Monday, 8 September 2025

फिर यह सावन के साथ....

फिर एक सावन आज यहाँ आया है 
मेरे झरोखा के बाहर चुपचाप खडा है 
कुछ सन्नाटे और कुछ सवाल साथ में लाया है 

फिर एक सावन आज यहाँ आया है....

सालों पहले किसी एक सुबह के फुट पाथ पर 
महज पडे हुए कुछ कदमों के निशान 
और चंचल हवा के झोंकों के  साथ 
बह गये हुए कुछ लफ्ज....
वह साथ लाया है...

फिर एक सावन आज यहां आया है...

साथ बिताए हुए एक खूबसूरत शाम 
के कुछ बेताब लम्हें
सिगरेट के धुएँ के साथ पिघले हुए 
कुछ नज्म, कुछ खयाल उस के साथ आए हैं...

फिर एक सावन आज यहाँ आया है...

यह सावन भी पहले जैसा ही है 
अजीब सवाल और बेजुबान जवाब की तरह 
साथ चले चंद कदम और गुमसुम एक नजर की तरह 
फिर एक सावन आज यहाँ आया है....

याद दिला रहा है बर्षों पहले बीते 
कुछ घडियां,कुछ पहर और कुछ जज्बातों के 
कुछ पुराने ग़ज़लें और खोए हुए 
कुछ  पुराने खयालों के 

फिर एक सावन आज यहाँ आया है...

हमें जैसे लगा वह पुराने सपनों में खोया है 
और हमारे तरफ उम्मीद से देख रहा है..
शायद उसको कुछ कहना है  
मगर कुछ कह नहीं पा रहा है...
चुपचाप खिड़की के बाहर खडा है..

फिर एक सावन आज यहाँ आया है...

हम ने कहना शुरू किया...

साथ चलो हमारे  कुछ दूर आज 
आँखों  में जमें  हुए कुछ अश्क 
और खामोशी जो समझे नहीं थे आप 
आज जुबानी आपको कह देंगे 
 कुछ जिक्र करेंगे गैरों के 
और अपनी कहानी कह देंगे..

जिस राह पर आप चल देंगे 
वहाँ अपने आंचल हम बिछा देंगे 
और  पथ पर आप के 
एक दिया हम ज़रूर जला देंगे ...

आप समझ ना पाए तो क्या हुआ 
कुछ शाम इधर  काट देना, 
कुछ वक़्त यहां ही जी लेना 
आज यह सावन से कुछ कह देना...


शायद जिंदगी आप को आजमा लें 
और आप आप को ही यहां ढूंढ लें....
कोई अधूरी ख्वाब के साथ हो 
या कोई खुली किताब की बात हो 
कर लेना कुछ बात 
फिर यह सावन के साथ.....
फिर यह सावन के साथ...



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