Thursday, 16 October 2025

बंटवारा

कभी कभी घरों में, परिवारों में 
दरारें पड जाते हैं 
बंटवारे हो जाते हैं 
आंगन के, जायदाद के 
 यहाँ तक बुनियादी रिश्तों के भी ...

कभी कभी तो सरहदों के भी 
बंटवारा हो जाता है 
नदी के पानी के भी बंटवारा हो जाता है 
आसमान तक बाद नहीं पडता बंटवारे से...

मगर कुछ एहसास के बंटवारा कैसे होगा 
कुछ सांसों के बंटवारा कैसे होगा 
कुछ वक़्त जो  बीत गया 
उसका बंटवारा कैसे होगा 
कुछ यादें जो दिल की किसी कोने में 
खामोशी से चुप हो गए 
उनके बंटवारा कैसे होगा....

जो देवकी की कोख है 
उसका बंटवारा कैसे होगा 

जो बासुदेव के आंसू हैं 
उनके बंटवारे कैसे होगा...

जीवन कोई बंटवारे के मोहताज नहीं 
उसके हर पल अलग ही है 
हर एहसास अपने आप में पूरी है 
देवकी अपने कोख से महान है 
यशोदा अपने ममता से...

बंटवारे की कोई जरूरत क्या है 
कोई क्या बांटेगा किसी के 
एहसास को, साँसों के जज्बातों को ...

यह कोई जायदाद या जमीन तो नहीं हैं 
ना कोई कीमत की मोहताज 
इनके बँटवारे कैसे हो सकता है...
यह जो एहसास की दुनिया है 
यह अपने आप में पूर्ण है...
चाहे वह देवकी की कारागार में 
जन्मे कृष्ण के पहला साँस हो 
या यशोदा के आंगन में खेलता हुआ 
कान्हा के पहला शरारत हो...
इनके कैसे कोई बंटवारा करे 
कृष्ण तो एक है, जीवन के स्रोत तो एक ही है 
फिर क्यों यहाँ बंटवारे की बात होती है???

No comments:

Post a Comment