Friday, 31 October 2025

अजीब इत्तफाक

कितनी अजीब इत्तफाक है दोस्त, 
समुंदर के गहराई से ताल्लुक रखने वाले भी 
कभी कभी तालाब जैसी बातेँ करते हैं ....

जिस समुंदर ने हजारों नदियां अपने सीने में 
समा लिया था,
उसी से ही पानी का हिसाब मांगते हैं....

जिस समुंदर ने सबकुछ लौटा दिया 
उसी की किनारे बैठे हुए 
खोने का एहसास जताते हैं ...

जिस दिया ने सदियों से एक ही लॅ
लेकर बैठी है 
उस से वफादारी की सबूत पूछते हैं ...

अजीब इत्तफाक है दोस्त 
हम जैसे एक अजीब दौर से गुज़रते हैं...

पास रहने वाले  अपनों को अपनों 
के खबर नहिं  है 
मगर अफवाह मिलों दूर फैली हुई है...

जिन अंधेरों ने सूरज को ढक लिया था 
वही सुबह से सवाल पूछते हैं...

जो  कभी कोई सवाल के जवाब नहीं देते थे 
वह आज खामोशी से हैरान हैं...

अजीब दास्तान है यह दोस्त, 
शायद हम कोई एक 
नायाब दुनिया में अब जीते हैं...

रात रानी के मुरझाने पर 
जिन के नजर भी नहीं गए थे कभी, 
आज वह एक पीले पत्ते के खातिर
 आँसू बहाते हैं...

जो इंसान को पत्थर समझ बैठे थे 
वह आज पत्थर में खुदा तलाश करते हैं...

अजीब इत्तफाक है दोस्त...
जो अश्कों के झील में नहाकर भी नमक की वजूद को नहीं समझ सके 
वही आज समुंदर के पानी में उसके ख्वाहिश को तलाशते हैं...

अजीब इत्तफाक है जनाब 
जो कल को तलाशते तलाशते 
अपनी आज को खो दिए 
वही आज बीते हुए लम्हों में 
अपने आप को, अपने आज को ढूंढते हैं....

अजीब इत्तफाक यह दोस्त
अजीब दास्तान है यह जिंदगी, 
जीते जी मौत से टकराती है 
और मरकर भी अमर कर जाती है...



ये खुदा, वाह रे तेरा यह क्या अदा...

ये खुदा, वाह रे तेरा यह क्या अदा!

तू आसमान पर दिखा नहीं 
जब तुझे मैं ख़ुद के खुदा मान लिया, 

पता नही, क्यों जमीन पे आकर बैठ गया 
ये खुदा, वाह रे तेरा यह क्या अदा....

जब हाथ से मैं तेरा 
कोई तस्वीर बना लिया 
अंगूठा मेरा काट कर
तूने मकसद पा लिया 
बताया भी नहीं  मैं क्या करूं 
लेकर बाकी बची ये उंगलियां...

ये खुदा, तू ही बता 
यह तेरी कैसी अदा...

सारे फूल कोई तोड़ लिया 
चमन तो किसी ने बेच दिया 
मगर ये खुदा तू ही बता 
वे तितलियों के क्या खता...

सारे बंधन छुट गया 
सारे उलझन मिट गया 
जब सारे सपने, सारे तारूफ
चिता के आग में जल गया....
तू ही बता वह ताल्लुक का मैं क्या  करूं 
जो दिल के आंचल में रह गया 

ये खुदा, तू ही बता 
वाह रे तेरा यह क्या अदा !....





Monday, 27 October 2025

घर

दिल में एक घर की तमन्ना थी, 
जिसको आज हम ढूंढ रहे थे...

ढेरों सपने बुने, नक्शे बनाएं 
यादें इकट्ठे किए 
पत्थर काटें,ईंटें जोड़ें 
चट्टानें बनाएं 
छत डालें ....

दिल में एक घर की तमन्ना थी,
जिसको आज हम ढूंढ रहे थे....

बगिचे में खूब गुलाब लगाए 
आन्गन पर दामी लन बनाए
सामने गेट पर सुइस कैमरे 
पोर्च पर संगमरमर चेहरे 
हर तरफ आर सी सी की दीवारें....

दिल में एक घर की तमन्ना थी, 
जिसको हम आज ढूंढ रहे थे....

जापानिज गाड़ियां गराज में 
चाइनीज वास ड्रॉइंग रूम में 
शानदार आर्ट दहलीज पे 
बोहेमियन सानडेलियर बालकोनी पे

दिल में एक घर की तमन्ना थी,
जिसको आज हम ढूंढ रहे थे....

पीछे मोड़ कर देखा,
तो वह घर कहीं नजर नहीं आया 
वह एक मकान ही बन गया था 
जैसे सपनों का वह घर से  मिलों दूर  
एक आलिशान महल वहां खडा था...

दिल में एक घर की तमन्ना थी,
जिसको आज हम ढूंढ रहे थे....

अर्से बीत गये, आंखें वही थे 
मगर सपने बदल गए थे 
चट्टानें  मजबूत तो हुए थे
मगर  वह मासूम आरजू कहीं खो गए  थे

दिल में एक घर की तमन्ना थी,
जिसको हम आज ढूंढ रहे थे....

इत्र के खुशबू से सारे मकान महक रहे थे 
मगर रिश्तों की चाहत कहीं छुट चुके थे 
वह तमन्ना वक़्त के रेत पर थके हारे 
 किसी एक कोने में सो गए थे 

दिल में  एक घर की तमन्ना थी...
जिसको हम आज ढूंढ रहे थे 

हम वहीँ खडे थे, 
मगर 
बर्षों पहले अपनों को, 
और अपने आपको कहीं
छोड़ आए थे....

दिल में एक घर की तमन्ना थी....
जिसको आज हम ढूंढ रहे थे....

घर के दहलीज पर खामोश खडे
दूर कहीं वह आंखें, वह सपने 
वह तमन्नाओं को ढूंढ रहे थे...

दिल में एक घर की तमन्ना थी...
जिसको हम आज ढूंढ रहे थे...


वहां वह घर  नहीं था , 
हम  एक बेजान, आलिशान 
मकान पर खडे हुए थे...

वह मासूम सपनों से मिलों दूर 
वह मकान की छाती  में 
वह घर को तलाश रहे थे...

दिल में एक घर की तमन्ना थी,
जिसको हम आज ढूंढ रहे थे....







Friday, 24 October 2025

क़ीमती तोहफ़ा

सुना है इस साल आप इस शहर में होंगे 
शायद तब मेरी सालगिरह की वक़्त होगा 


इतने साल के बाद फिर कुछ याद आ गई 
कुछ बीते हुए लम्हें ताजा हो गए 
कुछ खुशियां,  कुछ मायूसी 
बेफिक्र सामने खडे हो गए 

अर्सा बीत गया, मगर कुछ यादें 
बिल्कुल वेसे को वैसे ही  हैं
दुनिया के दस्तूर और समय के सैलाब भी 
उन्हें धुँधला नहीं कर पाए हैं...

एक सालगिरह याद आयी 
जिस दिन आप ने मुझे एक अजीब सी
तोहफ़ा दे दी थी....
कुछ वापस लेने की तोहफा..
अजीब इत्तफाक था वह  ....और 
अजीब  ताल्लुक़ है वह उस दिन से,
उस एक ही सालगिरह से मेरी 
कोई और सालगिरह ऐसे कोई तोहफा
लेकर कभी आयी नहीं...

बर्षों लगे समझने को 
कोई किसी अजीज के सालगिरह पर 
यह किस तरह तोहफा दिया...

"कुछ वापस लेने का"...

हर साल मेरी सालगिरह आती है, 
ढेरों लोग मुझे आशीर्वाद दे जाते हैं 
उस साल भी सभी ने मुबारक बात दी 
मेरी शुभकामनाएँ की 
माँ ने मेरे लिए मंदिर में दिया जलाई 
सब ने मेरे लिए दुआ मांगे 
मैं खुश रहूं, बेहद खुश...

किस्मत ने तो मुझे खूब आशिर्वाद दी है 
कभी बेसुमार आजादी से तो कभी 
किसी के बेमिसाल की समझ से ...
कभी रास्ता आसान करते हुए तो कभी 
मंज़िल मुकम्मल करते करते
कभी अचानक रेगिस्तान में
बारिश की मौसम भी लाके....
शुक्रगुजार हूँ मैं उसके
इस जिंदगी भर के लिए ही नहीं, 
यह जिन्दगी के बाद भी....

मैं हमेशा खुश नसीब रही 
हर सालगिरह मेरी अनगिनत लोगों के 
दुआओं से चहकते रहें हैं 
हमेशा की तरह ,आज भी रही...
मगर आज तक वह  एक ही उलझन 
उलझन ही रह गई 
वह एक की सालगिरह के पहेली 
अब भी  सुलझा ही नहीं....

आप ने मुझे ऐसे तोहफा क्यूँ दिया था...
वह आशीर्वाद  या कोई श्राप था..
वह आपके दुआ थी 
या आपने कोई मन्नत मांगी थी..
नहीं पता ....  यह सोचते सोचते 
बहुत वक़्त बीत गया है...

