Tuesday, 23 September 2025

ख्वाहिश

मालूम नहीं था हमें 
हमारे मकसद क्या था 
और ख्वाहिश भी क्या थी 
यूँ अचानक आप रास्ते पर मिले 
कुछ कहा था की नहीं याद नहीं, 
हमने कुछ सुना था की नहीं वह भी याद नहीं 
बस याद यही थी की 
हम चलते चलते यूहीं चल दिए आपके साथ...
कुछ दूर, कुछ देर तक चले, चलते रहें ....
वक़्त से पहले और वक़्त के बाद....

पता नहीं चला हम क्या बात किए 
किस के बारे मे बात किए...
एक दूसरे के साथ...
बात रास्ते के थी, या मंजिल की 
या बात थी कुच्छ ख्वाहिशों की 
या चलते चलते खुद को तलाशने की..
या फिर वह था कोई खामोशी की दौर की...

दिन में चले थे 
हुई गहरी रात 
बेबाक, बेजुबान, वीरान रात 
चाँद छत पर नहीं था, 
शायद कहीं पीपल पर अटका हुआ था 
खिड़कियां बंद हो गए थे मगर 
आंगन में अपने हजारों कहानियां 
बिछा रखे थे....

तारों के घर में मेला तो नहीं था 
फिर भी वह एक दूसरे से कुछ 
गहरा सवाल कर रहे थे 
एक दूसरे के तरफ देखते हुए 
मुस्कुरा रहे थे....
चकोर भी जैसे जमीं पर खड़े
 सपनों का जाल बुना जा रहा था...
शायद उसे इसकी परवाह नहीं थी 
चाँद जमीन पर उतरता या नहीं 
वह तो बस प्यार की संगीत 
गाया जा रहा था....
उसे न पाने का जश्न था
न था खोने का गम ...
उसे न भूलने की कोई ख्वाहिश थी 
न बिछड़ने की परवाह ..
उस की बस एक ही ख्वाहिश थी 
वहीँ  खडे खडे 
ज़माने भर चांद को याद 
देखता रहे और उसकी रोशनी से भीगते रहे....

और हम सोच रहे थे हमारे ख्वाहिश क्या थी  
क्या था वह खयाल, आरजू भी क्या थी..
शायद हम एक हवा की तरह 
बह जाना चाहते थे 
कुछ खुशबू तुम्हारे रास्ते 
पर  बिखेर देना चाहते थे 

आज गुमसुम बैठे सोचते हैं हम, 
कब ज़माने बीत गए....
जब भी आप को याद किए,
जब भी आप खयाल में  आए 
दिल से कुछ दुआएं ही निकले....
हर हाल में खुदा आप को महफूज रखें
गम का साया भी न गुजरे 
आप के आसपास से ....


शायद यही हमारी ख्वाहिश थी, 
 यही हमारी आरजू भी 
 हर सुबह और शाम की दुआ भी 
 शायद इस जिंदगी के साथ भी.....
और यह जिन्दगी की बाद भी....


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