महाभारत का है प्रांगण
यहां समय नहीं है खडा आज
सुख दुख या हार जीत का प्रश्न लेकर...
उठो है पार्थ, उठाव धनुष,
यह है अंतिम संग्राम
जीवन का उतार चढाव का
यह है शेष प्रहर....
बहुत हुआ समझना समझाना,
समझौता करना और सहना....
अझात रहना और बारहवें वर्ष बन में बिताना
बहुत हुआ है अन्याय, अधर्म के साथ रहना...
गांडीव में प्रत्यंचा चढाव
त्याग दो सारे बंधन और अहंकार ...
मत भूलो यह संघर्ष ना है तुम्हारा या उनका
ना है कौरव और पान्डबों के भीतर
है पार्थ, तुम लाख कोशिश कर भी लिया है
सैकड़ों बार जन्म लिया है,
दुर्योधन यहां मानते नहीं हैं
जिनके भाग्य में विनाश लिखा है
वह प्रज्ञा के दिया जलाते नहीं है....
वह कृष्ण की पूजा करते नहीं है ....
नारायणी सेना इछते वही
हर गलती को ठहराते सही
नारायण इन्हें मिलते कैसे
चले थे जो बांधने गोविंद जैसे....
उठो पार्थ अभी कायरता त्यागो
अपने निद्रा से अभी तो जागो
यह संघर्ष है आज शांति की
यह धर्म-अधर्म के बात की
यह युद्ध है सत्य -न्याय की
अतीत और आने वाले कोइ वक़्त की....
तोड़ लो सारे बंधने,
अपने पराये के उलझने
हर कोई यहां अजनबी
मत करो कोई शोक अभी ....
या तो यहाँ कोई आज भी
सत्य का है सारथी
नहीं तो साथी है झूठ की....
मत भूलो तुम नर हो
नारायण के अंश हो
हर कोई लड रहा है रण
अपने हिस्से का अंतिम प्रण...
हर कोई यहां अकेला है ,
निसंग, बेबस, लाचार है
असत्य की यह भीड में
महाभारत की रण में....
ना है कोई सखा, ना है कोई सहोदर
यहां आज दो शब्द हैं सार
या तो यहाँ यह सत्य है
या है झूठ के पारावार
भूल जाओ पार्थ आज यह
यहां कोई पितामह हैं
या कोई यहां गुरु द्रोण भी
धर्म युद्ध है यह सदियों की...
यह है समर अंतिम ही
अपना -पराया कोई नहीं
सगा, सहोदर कोई साथी
ना आगे ना पिछे कोई ....
पंचजन्य का पुकारे है
गांडीव उछालो पार्थ है,
त्याग करो सारे अभिमान को
याद रखो सिर्फ कर्म को....
यह नहीं है सिर्फ़ हस्तिनापुर की
अंतिम चाल कौरवों की
यह है उपहास दुनिया की
असत्य का झंडा फहराने की ....
यह नहीं सिर्फ कपट का पाशा
लाक्शा गृह की अभिलाषा
नहीं था केवल पापान्डबों के
हत्या की एक प्रयास के ....
यह है व्यथा विनाश का
नारी का मान - मर्यादा का
दुशासन क्या छुलेगा
पान्चाली का यह वस्त्र का
कृष्ण सखा जिसके हों
मिलता कैसे वह पापियों को ...
मगर यह पांचाली की ही प्रश्न नहीं
ना है बात इंद्रप्रस्थ पटरानी की
यह संघर्ष है हर एक साधरण नारी की
उसकी पीड़ा और अश्क की रण भूमी की...
यहां प्रश्न नहीं हार जीत की
तुम्हारी प्राप्ति अबा वीरगति की
तुम्हारे स्वर्ग मर्त्य की यात्रा की
या शत्रु मित्र के भाग्य की
प्रश्न भी नहीं राज्य किसीका अबा होगा
किस को मिलेगा वीर गाथा...
प्रश्न आज यह भी नहीं
समर शेष में होगा कोई
भीष्म, द्रोण या कर्ण भी
प्रश्न है आज सिर्फ धर्म की....
उठो है पार्थ, उठाव गांडीव,
त्याग करो मोह,अभिमान की,
त्याग दो सारे दुख हताशा
द्वेष, अहंकार और शंका की...
समर्पि दो तुम अश्क, निराशा
कृष्ण ही स्रष्टा,क्रिष्ण ही दाता
कृष्ण ही द्रष्टा, कृष्ण ही कर्ता
कृष्ण ही आज सारथी रथ का,
वही बने आज आलोक पथ का
धर्म -अधर्म के महा समर का
अन्तिम घडी के यही आशीर्वाद,
होगा आज सत्य का विजय
उठो है पार्थ प्रत्यंचा चढाव
खूब हुआ अत्याचार,
धरित्री को करो विकार मुक्त
सत्य के लिए करो प्राण न्योछावर...
उठो है पार्थ, प्रत्यंचा चढाव
खूब हुआ अत्याचार....
खूब हुआ अत्याचार..........
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