आप को याद होगा की नहीं 
यह भी मालूम नहीं 
आप ने ऐसे क्यूं किया था
यह भी  पता नहीं, 
उसका जवाब आज भी 
आप के पास है या नहीं, 
वह भी पता नहीं...

मगर मुझे इतना पता है 
आज मुझे यह सब आपसे 
पूछना भी नहीं...
जानना भी नहीं...

हो सके तो मेरे इस सालगिरह में 
मेरे लिए मन के अंदर एक दिया जला लेना..
अपने आप के साथ कुछ लम्हें गुजार देना 
अपने बालकोनी में खडे होकर 
किसी तारे के तरफ देख लेना 
और मेरे लिए दो मिनट के 
वक़्त निकाल कर दुआ कर लेना...
शायद उस में आपको समझ भी आ जाएगा 
किसीको कुछ "वक़्त " देना ही सबसे सुंदर, सबसे क़ीमती, सबसे अजीज तोहफा है...
शायद उस लम्हों में आप मुझे 
कहीं बेहतर समझ पाएंगे, 
और मेरी सालगिरह  भी
जरूर बेहतर गुजर जाएगी....

Monday, 20 October 2025

माफी

सबकुछ ठीक था, 
ठीक ही तो था 
कहीं कुछ भी कमी 
नजर नहीं आया था....

फिर अचानक कैसे 
सबकुछ बदल गया 
सबकुछ ठीक होते हुए भी 
जैसे कहीं कुछ बिगड़ गया 
सबकुछ ठीक होते हुए भी 
कहीं कुछ भूल हो गई, 
शायद कुछ गलत हो गया 
शायद बनते बनते कहीं कुछ टूट गया था ....

तमाम साल, महीने, सदियाँ बीत गए 
सन्नाटे में सैकड़ों बार अपने आप से बातें की 
रेगिस्तान से समुंदर तक ढूंढती रही 
एक जवाब, एक ही जवाब 
भूल कहाँ हो गई.....
सबकुछ ठीक तो था 
फिर भूल कैसे हो गई....

क्यों बना हुआ दुनिया बिखर सी  गयी 
हर ईंट में चट्टानों की मजबूती थी 
फिर वह घर तास के पत्तों की तरह
 क्यूँ धस गया , मिट्टी में मिल गया 
सबकुछ होते हुए भी
कैसे, कहां कुछ कमी रह गयी???

अर्से बीते, वह टूटे हुए सपने 
जुड़े तो नहीं, मगर खामोश हो गए 
आईना जो टूट गए थे, नए तो नहीं हुए 
मगर सवाल करना छोड़ दिये 
जो आँसू, रुकते नहीं थे
वे अब चुप हो गए 
जो मन बहुत से सवाल पूछता था, 
हर सवाल के जवाब तलाश कर रहा था, 
वह अब बिना जवाब से ही समझदार हो गया.. 

भूल कहाँ हो गई, 
किस से हो गयी 
मुझसे भूल हो गई 
या आपसे 
भूल हालात से हो गई    
या हम दोनों से हो गई?
आज भी यह सवाल सवाल हो कर रह गया...

मगर बात वहां नहीं रुकी
ऊपर  से कोई आवाज आई....
किसी ने तो अखिर  माफी  मांग ली 
और जैसे किसी ने माफ कर दिया...

भूल किस का था 
यह नहीं पता 
क्यूँ हो गया 
यह भी नहीं पता 
कैसे, कब ऐसी भूल हुई 
यह भी नहीं पता...
मगर शायद मैंने ही माफी मांग लिया 
सब से पहले अपने आप से 
फिर आप से 
फिर हम दोनों से 
और अखिर हालात से...

कभी सोचा है यह फिर कैसे हुआ ?...
यह भी नहीं पता था 
भूल किस की थी 
फिर मैंने माफी क्यों और कैसे मांग ली?

शायद मेरे आँसू आप को न सही
खुदा को मेहसूस हो गया 
उनका मन को कहीं धो लिया
मेरी कुछ सच्चाई उन्हें पिघला दिया...

वह एकदिन अचानक आसमान से 
ज़मीन पे उतरे, मुझे अपने कंधों पर उठा लिए और सारे आंसू पोंछ दिए और कहे
"माफ़ करने और माफी मांगने से 
बड़ा कुछ नहीं होता है....
क्यों ढूँढते हो भूल कैसे हो गई 
क्यों हो गई, और किस से हो गई 
यह सब मत पूछो अब, केवल 
माफी मांग लो ...उन से, हालात से, 
खुदा से, अपने आप से...
किसी और ने नहीं मांगी तो क्या हुआ, 
खुद के लिए माफी मांग लो 
उनके तरफ से भी मांग लो 
दोनों के तरफ से भी माफी मांग लो"

और शायद उसी पल, उस घडी
खुदा से दुआ की बारिश हो गई 
और मेरे सारे सवाल मिट गए, 
यकीन हो गया माफी मांगना जैसे कोई पूजा है 
और माफ़ करना कोई इबादत....
माफी मांगने वाले और माफ़ करने वाले 
दोनों ही बड़े नसीब वाले होते हैं 
खुदा के दुआ के हकदार होते हैं....
और मैंने आप को, हालात को 
अपने आप को माफ़ कर दिया...
खुदा  मुस्कुराते हुए मेरे 
हाथ में हाथ थामे, 
मेरे रास्ते पर एक सुकून की दिया जलाए 
और फिर जमीन से आसमान के लिए 
रवाना हो गए, 
मगर वे जो माफ़ी की दिया जलाए 
वह सदियों से मेरा, आप का और 
पूरी दुनिया के कितने रास्ते को रोशनी दी 
और उसी वक़्त दुनिया जन्नत हो गई...









शर्त

सासों पे शर्त, आँखों पे शर्त 
धडकनों पे शर्त,कदमों पे शर्त....

ये खुदा,
ये कैसी है तेरी खुदाई, तू ही बता
मैं तो तेरा ही गुलाम, तेरा ही बंदा
कैसा है यह जिंदा रखने का अंदाज तेरा 
हर कदम मेरी शर्त और शर्त से भरा.....

जीने पे भी शर्त 
मरने पे भी शर्त 
उंगलियों पे शर्त 
अंगूठे पर शर्त 
चिट्ठियों पे शर्त 
ज़ुबानों पे भी शर्त 
ज़ज्बात पर शर्त 
खामोशी पर भी शर्त....

खो जाने पे शर्त 
मिलने पे भी शर्त 


शर्त ही शर्त 
हर घडी,हर मोड़ 
हर पल, हर पग
सिर्फ शर्त ही शर्त....

वाह ! रे खुदा, 
कैसी है तेरी दुनिया 
और कैसे इन्साफ, कैसी तजुर्बा 
कैसी है तेरी खुदाई और दुआएं यहाँ....

ये खुदा, 
तू  ही बता 
यह जिंदगी  है या है तेरा कोई नया मक़सद  
समझ नहीं आया यह तेरी अदा का शतरंज..

ये खुदा तू ही बता 
यह कैसी दुआ की बारिश है तेरी 
क्या है भूल और क्या खता है मेरी.... 

ये खुदा, 
तू ही बता....
कैसे जी पाती 
यह शर्तें जिंदगी 
कैसे निभाता कोई 
ऐसी मोहब्बत ,ऐसी खुदाई....

ये खुदा, 
तू ही बता 
यह था मोहब्बतें शर्त तेरी 
या शर्तें मोहब्बत कोई....

कलियों पर शर्त 
चमन पर शर्त 
तारों पे शर्त 
चण्द्रमा  पर भी शर्त 

रात पर शर्त 
सेहर पे भी शर्त 
तितलियों पे शर्त 
भौरों पे भी शर्त....

थोड़े ही साँसे बाकी है, 
थोड़े ही धड़कन बचे हैं 
आखिर पडाव है मेरे खुदा 
तूने दे दिया है हर शर्त की दुआ 
मकसद तेरा पूरा हो गया
मौत भी खडी है यहां  देखता हुआ 

पहला और आखिरी  यह एक शर्त है मेरा 
खुद एक बार खुदाई से तू बाहर तो आ जा 
मेरी नजरिए में खुद को तरस जा 
खुद्दारी तेरा वहीँ छोड़ के  आ जा...

ये खुदा, 
मेरी एक ही ख्वाईश है आखिरी साँस से
एक ही शर्त, एक  ही अर्जी है तेरे दरबार पे

एक बार, सिर्फ एक बार तू आसमान से 
ज़मीन पे उतर  के आ जा 
सिर्फ एक दिन,सिर्फ एक ही बार
 तू  जी ले मेरे जैसा 
और मुझे एक बार ही जीने दे 
निसर्त, बेबाक, बेहिसाब ,तेरे जैसा 
साँस लेने दें अपनी मर्जी से 
मोहब्बत कर लेने दें अपने आप से 
शायद  तू  तभी समझ पाएगा 
खुदा की खुदाई पर ना सही 
तू भी हो जाएगा  फिदा 
देख कर तेरी ही अपनी अदा...

