Thursday, 4 September 2025

ला पता

पता नहीं चला कभी हम 
होते हुए भी लापता हो गए 
एक ही जगह पर तो बैठे थे 
फिर बेख़बर कैसे हो गये 
और वक़्त बेवक्त पर कहां खो गए 

सच में क्या हम खो गए ?
होते हुए भी लापता हो गए ?

जीवन तो लगभग ऐसे ही चलती थी 
सुबह समय पर आती थी 
दोपहर ऐसे ही अलसाती थी 
शामें पहले जैसे ही ढल जाती थी 

बारिश भी नहिं भूली थी 
झरोखे पर अपनी दस्तक देना 
ना ही चाँद छोड दिया था 
घर के बाहर खडे पिपल पर आना 

फिर हम कैसे खो गए ?
होते हुए भी क्यूं लापता हो गए 

वक़्त से पूछा आज हम ने 
कैसे खो गए हम और 
क्यूँ ढूंढ़ नहीं लिया हमें तुम ने....

वक़्त ने क्या बेमिसाल जवाब दिया....

तुम खो गए थे? सच में खो गए थे?
यह तो पता नहीं हमें, 

पता है तो बस इतना ही हमें 
तुम उतना ही रहे हमारे साथ 
जितना खुद को खुद ही रहने दिए....
कोई किसी को क्या पाएगा, 
क्या खो देगा, हम सब तो रेत पर आते जाते 
लहरें हैं, साहिल पर आते आते 
मौज में बह जाते और रेत पर 
लिखे हुए नाम हैं, जो, लिखते लिखते 
अगला मौज में मीट जाते.... 

समुंदर के लहर के साथ धुल जाते 
फिर भी दिल के कोने में कहीं रह जाते 
जितना  खुद को खुद ही रहने देते, 
दरिया के भीतर नहीं, किसी के 
दिल और रूह पर हम रह जाते...

तुम कहां लापता हुए नहीं, 
यह तो तुम्हारे भ्रम है, समय के 
धारा में बहती हुई नाम है, 
तुम मुझ में जो समा गए थे 
उसका तुम को खबर नहीं है, 
हो तो तुम हमेशा अन्दर मेरे,


कैसे और क्यों बाहर ढूंढ रहे हो अपने आप को 
तुम जो लापता कभी भी हुए नहीं हो....


1 comment:

  1. So well written...choice of words is excellent.👌👌👏👏💕

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