वह शाम के पन्ने के पास
उसे पूरा तो करना होगा
कुछ हिसाब बाकी है
खतों के मजमून के साथ
उसे जवाब तो देना होगा
कुछ हिसाब बाकी है
वह पुराने फुटपाथ पर
उसे चुकाना तो होगा
कुछ हिसाब बाकी है
वह गुलमोहर के नीचे
उस से माफी तो लेना होगा
कुछ हिसाब बाकी है
एक दोपहर के धूप से
उसे अश्कों से धोना होगा
कुछ हिसाब बाकी है
एक सपनों के छाती पर
उसे जीते जी देखना तो होगा
कुछ हिसाब बाकी है
आखिरी सवाल के पास
जवाब तो देना होगा
यह सारे हिसाब किसी रोज
यहीं करना ही होगा
जन्नत या जहन्नुम
कहीं तो जगह होगा
कुछ हिसाब चुकाना है
आज नहीं तो कल
यहाँ नहीं तो वहां
इस जहां में नहीं तो
किसी और जहां में
कुछ पाकर या खोकर
कुछ सबक सीखकर
या कुछ ठोकर खा कर
हिसाब तो देना होगा
कर्जा चुकाना होगा...
कुछ पुराने हिसाब है
उसे चुकाना तो होगा
यहां भर नहीं पाओगे
तो किसी और वहां में
वक़्त और वफा के साथ
कर्ज चुकाना तो होगा...
कुछ अश्कों के हिसाब है
उसे आह के साथ चुकाना होगा
कुछ साँसों के कर्जा है
उन्हें घुटन के साथ चुकाना होगा...
कुछ हिसाब बाकी है
कभी ना कभी चुकाना ही होगा....
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