Friday, 22 August 2025

surrender- the eternal way ahead !



   All of us always love to have roses and roses ....on our path all through life. But life certainly can not gift us that  all the time. There will be thorns on our way also...So we need to accept and face the thorns as bravely and gracefully as possible as we have welcomed all the roses. We rather need to focus our entire energy in changing what we can and control our actions rather than concentrating on the numerous inevitable events of life and making futile and foolish efforts of changing the results which is squarely not in our control... As and when we really grow ,we understand and appreciate why there are unpredictable thorns on the ways amongst the lovely roses ,very carefully designed by the master craftsman ...none other than the eternal judge..The Almighty... Let's surrender and walk ahead...

Spare a thought ! Spare a moment  !!!

Friday, 15 August 2025

खुदा मुझे आज यही दुआ दें....

ये खुदा, 
आप के दुआ आज  फिर कैसे 
यहां बरसते गए 
जिंदगी भर बंद कई दरवाजे
जैसे अचानक खुलते गए....

कुछ साँसे रुक गए, 
कुछ  लम्हे ठहर गए .....

कुछ आँसू ऐसे बह  गए 
जैसे सारी जिंदगी की गिले, 
शिकवे  एक ही लम्हों  में धूल गए, 
और शायद कुछ बूंदे आंसूं हवा में घुल गए, 
कुछ धडकने ऐसे बिखर से गए
और साँसे आज उन्हें तरसने लगे....

यह जमीन और आसमान 
खामोश खडे देखते रहे...
शायद आज कुछ वर्ष ही नहीं 
जैसे कई जन्म ,
कई सदियाँ पार हो गए...

आसमान से भी कुछ अश्क गिरे, 
जमीं से मिलके फना हो गए....
बादलों ने  कुछ कह भी न पाए 
फिजां भी खामोश देखते रहें....

ये खुदा, 
आँखों में अश्क समुंदर हुए 
सारे दर्द इस में पिघलने लगे 
कैसी है यह कहर आपके 
आप की दुआओं को असर यही है...

क्या कहूँ, कैसे कहूँ 
किस इबादत से शुक्र करूँ...
आपके तो यही इंसाफ है, 
सच्चे दिल की दरबार है 

कुछ नज्म लबों पर चुप सी रहें 
खामोश आंखें बरसते गए 

ये खुदा, 
कभी सदियाँ बीते, आप खामोश रहें 
और आज एक ही लप्झ में झोली भर गए....
कड़ी दोपहर बीतने लगे 
दुआएं आप के बरसते गए 


 दया के वह सागर आप ही तो हैं 
क्या  मांगूं आप के दरबार से...
आज सिर्फ और सिर्फ यही दुआ है 
थोड़े और आंसू आंखों में दे दें 

किसी के पैरों से कुछ धूल मिटा दें....
थोड़े ही साँसों के मोहलत दे दें 
किसी के राहों से  कांटे हटा दें 
और यह अखिर कुछ धड़कन 
कीसी के नाम पर यहीं लिख दें 
और तेरी दुनिया में वापस लौटे
ये खुदा, आज यही दुआ दें....

     ....








Monday, 11 August 2025

क्या खोया ,क्या पाया ?

हमारे  दहलिज पर  आके 
आज के शाम ऐसी खड़ी हो गई 
सूरज डूब तो गया मगर जैसे 
साँझ उसकी घर की रास्ता भूल गई ...

घर के खिड़कियां तो बंद थे, 
दरवाजे पर भी कोई दस्तक नहीं 
फ़िर भी चाँद क्यूँ जमीन पर उत्तर आया 
अब तो तारे भी उठे ही नहीं...

वादियों में फूल अब भी गुमसुम बैठे हैं 
फ़िर फिजायें किस  सफर में निकल गए 
बागबान अबतक कहीं दूर  खडा है 
बहार आने को अब तो देर भी है....

अचानक यह हवा में क्यूँ गिली मिट्टी की 
खुशबू आने लगी ,
चमन में रात की परछाई भी क्यूँ 
यूं ही लहराने लगी 

यह शाम भी किसी तसव्वुर में खोने लगी 
और यह शहर  कई यादों में डूब गया 
और खामोशी की वह दौर अर्से के बाद 
आज फिर सामने आने लगा 

कई सवाल जो मन की गहराई पर 
 कई बार उठ कर  सो गए थे 
बर्षों के बाद आज क्यों 
उठ कर  खडे हुए .....
ज़िंदगी के यह अखिर चंद पल  
आप से और हम से कुछ सवाल किए ....


