Saturday, 6 September 2025

निशान

कुछ लहू के निशान मिलें हैं 
आज इसी रास्ते पर   
अजनबी शहर में फिर किसी का
कत्ल हुआ होगा रात कल 
या शीशे पे  कोई चला होगा 
बहुत दूर यहां आज ....

यह शहर के छाती पर ,
यह सजर और पगडंडी पर
कुछ यादें सूखे, बिखरे मिले और 
कुछ लहू के दाग यहाँ आए फिर आज ....

कई छालों के निशानें मिले 
किसी के पैरों पर 
शायद कोई चला होगा जीवन भर
 बड़ी उसूलों पर 

फिर कलंक के कितने निशान मिलें 
कहीं किसीके  माथे पर 
शायद किया होगा बेइंतिहा मोहब्बत 
किसी अपनों से उम्र भर...
कहीं अश्कों के गहरे निशान मिलें 
किसी के पलकों पर 
शायद कोई खोया होगा अपना 
और ढूढ़ रहा होगा रात भर ...

एहसान के कई  निशान मिलें
किसी के दिल पर ,
सोचते सोचते बीत रहा है ताउम्र 
कैसे लौटाये वह  यह रिण भार...
शायद किसी ने बिना मांगे
 सब कुछ अपना  रख दिया होगा हथेली पर...

सोचता रहा कोई रात भर 
कैसे मिटाए यह निशान, 
कैसे चुकाए यह रिण
जो उम्र भर साथ निभाएं , 
और साथ चलते रहें 
जीवन के इस पार से उस पार...

कुछ लहू के निशान मिलें 
आज इस रास्ते पर.....



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