यह खुदा, तू ही बता 
सोच लें यह अदा, 
यह इंसाफ तेरा होगा 
सब से अलग और सब से जुदा...





Saturday, 18 October 2025

एक शिकायत, एक अमानत

सुना है आप आज इस नगर में आए हैं 
सुना है आप को बुद्धत्व मिला है 
और आप सिद्धार्थ गौतम से बुद्ध हो गए 

सुना है आपने बहुत कुछ पाया है 
बहुत कुछ खोया भी है...
किसी से पूछा मैंने 
क्या पाया बुद्ध ने 
क्या खोया सिद्धार्थ गौतम ने...

शायद कोई आप का अनुयायी होगा 
आप को बखूबी समझने वाला होगा 
या आप का कोई शिष्य होगा...
उस ने कहा, 
गौतम ने घर, परिवार, राज्य छोड़ दिए हैं 
ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, मोह, घृणा पार कर पाए हैं 
वह जो कपिलवस्तु के कुमार थे 
सिद्धार्थ गौतम से बुद्ध हो गए हैं...

खोज लिए मानवता के हर दुख के कारण 
पा लिए विधाता के अनमोल वरदान 
छोड़ चले सारे रिश्ते, सारे बंधन
मिटा दिए सारे फासले, सारे उलझन...
कोई चिराग ढूंढ पाए हैं 
सिर्फ अपने ही नहीं, सारे संसार के लिए 
दुख, दर्द मिटाने को निकल गए थे 
वह जो कभी सिद्धार्थ गौतम कहलाते थे 
वह अब बुद्ध बन गए, संत हो गए....

सुन रही थी मैं उनसे आप के व्यस्था, 
आप के संघर्ष की कहानी, साधना की गाथा 
केवल राज्य से नही ,राजा से नहीं 
पिता, माता,परिवार से नहीं 
पाखंड रूढ़िवादी धर्मान्धता से नहीं 
आपने ने तो संघर्ष किया है 
अपने आप से, मानवता के सारे 
दोष, सारे कमी, सारे दुखों के जड से 
तब जाकर तो आप संत बने  हैं 
सिद्धार्थ गौतम से बुद्ध हो गए हैं...

यह बुद्ध होना कोई आसान नहीं 
रोज रोज तो छोड़ो एक रोज़ भी नहीं ....

यह मैं कह रही हूँ गौतम, सिर्फ मैं कह रही हूँ, 
तुम्हारी यशु,तुम्हारी यशोधरा कह रही हूँ...
आप सारे संसार के लिए बुद्ध हो चुके हैं 
फिर भी यह  यशु की दिल की गहराई में 
एक कोना अब भी ऐसा ही रह गया है 
जहाँ आप पहले दिन जैसे 
सिद्धार्थ, गौतम ही रह गए हैं....

आप के सिद्धि कोई मामूली प्राप्ति नहीं 
सदियाँ बीत जाती है बहती हुई 
फिर भी लोग बुद्ध नहीं हो जाते हैं 
त्रस्त होकर जीवन से तो कई लोग चले जाते हैं 
घर, परिवार, राज्य छोड़ देते हैं 
मगर आप तो निकले थे स्वयं को ढूंढने 
किसी से त्रस्त होकर नहीं, ज्ञान की खोज में 
जो ज्ञान केवल सिर्फ़  आपके नहीं,
दुनिया के हर व्यक्ति के हो जाए 
और  हर किसी के पथ पर दिया जलाए 
और  हर  एक इन्सान को राह दिखाए...

आज आप को क्या ही बधाई देगी 
यह यशु,या यशोधरा आप की 
आप तो बुद्ध हो गए, 
सारे सुख दुख से परे हो गए 
यहीं एक दिया रख दिया है मैंने, 
आप के पथ के लिए ....
और इस दिया के अखिर लॉ के साथ 
कह देती हूँ आज ,
जो एक ही गिला है मेरी आप से 
कभी जो गौतम सिद्धार्थ होते थे, उन से...

मैं तो कोई गैर नहीं थी,
थी तो वही यशु आप की...
क्यूँ निकल गए आप  रात के सन्नाटे में 
कहकर जाते तो क्या होता मुझे
सिद्धि के मार्ग में क्या मुझे 
बाधा ही पाते !.....

        Xxxxx 

कोई आकर कहा  है मुझे 
आज कपिलवस्तु में बुद्ध आए हैं 
जन जन  जा रहे हैं मिलने उन्हें 
गौतम बुद्ध से आशीष पाने 
बुद्ध ने भी आप को बुलाया है...
"चलें आप भी उन के आशीष लेने "...

कहा मैंने फिर सज्जन से 
कहे आप फिर यह बुद्ध से 
"यशोधरा नहीं आएगी उनको मिलने 
मिलना चाहेंगे तो यहीं मिलेंगे..."

              Xxxxx
"भिक्षां देही" के आवाज सुनके
देखा मैं उन को बाहर आके 
वही सिद्धार्थ गौतम ही तो थे 
द्वार पर भिक्षु होकर खडे थे 
ज्ञान की ज्योति में झलक रहे थे 
सिद्धार्थ गौतम से बुद्ध हो गए थे....

"यशोधरा मैं...कभी आप जिसे यशु कहते थे 
सखा थे प्रभु,आज से आप मेरे गुरु हो गए "

क्या भिक्षा दूँ मैं आज आप के थाली में?
अखिर अमानत भेंट दी मैंने 
राहुल को आप को सौंप कर आज 
भेंट कर मेरी अखिर अमानत 
और दिल से बसा हुआ मेरी अखिर शिकायत 
मुक्त हो गई मैं अपने आप से  आज....







Thursday, 16 October 2025

क्या लौटाने आए हो?....

कुछ सामान देने आए थे तुम 
कुछ कपड़े  ,कुछ जुते ,  कुछ जेवर 
कुछ किताबें ,कुछ दस्तावेज
कुछ सामान लौटाने यहां थे आज तुम..


मगर वह कैसे वापस करोगे तुम 
जो लम्हें गुजर गए...
वह यादें जो किताबों के मुडे हुए 
पन्नों पर अटक गए हैं 

वह कैसे वापस करोगे जो खतों के 
कुछ मजमून में मिटा मिटा  है ...

उस वक़्त को कैसे लौटा सकोगे 
जिसमें एक मुस्कान अभी भी बाकी है 
और कुछ अश्क अभी भी
 पलकों पर छलक रहे है ..

लौटा सकोगे तो यह सब लौटा दो 
लौटा दो मेरे कुछ साँसे जो अभी भी 
तुम्हारें अंदर बाकी है...
लौटा सकते हो लौटा दो उस चौदवी के 
चांद के रोशनी , जो हम महसूस किए हैं 
लौटा सकते हो तो  लौटा दो 
वह नदी के किनारे पर बहती हुई हवा 
जहाँ हम कुछ घडी कभी बैठे थे 
लौटा सकते हो तो लौटा दो 
वह तारों के महफिल को जो 
आज भी यहां आते हैं 
वह ग़ज़लों के रूहानी रातों को
जो अब भी रुला देते है..
लौटा सकते हो तो लौटा दो 
वह खयाल, वह ज़ज्बात जो हम तुम पर 
और तुम हम पर खर्च किए हैं...

ये सब लौटा सकोगे???
 फिर नहिं तो क्यों और क्या लौटाने 
आए हो आज इधर ?????...

रख लो अपने पास 
वह कुछ गिने चुने साँसे हमारे
जो तुम्हारे पास हम रख आए हैं 
रख लो वह हंसी के कुछ झलक 
जो तुम्हारे पास हम छोड़ आए हैं....
रख लो हमारे कुछ धड़कनें 
जो हम तुम्हें दे चुके हैं 
रख लो हमारे कुछ आँसू जो अब भी 
तुम्हारे पलकों पे छलक रहे हैं...

शायद यही तुम्हारे लिए हमारे अंतिम उपहार 
रख लो यह खत,यह ज़ज्बात तब तक 
जब शायद किसी और जहां में हम तुमसे मिले और एक दूसरे के एहसान नहिं 
एहसास लौटा सकें....


बंटवारा

कभी कभी घरों में, परिवारों में 
दरारें पड जाते हैं 
बंटवारे हो जाते हैं 
आंगन के, जायदाद के 
 यहाँ तक बुनियादी रिश्तों के भी ...

कभी कभी तो सरहदों के भी 
बंटवारा हो जाता है 
नदी के पानी के भी बंटवारा हो जाता है 
आसमान तक बाद नहीं पडता बंटवारे से...

मगर कुछ एहसास के बंटवारा कैसे होगा 
कुछ सांसों के बंटवारा कैसे होगा 
कुछ वक़्त जो  बीत गया 
उसका बंटवारा कैसे होगा 
कुछ यादें जो दिल की किसी कोने में 
खामोशी से चुप हो गए 
उनके बंटवारा कैसे होगा....

जो देवकी की कोख है 
उसका बंटवारा कैसे होगा 

जो बासुदेव के आंसू हैं 
उनके बंटवारे कैसे होगा...