हम ने क्या खोया और क्या पाया !!!

हमें तो बड़ी ताज्जुब हुई, 
हर साँस जैसे सवाल किए जा रहे थे और 
हर धड़कन  उनके हाजिर जवाब दे रहे थे....

आप आए थे आप के लिए, 
चाहे भी अपने लिए, 
पाए भी अपने लिए  
और खोए भी अपने लिए
वहाँ हम कहीं दूर दूर तक नजर ना आए...

हम दूर खडे सोचते रहे 
साँसे और धडकनों  के बीच 
खामोश खडे बातेँ सुनते रहे 
बिते लम्हों को तलाशते रहे 
कुछ जवाब हम भी ढूँढते रहे....

एक बेबसी ने सवाल किया और 
एक खामोशी ने जवाब दिया 
एक बेरुखी ने कहता रहा और 
एक खयाल ने सुनता रहा 

क्या था वह सवाल, 
क्या था वह जवाब 
कैसी थी वह बेबसी 
कैसी थी वह बेरुखी 

आसमान के तरफ देखे 
तो चांद की रोशनी 
हमारी रूह को भिगोने लगे 
तारों ने अपनी रोशनी हमें परोसने लगे 

चाँद हमे ताकने लगा 
चारों ओर सन्नाटा घिरने लगा 
आसमान जमीन पर छाने लगा 
और खामोश लफ़्ज़ ने कहने लगा...


हम आए तो थे आप के लिए ,
लौट भी गए थे आप के लिए, 
अपने को कहीं दूर रखते रहे, 
सारे जिंदगी अपने आप को 
कहीं नजर ना आए 
और आप जब जब  फिर वापस आए  
सिर्फ और सिर्फ हम वहाँ खामोश
 खडें रहें आप के लिए...


फिर किस ओर जहां में 
वह चांद और तारों से,
वह खामोशी और बेबसी से 
वह जमीन और आसमान से, 
यह डूबता हुआ सूरज से 
या यह ढलती हुई साँझ से 
आप मिले तो अपने सवालों का 
जवाब पूछ लेना....
क्या खोया और क्या पाया ?
और यह जवाब किसी और जहाँ में
 हमें और हमारे खुदा के साथ साझा करना...

शायद वह पल में 
कई जन्मों को ज़ज्बात होंगे 
हवा रुक जाएगी और 
रात विरान रह जाएगी...
और आसमान और जमीन 
हमारे बीच खामोश खडे 
देखते रह जाएंगे ....

और आपको और हमें
एक जहाँ से दूसरी जहाँ
ले चलेंगे....


 












Saturday, 9 August 2025

इजाजत

वक्त के शाख से आज कुछ लम्हे  गिरने लगे,
परछाई के दामन मे आज फिर कुछ तोहमत लगने लगे,
बर्षों पहले से जो नजारे  गुमसुम बैठे हुए थे
वे इस कदर  क्यूँ  हमें  आज  ताकने लगे 

जैसे कोई पतझड़ में बहार आ गया 
मौसम में तो बदलाव न था, 
मगर कोई कोयल को संगीत का याद आ गया...
एक कोशिश की इंतजार था, 
कोई वादे के उम्मीद न था, 
अब कोई वादे की जरूरत भी क्या है 
जब साया भी तो हमारे साथ ही है, 
 आप  के अगर यह कोशिश भी नाकाम रहे, 
हम आप से  न  कोई वजह पूछेंगे, 

यह आप के लिए भी हमारे हर  कोशिश होंगे 
  अर्से  पहले जो वादे किए थे, उसे पूरा करेंगे 
अब  और  कोई वादे के जरूरत  ही क्या है 
जब  हर  एक साँस भी एक कोशिश ही तो है...

 क्या हुआ  जो  हम आप के जिद न  बन पाए, 
यह क्या कम है 
अगर  हम आप के  जिद  न सही आदत ही बन गए 
हम जैसे थे वे से ही रहें, बिल्कुल न बदल पाए, 
न वो जिद, न आदत  भी बदल पाए...
पता नहीं हम क्यूँ   बदल  न पाए, 
शायद  हम  कभी  और कुछ  रहे ही न थे...

