साथ साथ तो हर पल रहता
मगर बात कुछ नहीं करता....
बेजुबान फिर भी उसकी यह खामोश अन्दाज,
कैसे एक अनोखा ,बेमिसाल आदत
यह अक्स भी बड़ी अजीब चीज है दोस्त...
यह सुबह की रोशनी में खो जाता
या फिर अपनी खामोशी ढूंढ लेता
और शाम ढलते ही अपने अंदर सो जाता
यह अक्स भी कुछ बेताब अदाएं रखता
बेजान, बेबाक, बेहिसाब....
यह अक्स भी बड़ी अजीब चीज है दोस्त...
अक्सर आईना में झाँक कर
अपने आपको तलाशता
या तो कड़ी दोपहर में गिरे हुए पत्तों पर
बड़े आहिस्ते आहिस्ते चलते जाता
यादों के शहर में अपने आप के अंदर
एक नायाब मंज़र बना लेता....
बेशुमार लम्हों के परछाई पर
यह अक्स भी क्या अजीब चीज है दोस्त...
बीते कल पर कोई साया नहीं ,फिर भी
अपने दामन में सारे लम्हें समा लेता
बिना कुछ कहे बेजुबानों के भी
हजारों कहानियां बयां कर जाता....
यह इस की ख्वाहिश या तो खाब
यह अक्स भी क्या अजीब चीज है दोस्त....
ना काल पर कोई हक रखना चाहता
ना बीते हुए कल से लडता झगडता
ना आनेवाले कल से घबराता
केवल इसी एक लम्हों से गुज़र जाता
कुछ ले चलता अश्कों के साथ
यह अक्स भी क्या अजीब चीज है दोस्त...
दरिया के ठहराव हो या छलकता हुआ पानी
गहरा समुंदर हो या चंचल सी हिरनी
नीशर्त, बेसबब, फिर भी बेबाक जुबानी
सच, सिर्फ सच है अक्स की कहानी
चलते चलते हुए गहरे रात
यह अक्स भी क्या अजीब चीज है दोस्त....
महलों के शीशे हों या मन के आईने
हर टूटे हुए हिस्से भी कहते ,हो नये या पुराने
टूटे हुए खाबों से चाहे आह भी निकल जाते
लिखता जाता अक्स हर एक पैमाने
फिर भी अक्स नहीं भूला एक भी वादे अपने
हर पल, हर लम्हां साथ चलने
और सच और सिर्फ़ सच ही बताने
यह अक्स भी क्या अजीब चीज है दोस्त....
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