जीवन कोई बंटवारे के मोहताज नहीं 
उसके हर पल अलग ही है 
हर एहसास अपने आप में पूरी है 
देवकी अपने कोख से महान है 
यशोदा अपने ममता से...

बंटवारे की कोई जरूरत क्या है 
कोई क्या बांटेगा किसी के 
एहसास को, साँसों के जज्बातों को ...

यह कोई जायदाद या जमीन तो नहीं हैं 
ना कोई कीमत की मोहताज 
इनके बँटवारे कैसे हो सकता है...
यह जो एहसास की दुनिया है 
यह अपने आप में पूर्ण है...
चाहे वह देवकी की कारागार में 
जन्मे कृष्ण के पहला साँस हो 
या यशोदा के आंगन में खेलता हुआ 
कान्हा के पहला शरारत हो...
इनके कैसे कोई बंटवारा करे 
कृष्ण तो एक है, जीवन के स्रोत तो एक ही है 
फिर क्यों यहाँ बंटवारे की बात होती है???

Wednesday, 15 October 2025

वसीयत

घर के दहलीज पर बैठक है आज 
सब लोग आ चुके हैं 
दोस्त, रिस्तेदार, बच्चे सब बैठे हुए हैं 
डॉक्टर साहब अपने मोहर लगाएंगे 
मेरे होश आवाज ठीक है 
वकील सारे दस्तावेज तैयार करेंगे...
आज वसीयत बनाने की तारीख तय हुआ है...

किस को कौनसा घर, किस को कौनसा गाड़ी 
किस को कौनसा जायदाद दिया जाएगा 
कौन अलमारी में रखे हुए जेवर और पैसे लेगा 
किसको मिलेगा घर के आंगन, 
और किस को लॉन 
किस को कितना जमीन मिलेगा 
किस को कौन सा मकान....

ये सारे लिखे जाएंगे इस में, 
गवाह और  डाक्टर दस्तखत देंगे, 
वकील साहब मुहर  लगाएंगे...
जीवन का एक अखिर दायित्व है यह.
आज हो जाएगा मेरी वसीयत तैयार....

मगर घर के एक कोने में, 
एक बंद लिफ़ाफ़े में कुछ पुराने खत पडे हैं 
कुछ नज्म किसी पुराने डायरी में लिखे रखे  हैं 
कुछ पुराने क्यासेट  रेकॉर्ड प्लेयर के पास  हैं 
जिस में जमाने पहले के कुछ अफ़साने हैं..
लाइब्रेरी में आधे फटे आधे भीगे
 कुछ किताबों के पन्ने हैं....

यह सब के अंदर एक रूह के कुछ साँसे हैं 
कुछ अधूरे सपनों के खूब सूरत परछाई है, 
कुछ बेमिसाल खयाल है धडकनों के 
कुछ पुराने एल्बम के पन्ने में 
कुछ  खोए हुए अजीज धुंधले चेहरे हैं...
कुछ खूबसूरत लम्हें  हैं जिसे दिल ने 
तहखाने में बड़े प्यार से बर्षों से सजा रखा है...

ये किस के हिस्से में लिख दूँ?
किस वसीयत में लिख पाऊँ
इनके हकदार कौन हैं....
इसके ना कोई आज गवाह है 
ना  है कोई वकील 
ना कोई डॉक्टर इस पर मुहर लगा सकते हैं 
ना है कोई दावेदार मोहकिल...

शायद यह वसीयत में मैं कुछ लिख न पाऊँ 
और समय के समझ के लिए ही छोड़ जाऊँ....

Sunday, 12 October 2025

भरोसा

अर्से  पहले एक शाम मेरे कमरे में आयी 
कुछ खयाल और सवाल मेरे पास छोड़ गई .. 

महीनों लगे सवालों के जवाब ढूंढने 
वक़्त लगा वह खयाल को समझने 
फिर एक सुबह हमने तय किया 
वह शाम का  जो आभार रह गया 
वह सवाल का जवाब दे दिया जाए 
और वह खयाल का कद्र किया जाए ...

शायद वहीँ पर वह सुबह ने  शाम से
पहला मुलाकात कर लिया 
जिंदगी के साथ भी और जिंदगी के बाद भी 
कुछ सांसें साझा करने का वादा कर लिया...

वक़्त वहीँ ठहरे देखता रहा, 
शायद अन्दर कुछ बदल सा गया 
वही मुलाकात, वह घडी ,उस जगह 
कुछ एहसास को "भरोसे" में बदल  दिया...

हर एक वादे के पीछे एक वादा रह गया 
हर साँस ,हर वह भरोसे  का मंजर  हो गया...

फिर रास्ते में एक तूफान आया, 
वह घर बिखर गया 
कश्ती डूब गया 
और सपना टूट गया ....

वह तूफान क्यूँ, कैसे  आया 
कुछ याद नहीं रहा, 
मगर तूफान जाने के बाद लगा 
अन्दर कुछ टूट गया, कुछ खो दिया...

वह क्या टूट गया, 
वह क्या पिछे छूट गया 
क्या कश्ती के साथ साथ खो गया 
शायद वह मेरा " भरोसा " ही था...

तूफान क्या दिया, क्या लिया पता नहीं था 
मगर  एक गहरा ज़ख्म जेहन में रह गया था 
सारे अल्फाज़ मिट चुके थे 
साँसे कैसे अजीब सी चुप हो गए थे...
जीवन  फिर अपने पैरों पर  खडा हुआ 
वक़्त तो ज़ख्मों के इलाज कर लिया 
मगर लाख कोशिश कर के भी हार गया 
वह टूटा हुआ "भरोसा" जोड़ न पाया...

भरोसा, कोई दस्तावेज तो नहीं था 
उसे वक़्त बदल देता
वह एक बेहद नाजुक आईना था 
टूट गया एक बार, बिखर गया  
शायद वह फिर जुड़ नहीं पाया 

सब कुछ तो ऊपर से ठीक हो जाता है 
जीवन पटरी पर फिर चलने लगता है...
मगर कहीं अंदर से कुछ टूट जाता है 
कुछ यादें बिखर जाते हैं 
कुछ वादे अपने रास्ते भूल जाते हैं 
कुछ भरोसे पीछे छुट जाते हैं.....

वह शाम आज भी वह सुबह  का इंतजार में 
दिल की गहराई  में कुछ  ढूंढ रही है 
कुछ खोए हुए "यादें" और टूटे हुए "भरोसे "
को तलाश रही है...




Saturday, 11 October 2025

दो प्याले चाय

गाड़ी में धीमी धीमी आवाज में जगजीत जी के " यह जो जिंदगी की किताब है, यह किताब भी क्या किताब है " ग़ज़ल चल रही थी.  पिछले रात से बारिश बेहिसाब हो रही थी.  जैसे मानो आसमान ठान रखा था की इंसानों के फैलाए हुए सारे गंदगी धरती से साफ़ करने का. मैंने signal पे गाड़ी रोकी और window shield और सामने के कांच के ऊपर गिरता हुआ बारिश के बूँदों को निहारती रही.  जैसे लगा अभी अभी सावन ने कोई मायूस संदेश भेजा..
  रेड लाइट ग्रीन में तब्दील हो गई और सारे गाड़ियों के बीच में मेरी गाड़ी भी चल पडी ,मानो जैसे  conveyor बेल्ट में suitcases चुपचाप अपने लाइन में चल पड़े है...पता नहीं कब घर के पास वाले signal पर पहुंच गई.  गाड़ी में ब्रेक लगाई तो एहसास हुआ की इस बीच में कई और गजलें भी सुन चुकी हूँ..."तमाम शहर के रास्ते सजा दिए जाएं, हम आ गए हैं, कांटे बिछा दिए जाए ", " डूबना है तो इतने सुकून से डूबो की आसपास के लहरें को भी पता न हो "...फिर  " रफ्ता रफ्ता वह मेरे हस्ती का सामान हो गए "... गाड़ी अपने parking में लगा के मैं ऊपर चली गई, शायद बारिश के बूंदें अब भी  मेरी आत्मा को भीगे रखे थे...
       दरवाजा खोली,  लगा अंदर  से कैसी गिली मिट्टी कि खुशबु आ रही थी, मगर बारिश तो रात से इतनी हो रही थी की उस में  कोई रहम नहीं बची थी की वह कोई गिली मिट्टी की खुशबु की परवाह करें....  खैर, अब वह बारिश की ठंडक कम करने को चाय पिया जाए.  मैं कुछ और सोचते सोचते kitchen में पहुंच गई, मेरे favorite ग्लास वाली चाय की प्याली में पानी measure कर के saucepan में डाली, कुछ चाय पत्तियों मिलाई  अदरक, काली मिर्च की कुछ टुकड़े उस पानी में बिखेर दी, एक छोटी चम्मच चीनी डाल कर थोड़ी उबाल दी और glass के प्याले में छान ली चाय, थोड़ी milk powder मिला दी, बस हो गई चाय तैयार.  बर्षों से ऐसी ही चाय बनाने की आदत पड़ गई थी अब, जैसे की सामने कोई शख्स दूर से भी आ जाए  गाड़ी की break पे reflexly पैर आ  जाता है...जिंदगी भी ऐसी एक reflex ही है, जैसे जीने की आदत पड जाती है....

