Wednesday, 15 October 2025

वसीयत

घर के दहलीज पर बैठक है आज 
सब लोग आ चुके हैं 
दोस्त, रिस्तेदार, बच्चे सब बैठे हुए हैं 
डॉक्टर साहब अपने मोहर लगाएंगे 
मेरे होश आवाज ठीक है 
वकील सारे दस्तावेज तैयार करेंगे...
आज वसीयत बनाने की तारीख तय हुआ है...

किस को कौनसा घर, किस को कौनसा गाड़ी 
किस को कौनसा जायदाद दिया जाएगा 
कौन अलमारी में रखे हुए जेवर और पैसे लेगा 
किसको मिलेगा घर के आंगन, 
और किस को लॉन 
किस को कितना जमीन मिलेगा 
किस को कौन सा मकान....

ये सारे लिखे जाएंगे इस में, 
गवाह और  डाक्टर दस्तखत देंगे, 
वकील साहब मुहर  लगाएंगे...
जीवन का एक अखिर दायित्व है यह.
आज हो जाएगा मेरी वसीयत तैयार....

मगर घर के एक कोने में, 
एक बंद लिफ़ाफ़े में कुछ पुराने खत पडे हैं 
कुछ नज्म किसी पुराने डायरी में लिखे रखे  हैं 
कुछ पुराने क्यासेट  रेकॉर्ड प्लेयर के पास  हैं 
जिस में जमाने पहले के कुछ अफ़साने हैं..
लाइब्रेरी में आधे फटे आधे भीगे
 कुछ किताबों के पन्ने हैं....

यह सब के अंदर एक रूह के कुछ साँसे हैं 
कुछ अधूरे सपनों के खूब सूरत परछाई है, 
कुछ बेमिसाल खयाल है धडकनों के 
कुछ पुराने एल्बम के पन्ने में 
कुछ  खोए हुए अजीज धुंधले चेहरे हैं...
कुछ खूबसूरत लम्हें  हैं जिसे दिल ने 
तहखाने में बड़े प्यार से बर्षों से सजा रखा है...

ये किस के हिस्से में लिख दूँ?
किस वसीयत में लिख पाऊँ
इनके हकदार कौन हैं....
इसके ना कोई आज गवाह है 
ना  है कोई वकील 
ना कोई डॉक्टर इस पर मुहर लगा सकते हैं 
ना है कोई दावेदार मोहकिल...

शायद यह वसीयत में मैं कुछ लिख न पाऊँ 
और समय के समझ के लिए ही छोड़ जाऊँ....

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