Monday, 6 October 2025

हिसाब

कुछ हिसाब बाकी है 
वह शाम के  पन्ने के पास 
उसे पूरा तो करना होगा 
कुछ हिसाब बाकी है 
खतों के मजमून के साथ 
उसे जवाब तो देना होगा 
कुछ हिसाब बाकी है 
वह पुराने फुटपाथ पर
उसे चुकाना तो होगा 
कुछ हिसाब बाकी है 
वह गुलमोहर के नीचे 
उस से माफी तो लेना होगा 
कुछ हिसाब बाकी है 
एक दोपहर के धूप से 
उसे अश्कों से धोना होगा 

कुछ हिसाब बाकी है 
एक सपनों के छाती पर 
उसे जीते जी देखना तो होगा 
कुछ हिसाब बाकी है 
आखिरी सवाल के पास 
जवाब तो देना होगा 

यह सारे हिसाब किसी रोज 
यहीं करना ही होगा 
जन्नत या जहन्नुम 
कहीं तो जगह होगा 
कुछ हिसाब चुकाना है 
आज नहीं तो कल 
यहाँ नहीं तो वहां 
इस जहां में नहीं तो 
किसी और जहां में 
कुछ पाकर या खोकर 
कुछ सबक सीखकर 
या कुछ ठोकर खा कर 
हिसाब तो देना होगा 
कर्जा चुकाना होगा...

कुछ पुराने हिसाब है 
उसे चुकाना तो होगा 
यहां भर नहीं पाओगे 
तो किसी और वहां में 
वक़्त और वफा के साथ 
 कर्ज चुकाना तो होगा...
कुछ अश्कों के हिसाब है 
उसे आह के साथ चुकाना होगा 
कुछ साँसों के कर्जा है 
उन्हें घुटन के साथ चुकाना होगा...

कुछ हिसाब बाकी है 
कभी ना कभी चुकाना ही होगा....

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