   मैं recliner सोफ़े के ऊपर आके बैठ गई, बारिश के धुन के साथ कुछ फैज के नज्म सुन ने को रिकॉर्ड player on की और चाय पीते पीते बारिश को साथ देते देते " यह काग़ज़ की कश्ती, यह बारिश का पानी..." गुनगुनाने लगी... यहां इस के अलावा कोई और शब्द ही न था....

   दरवाजे से घंटी की आवाज आई,  समझ नहीं आया ऐसे बारिश में कौन आ सकता... फिर वही पुरानी आदत...घर के किसी भी हिस्से से दरवाजे से घंटी आयी तो रोबोट जैसे दरवाजे के पास आके खोल देना, चाहे घर में कोई और हो ना हो दरवाजा खोलना मेरा ही काम का हिस्सा.  कुछ चीजें समय के साथ अपने अंदर ऐसे आ जाते हैं, मानो वह हमारे जहन के हिस्से बन जाते हैं, मेरे लिए घंटी सुनकर दरवाजा खोलना ऐसे ही एक हिस्सा बन गया था... दरवाजा खोल दिया...

आंखों को विश्वास नहीं हुआ " अरे अमित, आप...कैसे??? लफ्ज अटक गए थे आधे में.... आओ,आओ अंदर आओ, तुम्हारे raincoat से पानी  के धार छुट रहे थे... raincoat के बाबजूद भी तुम आधे भीग गए थे... मगर पता है मजे की बात क्या है...चालीस साल हो गए थे, हमें मिले हुए, मगर हम एक दूसरे को देखते ही पहचान गए... खुदा की रहम की क्या कमाल निशान है...चालीस साल में तो इंसान कई दफा मरकर भी पैदा हो सकता था...और यहां  हम दोनों में इतना बदलाव की बाकी तो थी की हम एक दूसरे को आसानी से पहचान पाए...समय और तकदीर ने कुछ बदलाव तो जरूर लाया होगा...तुम्हारे बाल कुछ ज्यादा ही सफेद हो गए थे और तुम पहले से थोड़े कमजोर हो गए थे और मेरे आंखें अभी बिना चश्मे के साफ़ नहीं देख सकती थी...
   पता नहीं मैंने तुम से कैसे कोई सवाल नहीं की, तुम यहाँ कैसे, इस शहर में, मेरे घर का पता कैसे मिला, कहाँ से मिला, मेरा खबर किस से मिली...यह चालीस साल में क्या क्या बदल गया...कुछ भी नहीं सवाल की मैंने... तुम्हें अंदर बुलाई, सोफ़े पर बैठने को कहा, तुम्हारे raincoat balcony में एक खुन्टि पर टांग दी, तुम्हें एक तौलिया बढ़ा दी,हाथ मुह पोंछ लेने को, बारिश जो तुम्हें भिगा दिया था...
   तुम्हें बैठने को कहा और मैं तुम्हारे लिए चाय बनाने चल दी kitchen में.  तुम्हें यह भी नहीं पूछा अब तुम चाय में चीनी लेते हो या नहीं, दूध कितना या milk powder डालूँ, अदरक और काली मिर्च तुम्हें पसंद है या नहीं अब...कुछ भी नहीं पूछा...चालीस साल हो गए थे Amit, चाय क्या चीज़ है, इंसान तो इंसान को पहचानने के नजरिए भी बदल देता है  एक दिन में, और यहां चालीस साल के बाद के बात कर रहे हैं...मैंने ऐसे ही चाय बनाई जैसे मैं रोज बनाने की आदत डाल दी हूं...मैं चाय बना रही थी, तुम drawing रूम के इधर उधर थोड़े देखे, बुक rack में, musical कैबिनेट में थोड़ी नज़र डालें और उठ कर balcony के garden chair पे बैठ गए... दूर तक बारिश के बूँदों के आवाज के अलावा बाकी सन्नाटा था...चाय बन गई थी.  मैं बीच के मेज पर चाय की tray रख दी, यह भी नहीं पूछा तुम से पानी दूँ या biscuit भी दूँ चाय के साथ..जैसे कुछ पूछना था ही नहीं... तुम चाय पीने लगे...कुछ बोलना चाहते थे शायद...चालीस साल हो गए थे, कहने को तो बहुत कुछ होगा, हर रास्ते के कई किस्से होंगे तुम्हारे पास भी और मेरे पास भी...पता नहीं कैसे कुछ सुनने सुनाने को मन नहीं किया, मैंने शायद खामोशी से तुम्हें देखती रही, चाय की प्याले से उठते धुएँ से शायद सारे गिले, शिक्वे पिघल गए थे, अदरक और काली मिर्च की सुगंध के  साथ बर्षों के जमे हुए सवाल, जवाब और कड़वाहट घुल कर हीना  और चंदन के कुछ अजीब सी खुशबु बन कर घर और मन को महका दी थी...मेरे आंखों से शायद तुम पहली बार पढ़ लिए थे, अब माजी को नहीं इस लम्हे में जीवन को तराशा जाए...पहली बार लगा चालीस साल के बाद तुम मुझे  और  जिंदगी  को पहले से कहीं बेहतर समझ पाए...

   चाय ख़तम हो गई थी...बारिश भी कम हो रही थी...तुम्हारे जाने का वक़्त हो रहा था...मैंने तुम्हारे raincoat पोंछ दी थी,कुछ देर एक खामोशी बीच में आ कर बहुत कुछ कह गई थी...मैंने तुम्हारे पैर छुने को झुक गई और शायद मेरी आंखे भर आयी थीं...तुम ने मेरे आंखें पोंछ ने को हाथ बढ़ाते बढ़ाते अटक गए और हम फिर कुछ देर सन्नाटे में jagjit जी को सुनते रहें..." लंबी दूरी तय करने को वक़्त तो लगता है....गांठ अगर पड जाए तो  फिर रिश्ते हो या डोरी, लाख कोशिश कर लो  खोलने को,   वक़्त तो लगता है,...हमने इलाजे  ज़ख्मों दिल के  ढूंढ लिया  है लेकिन...गहरे ज़ख्मों को भरने में वक़्त तो लगता है  ...नए परिन्दों को उड़ने में वक़्त तो लगता है..."

   तुम उठे, मैं दरवाजे तक तुम्हें छोड़ने को आई और तुम बिना पिछे मुड़े सीढ़ियों से नीचे उतर गए...मैं वापस घर के अंदर आई, कुछ देर balcony में जाकर बैठी और वे दोनों खाली चाय प्याले को देखती रही... जैसे चालीस साल के हर लम्हें उस गरम चाय के प्याले से उठे धुआं से पिघल कर चट्टानों की तरह मेरे रूह में मिल  जा रहे थे...वही हीना और चंदन के महक के साथ...बाहर बारिश लगभग रुक गयी थी...बादल के कुछ बूंदे सामने के पिपल के पत्तों से खेल रहे थे और रात की रानी की हर पत्ते कुछ ज्यादा ही रंग बिखर रहे थे...दो garden चेयर के बीच के मेज पर दो खाली चाय के प्याले खामोशी से कुछ कुछ कह रहे थे..

   बाहर कोई घंटी बजाया, मेरे आंखें खुल गईं, देखा तो " रसीद टिकट "  पढते पढते पता नहीं चला था कब आंख लग गई थी...दरवाजा खोली, दरवाजे पर खडा इस्त्री वाला बोला कबसे घंटी बजा रहा था, मैंने उस से कपड़े गिन के रख लिये, पैसे दिए और balcony में जाके बैठ गई...मेज के ऊपर दो नहीं एक ही चाय की खाली प्याला था...

Friday, 10 October 2025

बंद दरवाजे

कुछ लम्हें आज यहां मेहमान बनकर आए 
पास बैठे बड़ी देर, कुछ यादें भी साथ लाए 
कुछ दर्दे उभर आए, कुछ ज़ख्में ताजा हो गए 
कुछ तस्वीरें, कुछ परछाइयाँ पास आए.... 

कुछ दरवाजे पर नजर ठहर गए 
कुछ बंद और कुछ खुले दिख गए....

बर्षों पहले शायद ऐसा कुछ हुआ होगा 
इंसान नहीं कोई फरिश्ता यहाँ आया होगा 
यह पुरानी हवेली में कोई नया दरवाजा बना होगा 
और वह फरिश्ता यहां जिंदगी और जन्नत दोनों साथ लाया होगा...
सारे मोहल्ले में रोशनी, सारे मुल्क में सादगी 
सारे आसमान में सितारे और सारे सन्नाटे पर आहटें....

जैसे खुदा अपनी मर्जी से यहां चले आए, 
जैसे दुआओं की बारीश हुई आसमान से...

