Saturday, 18 October 2025

एक शिकायत, एक अमानत

सुना है आप आज इस नगर में आए हैं 
सुना है आप को बुद्धत्व मिला है 
और आप सिद्धार्थ गौतम से बुद्ध हो गए 

सुना है आपने बहुत कुछ पाया है 
बहुत कुछ खोया भी है...
किसी से पूछा मैंने 
क्या पाया बुद्ध ने 
क्या खोया सिद्धार्थ गौतम ने...

शायद कोई आप का अनुयायी होगा 
आप को बखूबी समझने वाला होगा 
या आप का कोई शिष्य होगा...
उस ने कहा, 
गौतम ने घर, परिवार, राज्य छोड़ दिए हैं 
ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, मोह, घृणा पार कर पाए हैं 
वह जो कपिलवस्तु के कुमार थे 
सिद्धार्थ गौतम से बुद्ध हो गए हैं...

खोज लिए मानवता के हर दुख के कारण 
पा लिए विधाता के अनमोल वरदान 
छोड़ चले सारे रिश्ते, सारे बंधन
मिटा दिए सारे फासले, सारे उलझन...
कोई चिराग ढूंढ पाए हैं 
सिर्फ अपने ही नहीं, सारे संसार के लिए 
दुख, दर्द मिटाने को निकल गए थे 
वह जो कभी सिद्धार्थ गौतम कहलाते थे 
वह अब बुद्ध बन गए, संत हो गए....

सुन रही थी मैं उनसे आप के व्यस्था, 
आप के संघर्ष की कहानी, साधना की गाथा 
केवल राज्य से नही ,राजा से नहीं 
पिता, माता,परिवार से नहीं 
पाखंड रूढ़िवादी धर्मान्धता से नहीं 
आपने ने तो संघर्ष किया है 
अपने आप से, मानवता के सारे 
दोष, सारे कमी, सारे दुखों के जड से 
तब जाकर तो आप संत बने  हैं 
सिद्धार्थ गौतम से बुद्ध हो गए हैं...

यह बुद्ध होना कोई आसान नहीं 
रोज रोज तो छोड़ो एक रोज़ भी नहीं ....

यह मैं कह रही हूँ गौतम, सिर्फ मैं कह रही हूँ, 
तुम्हारी यशु,तुम्हारी यशोधरा कह रही हूँ...
आप सारे संसार के लिए बुद्ध हो चुके हैं 
फिर भी यह  यशु की दिल की गहराई में 
एक कोना अब भी ऐसा ही रह गया है 
जहाँ आप पहले दिन जैसे 
सिद्धार्थ, गौतम ही रह गए हैं....

आप के सिद्धि कोई मामूली प्राप्ति नहीं 
सदियाँ बीत जाती है बहती हुई 
फिर भी लोग बुद्ध नहीं हो जाते हैं 
त्रस्त होकर जीवन से तो कई लोग चले जाते हैं 
घर, परिवार, राज्य छोड़ देते हैं 
मगर आप तो निकले थे स्वयं को ढूंढने 
किसी से त्रस्त होकर नहीं, ज्ञान की खोज में 
जो ज्ञान केवल सिर्फ़  आपके नहीं,
दुनिया के हर व्यक्ति के हो जाए 
और  हर किसी के पथ पर दिया जलाए 
और  हर  एक इन्सान को राह दिखाए...

आज आप को क्या ही बधाई देगी 
यह यशु,या यशोधरा आप की 
आप तो बुद्ध हो गए, 
सारे सुख दुख से परे हो गए 
यहीं एक दिया रख दिया है मैंने, 
आप के पथ के लिए ....
और इस दिया के अखिर लॉ के साथ 
कह देती हूँ आज ,
जो एक ही गिला है मेरी आप से 
कभी जो गौतम सिद्धार्थ होते थे, उन से...

मैं तो कोई गैर नहीं थी,
थी तो वही यशु आप की...
क्यूँ निकल गए आप  रात के सन्नाटे में 
कहकर जाते तो क्या होता मुझे
सिद्धि के मार्ग में क्या मुझे 
बाधा ही पाते !.....

        Xxxxx 

कोई आकर कहा  है मुझे 
आज कपिलवस्तु में बुद्ध आए हैं 
जन जन  जा रहे हैं मिलने उन्हें 
गौतम बुद्ध से आशीष पाने 
बुद्ध ने भी आप को बुलाया है...
"चलें आप भी उन के आशीष लेने "...

कहा मैंने फिर सज्जन से 
कहे आप फिर यह बुद्ध से 
"यशोधरा नहीं आएगी उनको मिलने 
मिलना चाहेंगे तो यहीं मिलेंगे..."

              Xxxxx
"भिक्षां देही" के आवाज सुनके
देखा मैं उन को बाहर आके 
वही सिद्धार्थ गौतम ही तो थे 
द्वार पर भिक्षु होकर खडे थे 
ज्ञान की ज्योति में झलक रहे थे 
सिद्धार्थ गौतम से बुद्ध हो गए थे....

"यशोधरा मैं...कभी आप जिसे यशु कहते थे 
सखा थे प्रभु,आज से आप मेरे गुरु हो गए "

क्या भिक्षा दूँ मैं आज आप के थाली में?
अखिर अमानत भेंट दी मैंने 
राहुल को आप को सौंप कर आज 
भेंट कर मेरी अखिर अमानत 
और दिल से बसा हुआ मेरी अखिर शिकायत 
मुक्त हो गई मैं अपने आप से  आज....







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