रेड लाइट ग्रीन में तब्दील हो गई और सारे गाड़ियों के बीच में मेरी गाड़ी भी चल पडी ,मानो जैसे conveyor बेल्ट में suitcases चुपचाप अपने लाइन में चल पड़े है...पता नहीं कब घर के पास वाले signal पर पहुंच गई. गाड़ी में ब्रेक लगाई तो एहसास हुआ की इस बीच में कई और गजलें भी सुन चुकी हूँ..."तमाम शहर के रास्ते सजा दिए जाएं, हम आ गए हैं, कांटे बिछा दिए जाए ", " डूबना है तो इतने सुकून से डूबो की आसपास के लहरें को भी पता न हो "...फिर " रफ्ता रफ्ता वह मेरे हस्ती का सामान हो गए "... गाड़ी अपने parking में लगा के मैं ऊपर चली गई, शायद बारिश के बूंदें अब भी मेरी आत्मा को भीगे रखे थे...
दरवाजा खोली, लगा अंदर से कैसी गिली मिट्टी कि खुशबु आ रही थी, मगर बारिश तो रात से इतनी हो रही थी की उस में कोई रहम नहीं बची थी की वह कोई गिली मिट्टी की खुशबु की परवाह करें.... खैर, अब वह बारिश की ठंडक कम करने को चाय पिया जाए. मैं कुछ और सोचते सोचते kitchen में पहुंच गई, मेरे favorite ग्लास वाली चाय की प्याली में पानी measure कर के saucepan में डाली, कुछ चाय पत्तियों मिलाई अदरक, काली मिर्च की कुछ टुकड़े उस पानी में बिखेर दी, एक छोटी चम्मच चीनी डाल कर थोड़ी उबाल दी और glass के प्याले में छान ली चाय, थोड़ी milk powder मिला दी, बस हो गई चाय तैयार. बर्षों से ऐसी ही चाय बनाने की आदत पड़ गई थी अब, जैसे की सामने कोई शख्स दूर से भी आ जाए गाड़ी की break पे reflexly पैर आ जाता है...जिंदगी भी ऐसी एक reflex ही है, जैसे जीने की आदत पड जाती है....
मैं recliner सोफ़े के ऊपर आके बैठ गई, बारिश के धुन के साथ कुछ फैज के नज्म सुन ने को रिकॉर्ड player on की और चाय पीते पीते बारिश को साथ देते देते " यह काग़ज़ की कश्ती, यह बारिश का पानी..." गुनगुनाने लगी... यहां इस के अलावा कोई और शब्द ही न था....
दरवाजे से घंटी की आवाज आई, समझ नहीं आया ऐसे बारिश में कौन आ सकता... फिर वही पुरानी आदत...घर के किसी भी हिस्से से दरवाजे से घंटी आयी तो रोबोट जैसे दरवाजे के पास आके खोल देना, चाहे घर में कोई और हो ना हो दरवाजा खोलना मेरा ही काम का हिस्सा. कुछ चीजें समय के साथ अपने अंदर ऐसे आ जाते हैं, मानो वह हमारे जहन के हिस्से बन जाते हैं, मेरे लिए घंटी सुनकर दरवाजा खोलना ऐसे ही एक हिस्सा बन गया था... दरवाजा खोल दिया...
आंखों को विश्वास नहीं हुआ " अरे अमित, आप...कैसे??? लफ्ज अटक गए थे आधे में.... आओ,आओ अंदर आओ, तुम्हारे raincoat से पानी के धार छुट रहे थे... raincoat के बाबजूद भी तुम आधे भीग गए थे... मगर पता है मजे की बात क्या है...चालीस साल हो गए थे, हमें मिले हुए, मगर हम एक दूसरे को देखते ही पहचान गए... खुदा की रहम की क्या कमाल निशान है...चालीस साल में तो इंसान कई दफा मरकर भी पैदा हो सकता था...और यहां हम दोनों में इतना बदलाव की बाकी तो थी की हम एक दूसरे को आसानी से पहचान पाए...समय और तकदीर ने कुछ बदलाव तो जरूर लाया होगा...तुम्हारे बाल कुछ ज्यादा ही सफेद हो गए थे और तुम पहले से थोड़े कमजोर हो गए थे और मेरे आंखें अभी बिना चश्मे के साफ़ नहीं देख सकती थी...
पता नहीं मैंने तुम से कैसे कोई सवाल नहीं की, तुम यहाँ कैसे, इस शहर में, मेरे घर का पता कैसे मिला, कहाँ से मिला, मेरा खबर किस से मिली...यह चालीस साल में क्या क्या बदल गया...कुछ भी नहीं सवाल की मैंने... तुम्हें अंदर बुलाई, सोफ़े पर बैठने को कहा, तुम्हारे raincoat balcony में एक खुन्टि पर टांग दी, तुम्हें एक तौलिया बढ़ा दी,हाथ मुह पोंछ लेने को, बारिश जो तुम्हें भिगा दिया था...
