Sunday, 12 October 2025

भरोसा

अर्से  पहले एक शाम मेरे कमरे में आयी 
कुछ खयाल और सवाल मेरे पास छोड़ गई .. 

महीनों लगे सवालों के जवाब ढूंढने 
वक़्त लगा वह खयाल को समझने 
फिर एक सुबह हमने तय किया 
वह शाम का  जो आभार रह गया 
वह सवाल का जवाब दे दिया जाए 
और वह खयाल का कद्र किया जाए ...

शायद वहीँ पर वह सुबह ने  शाम से
पहला मुलाकात कर लिया 
जिंदगी के साथ भी और जिंदगी के बाद भी 
कुछ सांसें साझा करने का वादा कर लिया...

वक़्त वहीँ ठहरे देखता रहा, 
शायद अन्दर कुछ बदल सा गया 
वही मुलाकात, वह घडी ,उस जगह 
कुछ एहसास को "भरोसे" में बदल  दिया...

हर एक वादे के पीछे एक वादा रह गया 
हर साँस ,हर वह भरोसे  का मंजर  हो गया...

फिर रास्ते में एक तूफान आया, 
वह घर बिखर गया 
कश्ती डूब गया 
और सपना टूट गया ....

वह तूफान क्यूँ, कैसे  आया 
कुछ याद नहीं रहा, 
मगर तूफान जाने के बाद लगा 
अन्दर कुछ टूट गया, कुछ खो दिया...

वह क्या टूट गया, 
वह क्या पिछे छूट गया 
क्या कश्ती के साथ साथ खो गया 
शायद वह मेरा " भरोसा " ही था...

तूफान क्या दिया, क्या लिया पता नहीं था 
मगर  एक गहरा ज़ख्म जेहन में रह गया था 
सारे अल्फाज़ मिट चुके थे 
साँसे कैसे अजीब सी चुप हो गए थे...
जीवन  फिर अपने पैरों पर  खडा हुआ 
वक़्त तो ज़ख्मों के इलाज कर लिया 
मगर लाख कोशिश कर के भी हार गया 
वह टूटा हुआ "भरोसा" जोड़ न पाया...

भरोसा, कोई दस्तावेज तो नहीं था 
उसे वक़्त बदल देता
वह एक बेहद नाजुक आईना था 
टूट गया एक बार, बिखर गया  
शायद वह फिर जुड़ नहीं पाया 

सब कुछ तो ऊपर से ठीक हो जाता है 
जीवन पटरी पर फिर चलने लगता है...
मगर कहीं अंदर से कुछ टूट जाता है 
कुछ यादें बिखर जाते हैं 
कुछ वादे अपने रास्ते भूल जाते हैं 
कुछ भरोसे पीछे छुट जाते हैं.....

वह शाम आज भी वह सुबह  का इंतजार में 
दिल की गहराई  में कुछ  ढूंढ रही है 
कुछ खोए हुए "यादें" और टूटे हुए "भरोसे "
को तलाश रही है...




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