तू आसमान पर दिखा नहीं
जब तुझे मैं ख़ुद के खुदा मान लिया,
पता नही, क्यों जमीन पे आकर बैठ गया
ये खुदा, वाह रे तेरा यह क्या अदा....
जब हाथ से मैं तेरा
कोई तस्वीर बना लिया
अंगूठा मेरा काट कर
तूने मकसद पा लिया
बताया भी नहीं मैं क्या करूं
लेकर बाकी बची ये उंगलियां...
ये खुदा, तू ही बता
यह तेरी कैसी अदा...
सारे फूल कोई तोड़ लिया
चमन तो किसी ने बेच दिया
मगर ये खुदा तू ही बता
वे तितलियों के क्या खता...
सारे बंधन छुट गया
सारे उलझन मिट गया
जब सारे सपने, सारे तारूफ
चिता के आग में जल गया....
तू ही बता वह ताल्लुक का मैं क्या करूं
जो दिल के आंचल में रह गया
ये खुदा, तू ही बता
वाह रे तेरा यह क्या अदा !....
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