वह नया दरवाजा, वह रोशनी, वह सादगी 
वह दुआएँ शायद ही सदियों में कभी तो आती...
उस दरवाजे के पीछे कोई खडा था 
मासूम, बेनक़ाब, कोई रूह का रूप था 
यह रोशनी, यह सादगी और वह दुआओं से 
मोहब्बत कर बैठा, जन्नत समझ बैठा उसे...


                      xxxxx


पता नहीं अचानक वह दरवाजा बंद हो गया 
क्यूँ, कैसे, कहाँ, कब इसके कोई जवाब नहीं था 
न था कोई रोशनी की सुराग 
न था मंजिल की राह 
ना था पिछे मूड ने की ताकत 
ना आगे निकलने की हिम्मत...

वह जैसे वही रह गया , वहीँ रह गया 
बेजान,बेजुबान जैसे वह खामोश दिल सो गया 

साँसे चलते तो रहे मग़र जैसे जीना भूल गया 
दुनिया वही था, फिर भी सब कुछ जैसे बदल सा गया...

पता नहीं, फिर एकदिन कुछ अजीब हो गया 
अंधेरे में एक गली से एक हल्का आवाज आया 
कोई रोशनी का एक दिया जलाया 
कोई इंसान के बस्ती से वहां एक चाबी लाया 
सदियों से बंद पडे दरवाजा खोल दिया..
कोई प्रश्न नहीं पूछा, 
कोई जवाब नहीं मांगा 
शायद कुछ कहने से पहले सुन लिया 
शायद कुछ न सुने भी समझ गया...

वह दरवाजे के अंदर अब वह रोशनी की तेजी नहीं थी 
थे कुछ सुकून की साँसे,कोई रुके कदमों के परछाई सी..

वह जमीन थी की जन्नत 
वहाँ बारिश थी की ठंडक 
वह दुआ थी की खुदा की मोहब्बत 
पता नहीं कुछ, पता करना भी नहीं यह सब 

यही पता है, कोई इंसान आज यहां आया 
वह बन्दे से फरिश्ता हो गया 
कुछ बंद दरवाजे खोल गया...
मोहब्बत को इबादत में बदल गया...

कोई फरिश्ता फिर आज यहां आया...
सदियों से बंद पडे कोई दरवाजा खोल दिया 
कुछ सुकून भेंट दे कर गया 
कुछ सांसें  किसी और  के लिए छोड़ गया 

एक फरिश्ता फिर आज यहां आया.....








Wednesday, 8 October 2025

ଶେଷ ସଂଳାପ

ରଶ୍ମି ରଥି ଚାହିଁଲେ ଉପରେ 
ସୂର୍ଯ୍ୟ ଆଉ କେଶବଙ୍କୁ ପ୍ରଣାମ ଭଙ୍ଗୀରେ ...
ବିଦାୟ ଦିଅନ୍ତୁ ପିତା ମୋର ଏବେ 
ହେ କେଶବ ମେଲାଣି ବି ତୁମେ ଦିଅ ମୋତେ....

ଦିବସର ଶେଷ ରଶ୍ମି ମଥା ପୋତି
ଛିଡା ହୁଏ ନତ ମସ୍ତକରେ....
ନଇଁ ଗଲେ ସୂର୍ଯ୍ୟ ଚନ୍ଦ୍ର ଆଜି 
ଧରା ସରା ବୁଡି ଗଲେ ଅଶ୍ରୁ ପାରାବାରେ 

କୁରୁକ୍ଷେତ୍ର ସ୍ତବ୍ଧ ଆଜି 
ପବନର କୋହ ରୁଦ୍ଧ ଏଠି 
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ନୟନ ରୁ ବହି ଯାଏ 
ଶେଷ ଲୁହ କିଛି 
ଶେଷ ରକ୍ତ ବହିଯାଏ 
ତା ହୃଦୟ ରିକ୍ତ କରି ଧରିତ୍ରୀ ଭିଜାଇ 

ଶୋଇଗଲା ଐରାବତ ,ହିମାଳୟ ପରବତ 
ହୋଇ ଗଲା ଜୀବନରେ ଆଜି ରୁଣ ମୁକ୍ତ ...

ଗଛ ପତ୍ର ମୂକ ଆଜି 
ଯାଇଛି ତ ଗଙ୍ଗା ବକ୍ଷ ଶୁଖି 
ରାଧେୟ  ର ଶେଷ ସ୍ମୃତି 
ରାଧା ମା' ର ପଣତ ରେ ଲାଗି 

ନୀରବତା ନିସ୍ତବ୍ଧତା ଚତୁର୍ଦିଗ ଭରା 
କାନ୍ଦେ ଆଜି ଶଶା , ଗରା ,ଧରା ...

ନୀରବ ଏ ମୁହୂର୍ତ୍ତରେ ଉଭା ହେଲେ 
ଦାନ ବୀର ବାସୁଦେବ କୃଷ୍ଣ ଙ୍କ ସମ୍ମୁଖେ 

କହନ୍ତି କୌନ୍ତେୟ ଭରି ଆବେଗ ଆଶ୍ଳେଷ
ପ୍ରଭୁ ତୁମେ ଥାଉ ଥାଉ ଏକି ନ୍ୟାୟ କଲ 
ନିରସ୍ତ୍ର,ନିହତ୍ଥା କର୍ଣ୍ଣ କିମ୍ପା ତୁମେ ନ ଦେଖି ପାରିଲ
ଶିର ଚ୍ଛେଦ କରିବାକୁ ଧନଂଜୟେ ଅନୁମତି ଦେଲ 

 ତୁମେ  କିବା  ଅଜ୍ଞ ଥିଲ ଯୁଦ୍ଧ ର ନିୟମ 
ରଥାରୁଢ଼ କରିବନି ଭୂମିଷ୍ଠ ରେ ପରା ଶରାଘାତ 

ଅସହାୟ, ନିରସ୍ତ୍ର ରାଧେୟ 
ରଥ ଚକ ଧରାଶାୟୀ ଯାର
କରିଣ ନୀହତ ତାରେ 
ପ୍ରଭୂ ତମେ କିଆଁ ନେଲ ଅପଯଶ ...
ନିରସ୍ତ୍ର ଅଭାଗା କର୍ଣ୍ଣ  ଲଢୁଥିଲା  
ଜୀବନର ଶେଷ ଯୁଦ୍ଧ ତାର...

ମୃତ୍ୟୁ ମୋର ଚିର ସହଚର, 
କରିଛି ମୁଁ ଆଜୀବନ ପ୍ରତିକ୍ଷା ତାହାର 
ଯେମିତି ପ୍ରିୟା ର ପଥ ବସିଛି ମୁଁ ଚାହିଁ 
ତେଣୁ ମୃତ୍ୟୁ ତିଳେ ମତେ ଭୟ ଦେଇ ନାହିଁ..

ତଥାପି  ଗୋବିନ୍ଦ  ମତେ
ଏକ ଛୋଟ ଭେଟି ଦିଅ ଆଜି 
ଏ ଅକିଞ୍ଚନ ମୃତ୍ୟୁ ପଥେ ପାଥେୟ ରେ 
ଏ ପ୍ରଶ୍ନର ଉତ୍ତର ମାଗୁଛି...

କହନ୍ତି କେଶବ ଶୁଣ 
ଶେଷ ବାର୍ତ୍ତା ମୋର 
ହେ ଦାନବୀର, ରାଧେୟ,କୌନ୍ତେୟ 
 କୁରୁକ୍ଷେତ୍ରେ ତମ  ପ୍ରାପ୍ତି,  ନ୍ୟାୟ କି ଅନ୍ୟାୟ 

ମହା ବୀର, ମହା ଦାନୀ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସଖା ତୁମେ
କାଳେ କାଳେ ତମ ଯଶ ରହିବ ଧରାରେ 
ନିରସ୍ତ୍ର, ଭୂମିଷ୍ଠ ମୃତ୍ୟୁ ଲେଖାଥିଲା  ତୁମ ଭାଗ୍ୟେ 
ଅଭିଶାପ ମୁକ୍ତ ହୋଇ ଚାଲିଯିବ ତୁମେ ସ୍ଵର୍ଗଲୋକେ 

ମହାବାହୁ ତମେ କି ଅଜ୍ଞାନ 
ଧର୍ମକ୍ଷେତ୍ର କୁରୁକ୍ଷେତ୍ର ଏହି ରଣାଙ୍ଗନ
ଏଠି ନାହିଁ ଭଲ ମନ୍ଦ ଭେଦ ଭାବ 
 କେହି ନୁହଁ ଶତୃ ମିତ୍ର ଭୂତ ଭବିଷ୍ୟତ 
ସତ୍ୟ ପଥେ ଯେତେ ବାଧା ସୃଷ୍ଟି ହୋଇଥିଲା 
ଏ ଯୁଗର ଅବସାନ,ଏ ଯୁଦ୍ଧ ରେ କେବଳ ହୋଇଲା 
ଅନ୍ୟାୟର ଦିଗବଳୟ କେଡେ ବିସ୍ତାରିତ 
ଅଧର୍ମ ବଳୟ ମଧ୍ୟେ ନ୍ୟାୟ ପାଇଁ ହସ୍ତ ପ୍ରସାରିତ 

