस में यह अजीब दरारे कैसे पड गए....

पता नहीं कब  कैसे यह सोचते सोचते, 
जवाब ढूंढते ढूंढते 
सुबह शाम हो गए  
दिन महीने और सालों में बदल गये 
बहार पतझड में समा गए 
सावन अपने पहचान, अपने वजूद को 
रेगिस्तान के रगों में  तलाशते रहे .....

फिर जैसे एक दिन अचानक यह पता चला 

जीवन और जीने के बीच में एक 
चक्रव्यूह जो बन गया था 
फासले नहीं वह एक शपथ ही था 
एक शपथ का चक्रव्यूह ही था...
जिस में तुम अंदर चले तो गए थे 
तुम्हें उस से बाहर आने के 
रास्ता पता नहीं था...

सोचते रहें हम , तुम इस चक्रव्यूह में क्यूँ 
आ गए, क्या जरूरत थी ....

फिर अंदर से एक आवाज आई 
यह आवाज किस की थी ?
नजर ऊपर हो गई 
और दुआ बन गई....
और वह आवाज सुनी हमने,वह मेरी नहीं थी 
थी तो गोविंद की ही...
अपने शातिर मुस्कान ले कर 
सामने केशव खडे थे, 
कह रहे थे, समझा रहे थे हमें...
तुम इस खेल में अकेले नहीं थे 
सदियों से कहीं कितने लोग,  
कितने महान लोग इस 
शपथ के चक्रव्यूह में 
फंसते गए थे...
कभी गंगा पुत्र देवव्रत ही भीष्म हो गए थे
कभी द्रौपदी के खुले केश अपने शपथ के 
अभिमान बन गए थे 
कभी भीम के गदा  दुर्योधन, दुशासन के 
लहू के प्यासे हो गए थे 
तो कभी जयद्रथ के वध या 
अग्नि समाधि पर पार्थ अड गए थे...

क्यूँ फंस गए थे ये सब ?
ज्ञानी, गुणी, फिर भी ना समझ...

शपथ के चक्रव्यूह के मोह 
कहीं हस्तिनापुर जला दिया तो कहीं 
कुरुक्षेत्र लहू में बहा दिया, कहीं सूर्यास्त रोकने को केशव को मजबूर किया ,
कहीं दुर्योधन, दुशासन  से धरती को रिक्त
 करने के अभिमान ने 
अभिमन्यु खो दिया...

शायद चक्रव्यूह में केवल वह ही नहीं था....

थे तो पूरे कुरुवंश के सारे लोग 
था वह शपथ के चक्रव्यूह के मोह 
आहत ,नासमझी अभिमान, 
और धरती पर 
गिरे हुए अनगिनत बेबस,बेगुनाह लाश..

काश वे सब कभी उस शपथ के
चक्रव्यूह में न आ जाते 
और समझ पाते यह स्वाभिमान नहीं,
है तो यह अपने अपने अभिमान केवल 
और ना है  इस  में हस्तिनापुर,ना है 
कुरुवंश के भविष्य....

यह है तो केवल ऐसे अभिमान का जोश 
शपथ के वह चक्रव्यूह 
जिस में आ तो गए थे अनेक 
मगर वापस जाने का रास्ता तो 
केवल जानते हैं केशव...

अगर यही समझ लेते, शपथ नहिं सामर्थ्य से, अभिमान से नहीं अनुराग से
हुआ होता कुरुवंश के यश....

शायद शायद गोविंद रोक लेते थे 
वह महाभारत....

अब हमें समझ आया, यह फासले नहीं थे 
यह थे तुम्हारे कोइ फिर न  सोचे,
नासमझे  लिए गए शपथ ...
कभी ना बाहर आने की रास्ता 
मिलने वाली चक्रव्यूह के पथ...

यह भी था तुम्हारे एक और व्यर्थ अभियान, 
कैसे मुक्त होते तुम, कैसे रिक्त होते तुम 
जो महाभारत के अंत तक नहीं समझ पाये थे गंगा पुत्र भीष्म, महात्मा देवव्रत....

यह एक चक्रव्यूह ही तो है केवल, 
कैसा है यह शपथ.....





No comments:

Post a Comment