पास बैठे बड़ी देर, कुछ यादें भी साथ लाए
कुछ दर्दे उभर आए, कुछ ज़ख्में ताजा हो गए
कुछ तस्वीरें, कुछ परछाइयाँ पास आए....
कुछ दरवाजे पर नजर ठहर गए
कुछ बंद और कुछ खुले दिख गए....
बर्षों पहले शायद ऐसा कुछ हुआ होगा
इंसान नहीं कोई फरिश्ता यहाँ आया होगा
यह पुरानी हवेली में कोई नया दरवाजा बना होगा
और वह फरिश्ता यहां जिंदगी और जन्नत दोनों साथ लाया होगा...
सारे मोहल्ले में रोशनी, सारे मुल्क में सादगी
सारे आसमान में सितारे और सारे सन्नाटे पर आहटें....
जैसे खुदा अपनी मर्जी से यहां चले आए,
जैसे दुआओं की बारीश हुई आसमान से...
वह नया दरवाजा, वह रोशनी, वह सादगी
वह दुआएँ शायद ही सदियों में कभी तो आती...
उस दरवाजे के पीछे कोई खडा था
मासूम, बेनक़ाब, कोई रूह का रूप था
यह रोशनी, यह सादगी और वह दुआओं से
मोहब्बत कर बैठा, जन्नत समझ बैठा उसे...
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पता नहीं अचानक वह दरवाजा बंद हो गया
क्यूँ, कैसे, कहाँ, कब इसके कोई जवाब नहीं था
न था कोई रोशनी की सुराग
न था मंजिल की राह
ना था पिछे मूड ने की ताकत
ना आगे निकलने की हिम्मत...
वह जैसे वही रह गया , वहीँ रह गया
बेजान,बेजुबान जैसे वह खामोश दिल सो गया
साँसे चलते तो रहे मग़र जैसे जीना भूल गया
दुनिया वही था, फिर भी सब कुछ जैसे बदल सा गया...
पता नहीं, फिर एकदिन कुछ अजीब हो गया
अंधेरे में एक गली से एक हल्का आवाज आया
कोई रोशनी का एक दिया जलाया
कोई इंसान के बस्ती से वहां एक चाबी लाया
सदियों से बंद पडे दरवाजा खोल दिया..
कोई प्रश्न नहीं पूछा,
कोई जवाब नहीं मांगा
शायद कुछ कहने से पहले सुन लिया
शायद कुछ न सुने भी समझ गया...
वह दरवाजे के अंदर अब वह रोशनी की तेजी नहीं थी
थे कुछ सुकून की साँसे,कोई रुके कदमों के परछाई सी..
वह जमीन थी की जन्नत
वहाँ बारिश थी की ठंडक
वह दुआ थी की खुदा की मोहब्बत
पता नहीं कुछ, पता करना भी नहीं यह सब
यही पता है, कोई इंसान आज यहां आया
वह बन्दे से फरिश्ता हो गया
कुछ बंद दरवाजे खोल गया...
मोहब्बत को इबादत में बदल गया...
कोई फरिश्ता फिर आज यहां आया...
सदियों से बंद पडे कोई दरवाजा खोल दिया
कुछ सुकून भेंट दे कर गया
कुछ सांसें किसी और के लिए छोड़ गया
एक फरिश्ता फिर आज यहां आया.....
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