आईने से ....
और वक़्त से भी बात हो गई...
अर्से हो गए थे वह आईना
से कोई तस्वीर निकले और
सदियाँ बीत गए थे वक़्त से
कुछ आवाज सुनते - सुनाते...
पता नहीं फिर आज अचानक वह
पुरानी आईना और बीते हुए साल
सामने आकर खडे हो गए...
खामोश लब और बेजुबान आंखें
कहीं दूर खडे हमें कुछ
इशारे से कह रहे थे...
फिर आज यहां किसी और शख्स के
तकलीफ देखे
एक रूह सामने खड़ी हो गई
जैसे लगा वह रूह उस की नहीं थी,
किसी और की नहीं थी,
मेरी थी, सिर्फ मेरी थी,
मेरी ही रूह मुझसे
बात कर रही थी
अर्से के बाद मुझे कुछ कह रही थी...
खामोशी और कुछ सन्नाटे से
कुछ सवाल कर रही थी...
कुछ लम्हें दामन में छुपा लायी थी
कुछ साँसे ढूंढ रही थी
जो बर्षों पहले आप के पास
हम छोड़ आए थे...
कुछ यादें सामने उभर आए
कुछ रातें हमें देखते रह गए...
वह पुराने मंज़र और वह बेरुखी
फिर जिंदा हो गए...
तस्वीर से निकले वक़्त और
आईने से निकले एहसास
बीते कल की रुसवाई की
कहानी कह रहे थे
कहीं जेहन में एक तस्वीर को
ढूंढ रहे थे....
उस वक़्त फिर वह याद शहर में
एक तस्वीर की मुलाकात तसव्वुर से हो गई
बर्षों पहले खोया हुआ कुछ लम्हें
कुछ सांसे सन्नाटे की मुखातिब हो गए
और फिर से अंदर से किसी ने आवाज दी
आप फिर याद या गए
वक़्त वहीँ खडे आप को देखता रहा
जैसे आप बहुत कुछ कहना चाहते थे
मगर वक्त्त के पास इतना वक़्त कहाँ था....
आंखें धुंधले हो चुके थे
बेजुबान, बेमिसाल रात की पहर
हमारे बीच खड़ी एक हिचकी में
सब कुछ कह रही थी....
कुछ साँसे अपने अखिर जवाब
लिए विदा हो रहे थे...
और वह विरान घडी में
कुछ अश्कों से अपने आप को
धो लिए,
एक बेदाग, मासूम, और बेबाक
अन्दाज लिए खडे हुए थे
और आप से जैसे कह रहे थे
वक़्त और आईना कभी
झूठ नहीं बोलते....
काश आप को कभी टूटे हुए आईना
और बीते हुए लम्हों से यह सीखना ना पडे...
रात गहरी हो गई थी, आसमान कुछ
तारों के बीच वह तस्वीर ढूंढ रहा था
जो वह कभी एक तसव्वुर में
कैद कर रखा था...
शाम सेहर में बदल चुकी थी....
हम खामोश खडे वक़्त के दरिया में
कुछ टूटे हुए तस्वीर की टुकड़े
और खोए हुए तकदीर की पन्ने
जोड़ रहे थे....
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