Saturday, 4 October 2025

इक सफरनामा- समय के साथ

सफर की लम्बाई कितनी थी 
यह तो मुझे नहीं थी 
मग़र सफर का रुख 
नजर में साफ़ दिखाई दे रही थी ...

पास के बर्थ पर बैठे अनजाने शख्स 
सुबह के समाचार पत्र पलटते पलटते 
मेरी तरफ देख रहे हैं और पूछ रहे हैं 
"आप काला गुलाब देखी हैँ?"

इतनी जानी पहचानी आवाज किसकी???

मैं मुड़कर देखी, अपनी सोच से 
बाहर आ गई 
छोटी उत्तर रख दी, "नहीं "....
फिर वह कहे " देखना चाहोगी?"

अजीब बात है, अजीब इत्तफाक 
उस से भी अजीब मेरी समझ...
कह दी "जरूर " ! " क्यूँ नहीं ?"
बस बाकी का सफर सन्नाटे से बीते 
अगला स्टेशन पर अजनबी हमसफर 
उत्तर गए, कैसे कनव्हेयर बेल्ट 
में चलते सूटकेस की तरह 
मैं भी चल पडी,उनके पीछे पिछे 
उत्तर गई ट्रेन की पटरी पर...
हम चलते रहे कुछ रास्ते आगे पीछे 
मगर बेबाक,  एक दूसरे से बेख़बर....

जहाँ कदम रुका वह नजारा 
जन्नत का था की जहन्नुम का 
रास्ते का था की मंजिल का 
किसी अजनबी का था या कोई 
खास अपनों का....
यह गुमसुम सोच रहे थे वह...

मैंने चुपी तोड़ी, कुछ सवाल की...

"यह बगीचे में यह लकीरें कैसे ?...
लाल गुलाब की लहर की बाजू में 
यह काला गुलाब कैसे?...
और बगीचा के बाहरी हिस्से में 
चारो तरफ ये सफेद गुलाबें क्यूँ हैं ?"...

कुछ देर पहले जो बिल्कुल अजनबी थे 
कुछ पलों में वह सबसे ज्यादा 
अपने हो गए थे, और बड़े प्यार से 
बड़ी सिद्धत से एक कहानी सुनाए थे...

"इस मुल्क में एक मेहजबिन थी, 
मानो एक परछाई सी 
एक अनमोल खयाल 
और अनोखे अंदाज की...
किसी से बेइंतहा मोहब्बत कर ली...
मगर खुदा को शायद वह मंजूर नहीं थी 
दुनिया की दस्तूर और ज़माने के नजर से 
मंज़िल रास्ते में ही बदल गयी थी...
वह एक दिया बनकर खामोश हो गई थी...
 उसने कुछ नज्म लिखे बेमिसाल 
अपने रूह से बरसाये कुछ खयाल 

लोग कहते हैं, उनके कब्र पर 
वह नज्म रख दिए गए 
वह खयाल बिखर दीए गए...

सालों बाद वहां एक फूलों की 
बगिया खिल गई...

सब से पहले और एक छोटे हिस्से में
खुबसूरत लाल गुलाब खिल गए, 
और उसके ठीक बाहर के हिस्से में 
काला गुलाब के नजारे ...
लोग खामोश खडे देखते  रह गए...

फिर अचानक उन दोनों के बाहरी हिस्से में 
सफेद गुलाबों की मंजर छा गया...
आंखें जहाँ तक जाएं, 
एक सुकून का शहर बन गया..."

मैं सन्नाटे से खड़ी देखती रह गई 
वह अद्भुत, अनोखा वह नजारा...

साथ लाए हुए हमसफर बताये..
"लाल गुलाब वह कवि की 
मोहब्बत की कहानी कहते हैं, 
जो उनको आज भी ज़िन्दा रखी है...
काला गुलाब वह जुदाई का 
बेबाक, बेमिसाल किस्से के निशान हैं...

और फिर लोग कहते हैं...
अपनी मोहब्बत और रुसवाई के
 कहानी से निकल कर उन्होंने 
दुनिया के हर शख्स को 
बांट दिया अपनी प्यार की इबादत, 
हर शाम को लिखा एक नई नज्म 
दुनिया के किसी भी शख्सियत के 
दर्द लेकर  खड़ी हुई खुदा के दरबार में 
एक दिया जलाई और फरियाद की"...

शायद उसी मंजर में....
शायद उस पल हुई होगी 
जिंदगी और उजाले की पहली मुलाकात 
और वहीँ कहीं हुआ होगा 
जिन्दगी और उजाले का अनोखा वादा
फिर मिलेंगे, मिलते रहेंगे.....

और वह नज्म ,वह इबादत 
बन गए सफेद गुलाबों के अनोखा मंजर.....

अजनबी हमसफर चुप हो गए, 
जैसे में आसमान से जमीन पर 
 उतर गई और  पूछ लिया उन से...

"माफ़ कीजिए, आप का परिचय क्या है....
और वह बोले "क्या परिचय दूँ ?",
 
शायद मैं " समय " हूँ.....

कोई आवाज आई और मेरी नींद खुल गई, शायद मैं कोई सपनें से उठ गई...
और बिस्तर पर खुलl पड़ा 
 एक पुराना खत के मिटा मिटा सा मजमून के साथ फिर खो गई...

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