आप को जिन लोगों ने सम्भाले और महफूज रखें, 
हम हर वो शख्स के शुक्र गुजर थे, 
आप हमारे लिए चिंता न करे 
खुदा के बड़ी रहम हम पर हैं 
और आप के हर दुआ भी साथ ही है 

एक आखिर ख्वाहिश बचा है हमारे 
इजाजत हो  तो आज आपको बताएं...
 अब आप अपने लिए भी थोड़ा जी लीजिए, 
हमें अच्छा लगेगा, 
कभी याद आये तो भरोसा करना,
सबकुछ जाने के बाद भी,  
 यही  एक हमारे आखिर अमानत है, 
हो सके तो 
उस से कभी आजमा लेना...

कभी खुदा आप को मिल गए तो 
हमारे लिए यही दुआ करना 
हम किसी की भरोसा न तोड़े 
इतना ही बस रहम करना...

आज जाने की इजाजत दे दो, 
फिर कभी  किस जहां में तुम से फिर मुलाकात हो जाए तो 
वो जिद या आदत बनाने का भरोसा रखना....




तुम कौन थे???

काग़ज़ पर रंग लुटाते लुटाते ,
कैनवास पर तुली चलाते चलाते, 
तुम खुदा के वह कहर से मिल गए थे....

तुम कौन थे ? 
तुम वह काग़ज़ भी थे, वह कैनवास भी, 
वह तुली भी तुम ही थे और 
जीवन में रंग भी  तुम ही तो थे...

तुम सिर्फ ख़यालों या 
ख्वाबों में  या एल्बम की तस्वीरों  
में ही नहीं थे, 
तुम सुबह की सूरज की 
रोशनी की तरह सहज और 
शाम की चाय की प्याले की 
तरह सुकून भी थे 
तुम सर्दियों में खिली हुई 
एक टुकड़ा धूप हुआ करते थे 
 तो कभी  पहली बारिश में भीगी हुई 
मिट्टी की  खुशबु थे,
 कभी फिर रात रानी की 
नीचे गिरे हुए मासूमियत भी थे, 
कभी तुम मेरे लिए 
वारिस शाह के पैगाम भी थे या 
हीर -रन्झो के ख्वाहिशें  थे 
कभी तुम धड़कन से निकले 
दुआ की बारिश भी थे 
या  सर्द सांसो में उठे 
धुआं की तरह बेमिसाल थे 

कभी तुम "प्रीतलडी" की  
कवर पेज की चित्रकार भी थे 
 तो कभी तुम्हारे पीठ पर उंगलियों में 
मेरा लिखा हुआ "साहिर" के नाम भी थे 

मेरा साल गिरा में लाए हुए  वह अनोखा तोफा के अंदाज  भी  तुम ही थे 
वह न गुलदस्ते थे, न कपड़े,
  न जेवर थे न जायदाद 
 वह था एक अनोखा अंदाज, 
दुनिया की मशहूर कवियों के 
 शायरी से नवाजा हुआ एक  घड़ी की डायल. 

तुम शायर तो नहीं थे, न आशिक मिजाज़, 
मगर तुम एक ऐसे हमसफर रहे, 
जो मुझे ऐसे समझ गए थे, 
न था कोई लफ्ज, न कोई अल्फाज, 
खामोशी की खूबसूरती तो कोई 
 तुम्हारे नजरिए से देखे,
और मोहब्बत की सादगी 
 तो कोई तुम से ही सीखे....

तुम समय की तरह अंतहीन 
और परछाई की तरह इत्मीनान...
दुनिया के हर शख्स से तुम अलग ही थे 
और  हर दस्तूर का बेजुबान जवाब भी थे...

तुम कौन थे...
तुम जिंदगी के साथ रहे, मौत पे भी कंधे दिए 
तुम्हें न बदनाम होने का डर था 
ना शोहरत कमाने की लालच...
तुम्हें तो बस वही किया 
जो  एक इंसान के लिए इंसान नहीं,
बस एक खुदा  ने ही किया...

तुम कौन थे?
इस जहाँ से उस जहाँ तक 
एक अनोखा एहसास थे ....
तुम मेरे इमरोज ही थे.....

  अब तुम से मैं बिदा ले ली हूँ, 
इस जहाँ से मैं उस जहाँ पर जब देखती हूँ, 
 तुम से क्या कहूँ ???


तुम्हारे लिए यही मेरी शुक्र गुजारी 
और यही मेरी दुआ...
युग युग तुम वही रहो,
 वहीँ रहो, ऐसे रोज रोज इमरोज़ बने रहो, 

बन तो कोई  कुछ भी सकता है ....

