कुछ कपड़े ,कुछ जुते , कुछ जेवर
कुछ किताबें ,कुछ दस्तावेज
कुछ सामान लौटाने यहां थे आज तुम..
मगर वह कैसे वापस करोगे तुम
जो लम्हें गुजर गए...
वह यादें जो किताबों के मुडे हुए
पन्नों पर अटक गए हैं
वह कैसे वापस करोगे जो खतों के
कुछ मजमून में मिटा मिटा है ...
उस वक़्त को कैसे लौटा सकोगे
जिसमें एक मुस्कान अभी भी बाकी है
और कुछ अश्क अभी भी
पलकों पर छलक रहे है ..
लौटा सकोगे तो यह सब लौटा दो
लौटा दो मेरे कुछ साँसे जो अभी भी
तुम्हारें अंदर बाकी है...
लौटा सकते हो लौटा दो उस चौदवी के
चांद के रोशनी , जो हम महसूस किए हैं
लौटा सकते हो तो लौटा दो
वह नदी के किनारे पर बहती हुई हवा
जहाँ हम कुछ घडी कभी बैठे थे
लौटा सकते हो तो लौटा दो
वह तारों के महफिल को जो
आज भी यहां आते हैं
वह ग़ज़लों के रूहानी रातों को
जो अब भी रुला देते है..
लौटा सकते हो तो लौटा दो
वह खयाल, वह ज़ज्बात जो हम तुम पर
और तुम हम पर खर्च किए हैं...
ये सब लौटा सकोगे???
फिर नहिं तो क्यों और क्या लौटाने
आए हो आज इधर ?????...
रख लो अपने पास
वह कुछ गिने चुने साँसे हमारे
जो तुम्हारे पास हम रख आए हैं
रख लो वह हंसी के कुछ झलक
जो तुम्हारे पास हम छोड़ आए हैं....
रख लो हमारे कुछ धड़कनें
जो हम तुम्हें दे चुके हैं
रख लो हमारे कुछ आँसू जो अब भी
तुम्हारे पलकों पे छलक रहे हैं...
शायद यही तुम्हारे लिए हमारे अंतिम उपहार
रख लो यह खत,यह ज़ज्बात तब तक
जब शायद किसी और जहां में हम तुमसे मिले और एक दूसरे के एहसान नहिं
एहसास लौटा सकें....
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