तुम्हें बैठने को कहा और मैं तुम्हारे लिए चाय बनाने चल दी kitchen में. तुम्हें यह भी नहीं पूछा अब तुम चाय में चीनी लेते हो या नहीं, दूध कितना या milk powder डालूँ, अदरक और काली मिर्च तुम्हें पसंद है या नहीं अब...कुछ भी नहीं पूछा...चालीस साल हो गए थे Amit, चाय क्या चीज़ है, इंसान तो इंसान को पहचानने के नजरिए भी बदल देता है एक दिन में, और यहां चालीस साल के बाद के बात कर रहे हैं...मैंने ऐसे ही चाय बनाई जैसे मैं रोज बनाने की आदत डाल दी हूं...मैं चाय बना रही थी, तुम drawing रूम के इधर उधर थोड़े देखे, बुक rack में, musical कैबिनेट में थोड़ी नज़र डालें और उठ कर balcony के garden chair पे बैठ गए... दूर तक बारिश के बूँदों के आवाज के अलावा बाकी सन्नाटा था...चाय बन गई थी. मैं बीच के मेज पर चाय की tray रख दी, यह भी नहीं पूछा तुम से पानी दूँ या biscuit भी दूँ चाय के साथ..जैसे कुछ पूछना था ही नहीं... तुम चाय पीने लगे...कुछ बोलना चाहते थे शायद...चालीस साल हो गए थे, कहने को तो बहुत कुछ होगा, हर रास्ते के कई किस्से होंगे तुम्हारे पास भी और मेरे पास भी...पता नहीं कैसे कुछ सुनने सुनाने को मन नहीं किया, मैंने शायद खामोशी से तुम्हें देखती रही, चाय की प्याले से उठते धुएँ से शायद सारे गिले, शिक्वे पिघल गए थे, अदरक और काली मिर्च की सुगंध के साथ बर्षों के जमे हुए सवाल, जवाब और कड़वाहट घुल कर हीना और चंदन के कुछ अजीब सी खुशबु बन कर घर और मन को महका दी थी...मेरे आंखों से शायद तुम पहली बार पढ़ लिए थे, अब माजी को नहीं इस लम्हे में जीवन को तराशा जाए...पहली बार लगा चालीस साल के बाद तुम मुझे और जिंदगी को पहले से कहीं बेहतर समझ पाए...
चाय ख़तम हो गई थी...बारिश भी कम हो रही थी...तुम्हारे जाने का वक़्त हो रहा था...मैंने तुम्हारे raincoat पोंछ दी थी,कुछ देर एक खामोशी बीच में आ कर बहुत कुछ कह गई थी...मैंने तुम्हारे पैर छुने को झुक गई और शायद मेरी आंखे भर आयी थीं...तुम ने मेरे आंखें पोंछ ने को हाथ बढ़ाते बढ़ाते अटक गए और हम फिर कुछ देर सन्नाटे में jagjit जी को सुनते रहें..." लंबी दूरी तय करने को वक़्त तो लगता है....गांठ अगर पड जाए तो फिर रिश्ते हो या डोरी, लाख कोशिश कर लो खोलने को, वक़्त तो लगता है,...हमने इलाजे ज़ख्मों दिल के ढूंढ लिया है लेकिन...गहरे ज़ख्मों को भरने में वक़्त तो लगता है ...नए परिन्दों को उड़ने में वक़्त तो लगता है..."
तुम उठे, मैं दरवाजे तक तुम्हें छोड़ने को आई और तुम बिना पिछे मुड़े सीढ़ियों से नीचे उतर गए...मैं वापस घर के अंदर आई, कुछ देर balcony में जाकर बैठी और वे दोनों खाली चाय प्याले को देखती रही... जैसे चालीस साल के हर लम्हें उस गरम चाय के प्याले से उठे धुआं से पिघल कर चट्टानों की तरह मेरे रूह में मिल जा रहे थे...वही हीना और चंदन के महक के साथ...बाहर बारिश लगभग रुक गयी थी...बादल के कुछ बूंदे सामने के पिपल के पत्तों से खेल रहे थे और रात की रानी की हर पत्ते कुछ ज्यादा ही रंग बिखर रहे थे...दो garden चेयर के बीच के मेज पर दो खाली चाय के प्याले खामोशी से कुछ कुछ कह रहे थे..
बाहर कोई घंटी बजाया, मेरे आंखें खुल गईं, देखा तो " रसीद टिकट " पढते पढते पता नहीं चला था कब आंख लग गई थी...दरवाजा खोली, दरवाजे पर खडा इस्त्री वाला बोला कबसे घंटी बजा रहा था, मैंने उस से कपड़े गिन के रख लिये, पैसे दिए और balcony में जाके बैठ गई...मेज के ऊपर दो नहीं एक ही चाय की खाली प्याला था...
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