मगर मुश्किल है इमरोज़ होना...
रोज रोज क्या , एक रोज़ भी होना...


तुम्हारी अमृता....

(Dedicated to इमरोज़ and अमृता प्रीतम 's eternal journey )
   

यह क्या हो गया....

बड़ी मुद्दत के बाद हम  यह शहर में आए है, 
 मगर इस शहर में अब इतना सन्नाटा क्यूँ है!
क्यूँ लगता है यहां हर रास्ता बेबस है 
भरे बाजार में  भी हर शख्स अकेला है

यह शाम भी क्यूँ इतनी बदली सी है
यह सेहर भी  क्यूँ इतनी खामोश है..

 ये गालियाँ  क्यूँ खो चुके हैं अपने रौनक, 
ये सड़के भी  क्यों भूल चुके हैं अपने मासूमियत, 
यह हवा भी  क्यों खो दिए हैं अपनी रंगत, 
यह फिजा भी  क्यों भूल  चुके हैं अपने फितरत 

किसी से पूछ लिया, ये सब क्या हो गया, 
कोई धीरे से कहा, कल रात एक हादसा हो गया...
शायद दरिया में एक कश्ती डूब गया, 
 और शायद ही उस में से कोई बचा होगा, 
  जह्नोदिल से एक अजीब सी सिसकी उठा, 
शायद उस कश्ती में मेरा कोई अपना था. ..

वो ज़मीन भी उदास थीं, जहां कुछ लम्हे
आप गुजारे थे, 
वो शाम भी खामोश थी, वो सेहर भी बेबस ही थे, 
वो शजर भी परेशान थे, 
यह सूरज  के  किरनें भी  बुझा-बुझा से थे, 
चांद पर रोशनी की कुछ कमी सी थी 
चमन मे फ़ूलों की   भी कमी भी थी 
इस जहां से  एक रुसवाई थी....


 ऊपर   देखा  तो  उस जहां से रूह की  एक आवाज थी 
 वहां मायूसी नहीं एक महफ़िल सी थी...
बारिशों की बूंदे नहीं, साँसों की ग़ज़लें ही थी
एक अर्से के बाद हमने वो रूह  से फिर मिलें....
 आसमान मैं  बादल  की परछाई थी 
 और फिर एक नई सितारे की  ख्वाब  सी थी.....

एक चुटकी नमक

अजीब इत्तेफाक है यह  
आसमान से गिरे बूंदे 
नमकीन नहीं होते 
मगर समुंदर में गिरते ही 
फना  हो जाते 
और चुटकी भर नमक से समा जाते...

कुदरत  भी क्या कमाल है, 
सागर के 
हर एक बूँदों में नमक, 
हर एक लहर में नमक 
और दुनिया के हर एक
 आँसू में भी वही नमक...

शायद यह समुंदर और अश्क में 
कोई गहरा रिश्ता होगा, 
खुशी में भी,  गम में भी 
शायद वह एक जैसा होगा....

कहते हैं समुंदर कभी कुछ लेता नहीं, 
जो कुछ उस में आ भी जाता, 
पलटकर वह अगले लहर में 
उसे किनारे पर लौटा देता...
अश्क भी वही करता, 
सारे दर्द को धो लेता, 
सारे ग़म को पी लेता....


कहते हैं समुंदर के आंखें गहरे हैं, 
देखता तो बहुत कुछ है, मगर  कुछ नहीं कहता,
किनारे पर दो घडी बैठ गया कोई तो, 
साहिल पर उस का इतिहास  लिख देता....
अश्क भी वही करता
बिना कुछ कहे,बिना कुछ पूछे 
कितने कहानी लिख जाता...


लोग कहते हैं 
आँखों में समुंदर होते हैं और 
समुंदर  में आंखों जैसी गहराई 
यह अश्कों में भी नमक 
और समुंदर की हर एक बूँदों में भी वही...

कभी किसी ने समुंदर को 
 सूखते  तो देखा नहीं होगा 
ना ही अश्कों के परछाई...
कोई  यह कह नहीं सकता कितने 
लहरें उठते और मीट जाते हैं 
समुंदर के छाती पर, 
न ही कोई यह  जानता होगा 
आँखों में अश्कों की गहराई....

क्या रिश्ता है यह विशाल सागर और 
एक बूंद गिरी हुई अश्क के अंदर....
शायद वही एक चुटकी नमक का रिश्ता 
दोनों के बीच में होगा, 
दोनों में होगा  एक जैसा ही कोई  खुदाई..