ତମେ କଣ ମୂକ ପରି ଦେଖିନାହିଁ ଲାକ୍ଷା ଗୃହ 
ବିଷ ଲଡୁ ,ପଶାଖେଳ ସବୁଠି କପଟ 
ଇନ୍ଦ୍ରପ୍ରସ୍ଥ ପାଟରାଣି ଅପମାନ, ନିରୀହ ନିବସ୍ତ୍ର 
ଦୁଶ୍ଚରିତ୍ର ଦୁଃଶାସନ, କୁରୁସଭା ମୌନବ୍ରତ 

ଶାନ୍ତିଦୂତ ବନ୍ଦୀ ହୁଏ ଯେଉଁ କୁରୁ ସଭା ତଳେ 
ସଭିଏଁ ଯେଉଁଠି ମୁକ,ବେବସ ଲାଚାର 
ଭୀଷ୍ମ, ଦ୍ରୋଣ, ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର, ସବୁ ଗୁରୁଜନ 
ସେଠି ଶାନ୍ତି, ମୁକ୍ତି, ସତ୍ୟ, ନ୍ୟାୟ ଅସମ୍ଭବ 

ମୁଁ ନାରାୟଣ, ସୃଷ୍ଟି କର୍ତ୍ତା କେବଳ ମାତ୍ରକ
ଅନ୍ୟାୟର ଅନ୍ତ ଆଉ ସତ୍ଯ ର ରକ୍ଷକ 
ମୋର ନାହିଁ  ଏଠି କେହି ଶତୃ ଅବା ମିତ୍ର 
ଧରାରେ ଆସିଛି ସତ୍ୟ,ନ୍ୟାୟ ରକ୍ଷା ପାଇଁ ମାତ୍ର 

ହେ କୌନ୍ତେୟ, ସୂର୍ଯ୍ୟ ପୁତ୍ର ,ମହା ଦାନବୀର 
ଘେନ ଆଜି କେଶବ ର ଶେଷ ଅର୍ଘ୍ୟଦାନ 
ସ୍ଵର୍ଗର ପାଥେୟ ହେଉ ଧର୍ମ ସତ୍ୟ,ତ୍ୟାଗ ବଳି ଦାନ 
ରୁଣ ଭାର ହେଉ ରିକ୍ତ,ପ୍ରାପ୍ତ ହେଉ ବୈକୁଣ୍ଠର ଧାମ ....








Monday, 6 October 2025

हिसाब

कुछ हिसाब बाकी है 
वह शाम के  पन्ने के पास 
उसे पूरा तो करना होगा 
कुछ हिसाब बाकी है 
खतों के मजमून के साथ 
उसे जवाब तो देना होगा 
कुछ हिसाब बाकी है 
वह पुराने फुटपाथ पर
उसे चुकाना तो होगा 
कुछ हिसाब बाकी है 
वह गुलमोहर के नीचे 
उस से माफी तो लेना होगा 
कुछ हिसाब बाकी है 
एक दोपहर के धूप से 
उसे अश्कों से धोना होगा 

कुछ हिसाब बाकी है 
एक सपनों के छाती पर 
उसे जीते जी देखना तो होगा 
कुछ हिसाब बाकी है 
आखिरी सवाल के पास 
जवाब तो देना होगा 

यह सारे हिसाब किसी रोज 
यहीं करना ही होगा 
जन्नत या जहन्नुम 
कहीं तो जगह होगा 
कुछ हिसाब चुकाना है 
आज नहीं तो कल 
यहाँ नहीं तो वहां 
इस जहां में नहीं तो 
किसी और जहां में 
कुछ पाकर या खोकर 
कुछ सबक सीखकर 
या कुछ ठोकर खा कर 
हिसाब तो देना होगा 
कर्जा चुकाना होगा...

कुछ पुराने हिसाब है 
उसे चुकाना तो होगा 
यहां भर नहीं पाओगे 
तो किसी और वहां में 
वक़्त और वफा के साथ 
 कर्ज चुकाना तो होगा...
कुछ अश्कों के हिसाब है 
उसे आह के साथ चुकाना होगा 
कुछ साँसों के कर्जा है 
उन्हें घुटन के साथ चुकाना होगा...

कुछ हिसाब बाकी है 
कभी ना कभी चुकाना ही होगा....

महा समर की पुकार

यह है महा समर की  रणभूमि
महाभारत का है प्रांगण 
यहां समय नहीं है खडा आज 
सुख दुख  या हार जीत का प्रश्न लेकर...
 
उठो है पार्थ, उठाव धनुष,
यह है अंतिम संग्राम 
जीवन का उतार चढाव का 
यह है शेष प्रहर....
बहुत हुआ समझना समझाना, 
समझौता करना और सहना....
अझात रहना और बारहवें वर्ष बन में बिताना 
बहुत हुआ है अन्याय, अधर्म के साथ रहना...


गांडीव में प्रत्यंचा चढाव 
त्याग दो सारे बंधन और अहंकार ...
मत भूलो यह संघर्ष ना है तुम्हारा या उनका 
ना  है कौरव और पान्डबों  के भीतर 

है पार्थ, तुम लाख कोशिश कर भी लिया है 
सैकड़ों बार जन्म लिया है, 
दुर्योधन यहां मानते नहीं हैं 
जिनके भाग्य में विनाश लिखा है 
वह प्रज्ञा के दिया जलाते नहीं है....
वह कृष्ण की पूजा करते नहीं है ....

नारायणी सेना इछते वही 
हर गलती को ठहराते सही 
नारायण इन्हें मिलते कैसे 
चले थे  जो बांधने गोविंद जैसे....

उठो पार्थ अभी कायरता त्यागो 
अपने निद्रा से अभी तो जागो 
यह संघर्ष  है  आज शांति की  
यह धर्म-अधर्म के बात की 
यह  युद्ध है सत्य -न्याय की 
अतीत और आने वाले कोइ वक़्त की....

तोड़ लो सारे बंधने, 
अपने पराये के उलझने 
हर कोई यहां अजनबी 
मत करो कोई शोक अभी ....
या तो यहाँ  कोई  आज भी 
सत्य का है सारथी 
नहीं तो साथी है झूठ की....

मत भूलो तुम नर हो 
नारायण के अंश हो 
हर कोई लड रहा है रण
अपने हिस्से का अंतिम प्रण...


हर कोई यहां अकेला है ,
निसंग, बेबस, लाचार है
असत्य की यह भीड में
महाभारत की रण में....

ना है कोई सखा, ना है कोई सहोदर 
यहां आज दो शब्द हैं सार 
या तो यहाँ यह सत्य है 
या है झूठ के पारावार 

भूल जाओ  पार्थ आज यह 
यहां कोई पितामह हैं 
या कोई  यहां गुरु द्रोण भी
धर्म युद्ध है यह सदियों की... 

यह है समर अंतिम ही 
अपना -पराया कोई नहीं
सगा, सहोदर कोई साथी 
ना आगे ना पिछे कोई ....

पंचजन्य  का पुकारे है 
गांडीव उछालो पार्थ है, 
त्याग करो सारे अभिमान को 
याद रखो सिर्फ कर्म को....

यह नहीं है सिर्फ़ हस्तिनापुर की 
अंतिम चाल कौरवों की 
यह है  उपहास दुनिया की 
असत्य का झंडा फहराने की ....

यह नहीं  सिर्फ  कपट का पाशा 
लाक्शा गृह की अभिलाषा 
नहीं था केवल पापान्डबों के 
हत्या  की एक प्रयास के ....

यह है व्यथा विनाश का 
नारी का  मान - मर्यादा का
दुशासन क्या छुलेगा
पान्चाली का यह वस्त्र का
कृष्ण सखा जिसके हों 
मिलता कैसे वह पापियों को ...

मगर यह पांचाली की ही प्रश्न नहीं 
ना है बात इंद्रप्रस्थ पटरानी की 
यह संघर्ष है हर एक साधरण नारी की 
उसकी पीड़ा और अश्क की रण भूमी की...

यहां प्रश्न नहीं  हार जीत की 
तुम्हारी प्राप्ति अबा वीरगति की 
तुम्हारे स्वर्ग मर्त्य की यात्रा की 
या शत्रु मित्र के भाग्य की 
प्रश्न भी नहीं राज्य किसीका अबा होगा 
किस को  मिलेगा वीर गाथा...

प्रश्न आज यह भी नहीं
 समर शेष में होगा कोई 
भीष्म, द्रोण या कर्ण भी
प्रश्न है आज सिर्फ धर्म की....

उठो  है पार्थ, उठाव गांडीव, 
त्याग करो मोह,अभिमान की, 
त्याग दो सारे दुख हताशा 
द्वेष, अहंकार और शंका की...

समर्पि दो तुम अश्क, निराशा 
कृष्ण ही स्रष्टा,क्रिष्ण ही दाता
कृष्ण ही  द्रष्टा, कृष्ण ही कर्ता 
कृष्ण ही आज सारथी रथ का, 

वही बने  आज  आलोक पथ का
धर्म -अधर्म के महा समर का
अन्तिम घडी के यही आशीर्वाद, 
होगा आज सत्य का विजय 

उठो है पार्थ  प्रत्यंचा चढाव 
खूब हुआ अत्याचार, 
धरित्री को करो विकार मुक्त
सत्य के लिए करो प्राण न्योछावर...

उठो है पार्थ, प्रत्यंचा चढाव 
खूब हुआ अत्याचार....
खूब हुआ अत्याचार..........







Saturday, 4 October 2025

इक सफरनामा- समय के साथ

सफर की लम्बाई कितनी थी 
यह तो मुझे नहीं थी 
मग़र सफर का रुख 
नजर में साफ़ दिखाई दे रही थी ...

पास के बर्थ पर बैठे अनजाने शख्स 
सुबह के समाचार पत्र पलटते पलटते 
मेरी तरफ देख रहे हैं और पूछ रहे हैं 
"आप काला गुलाब देखी हैँ?"

इतनी जानी पहचानी आवाज किसकी???

मैं मुड़कर देखी, अपनी सोच से 
बाहर आ गई 
छोटी उत्तर रख दी, "नहीं "....
फिर वह कहे " देखना चाहोगी?"

अजीब बात है, अजीब इत्तफाक 
उस से भी अजीब मेरी समझ...
कह दी "जरूर " ! " क्यूँ नहीं ?"
बस बाकी का सफर सन्नाटे से बीते 
अगला स्टेशन पर अजनबी हमसफर 
उत्तर गए, कैसे कनव्हेयर बेल्ट 
में चलते सूटकेस की तरह 
मैं भी चल पडी,उनके पीछे पिछे 
उत्तर गई ट्रेन की पटरी पर...
हम चलते रहे कुछ रास्ते आगे पीछे 
मगर बेबाक,  एक दूसरे से बेख़बर....

जहाँ कदम रुका वह नजारा 
जन्नत का था की जहन्नुम का 
रास्ते का था की मंजिल का 
किसी अजनबी का था या कोई 
खास अपनों का....
यह गुमसुम सोच रहे थे वह...

मैंने चुपी तोड़ी, कुछ सवाल की...

"यह बगीचे में यह लकीरें कैसे ?...
लाल गुलाब की लहर की बाजू में 
यह काला गुलाब कैसे?...
और बगीचा के बाहरी हिस्से में 
चारो तरफ ये सफेद गुलाबें क्यूँ हैं ?"...

कुछ देर पहले जो बिल्कुल अजनबी थे 
कुछ पलों में वह सबसे ज्यादा 
अपने हो गए थे, और बड़े प्यार से 
बड़ी सिद्धत से एक कहानी सुनाए थे...

"इस मुल्क में एक मेहजबिन थी, 
मानो एक परछाई सी 
एक अनमोल खयाल 
और अनोखे अंदाज की...
किसी से बेइंतहा मोहब्बत कर ली...
मगर खुदा को शायद वह मंजूर नहीं थी 
दुनिया की दस्तूर और ज़माने के नजर से 
मंज़िल रास्ते में ही बदल गयी थी...
वह एक दिया बनकर खामोश हो गई थी...
 उसने कुछ नज्म लिखे बेमिसाल 
अपने रूह से बरसाये कुछ खयाल 

लोग कहते हैं, उनके कब्र पर 
वह नज्म रख दिए गए 
वह खयाल बिखर दीए गए...

सालों बाद वहां एक फूलों की 
बगिया खिल गई...

सब से पहले और एक छोटे हिस्से में
खुबसूरत लाल गुलाब खिल गए, 
और उसके ठीक बाहर के हिस्से में 
काला गुलाब के नजारे ...
लोग खामोश खडे देखते  रह गए...

फिर अचानक उन दोनों के बाहरी हिस्से में 
सफेद गुलाबों की मंजर छा गया...
आंखें जहाँ तक जाएं, 
एक सुकून का शहर बन गया..."

मैं सन्नाटे से खड़ी देखती रह गई 
वह अद्भुत, अनोखा वह नजारा...

साथ लाए हुए हमसफर बताये..
"लाल गुलाब वह कवि की 
मोहब्बत की कहानी कहते हैं, 
जो उनको आज भी ज़िन्दा रखी है...
काला गुलाब वह जुदाई का 
बेबाक, बेमिसाल किस्से के निशान हैं...

और फिर लोग कहते हैं...
अपनी मोहब्बत और रुसवाई के
 कहानी से निकल कर उन्होंने 
दुनिया के हर शख्स को 
बांट दिया अपनी प्यार की इबादत, 
हर शाम को लिखा एक नई नज्म 
दुनिया के किसी भी शख्सियत के 
दर्द लेकर  खड़ी हुई खुदा के दरबार में 
एक दिया जलाई और फरियाद की"...

शायद उसी मंजर में....
शायद उस पल हुई होगी 
जिंदगी और उजाले की पहली मुलाकात 
और वहीँ कहीं हुआ होगा 
जिन्दगी और उजाले का अनोखा वादा
फिर मिलेंगे, मिलते रहेंगे.....

और वह नज्म ,वह इबादत 
बन गए सफेद गुलाबों के अनोखा मंजर.....

अजनबी हमसफर चुप हो गए, 
जैसे में आसमान से जमीन पर 
 उतर गई और  पूछ लिया उन से...

"माफ़ कीजिए, आप का परिचय क्या है....
और वह बोले "क्या परिचय दूँ ?",
 
शायद मैं " समय " हूँ.....

कोई आवाज आई और मेरी नींद खुल गई, शायद मैं कोई सपनें से उठ गई...
और बिस्तर पर खुलl पड़ा 
 एक पुराना खत के मिटा मिटा सा मजमून के साथ फिर खो गई...

Friday, 3 October 2025

आईना और वक़्त

आज हमारी मुलाकात हो गई 
आईने से ....
और वक़्त से भी बात हो गई...
अर्से हो गए थे वह आईना 
से कोई तस्वीर निकले और 
सदियाँ बीत गए  थे वक़्त से 
कुछ आवाज सुनते - सुनाते...

पता नहीं फिर आज अचानक वह 
पुरानी आईना और बीते हुए साल 
सामने  आकर खडे हो गए...
खामोश लब और बेजुबान आंखें 
कहीं दूर खडे हमें कुछ 
इशारे से कह रहे थे...


फिर आज यहां किसी और शख्स के 
तकलीफ देखे 
एक रूह सामने खड़ी हो गई 
जैसे  लगा वह रूह उस की नहीं थी,
 किसी और की नहीं थी,
मेरी थी, सिर्फ मेरी थी, 
मेरी ही रूह मुझसे 
बात कर रही थी 
अर्से के बाद मुझे कुछ कह रही थी...
खामोशी और कुछ सन्नाटे से 
कुछ सवाल कर रही थी...
कुछ लम्हें दामन में छुपा लायी थी 
कुछ साँसे  ढूंढ रही थी 
जो बर्षों पहले आप के पास 
हम छोड़ आए थे...

कुछ यादें सामने उभर आए 
कुछ रातें हमें देखते रह गए...
वह पुराने मंज़र और वह बेरुखी 
फिर जिंदा हो गए...

तस्वीर से निकले वक़्त और 
आईने से निकले एहसास 
बीते कल की रुसवाई की 
कहानी कह रहे थे 
कहीं जेहन में एक तस्वीर को 
ढूंढ रहे थे....

उस वक़्त फिर वह याद शहर में 
एक तस्वीर की मुलाकात तसव्वुर से हो गई 
बर्षों पहले खोया हुआ कुछ लम्हें 
कुछ सांसे सन्नाटे की मुखातिब हो गए 
और फिर से अंदर से किसी ने आवाज दी
आप फिर याद या गए 
वक़्त वहीँ खडे आप को देखता रहा 
जैसे आप बहुत कुछ कहना चाहते थे 
मगर वक्त्त के पास इतना वक़्त कहाँ था....
आंखें धुंधले हो चुके थे 
बेजुबान, बेमिसाल रात की पहर 
हमारे बीच खड़ी एक हिचकी  में
सब कुछ कह रही थी....
कुछ साँसे अपने अखिर जवाब 
लिए विदा हो रहे थे...
और वह विरान घडी में 
कुछ अश्कों से अपने आप को 
धो लिए,
एक बेदाग, मासूम, और बेबाक 
अन्दाज लिए खडे हुए थे
और आप से जैसे  कह रहे थे 

वक़्त और आईना कभी 
झूठ नहीं बोलते....

काश आप को कभी टूटे हुए आईना 
और बीते हुए लम्हों से यह सीखना ना पडे...

रात गहरी हो गई थी, आसमान कुछ 
तारों के बीच वह तस्वीर ढूंढ रहा था 
जो वह कभी  एक तसव्वुर में 
कैद कर रखा था...

शाम सेहर में बदल चुकी थी....

हम खामोश खडे वक़्त के दरिया में 
कुछ टूटे हुए तस्वीर की टुकड़े 
और खोए हुए तकदीर की पन्ने 
जोड़ रहे थे....