Sunday, 30 November 2025

रु के लिए एक पैगाम

पता नही आज अचानक बहुत रोना आ गया फिर.... वजह तो मुझे भी नहीं पता.  लगा जैसे बहुत रोने से कुछ अच्छा हो जाएगा. कितनी अजीब इत्तफाक है, यह नमक  में  कोई खुदाई जरूर  होगी, यह हमारे आंसू में भी है और समुंदर मैं भी, जरूर दोनों के बीच कोई गहरा ताल्लुक होगा.....
अगर मरने से पहले आप से कभी मुलाकात हो गया, तो मुझे जरूर जी भरकर रोने का इजाजत दे देना, शायद इस से मन हल्का हो जा जाए और मैं फिर समुंदर की तरह जीना सीख जाऊँ....
शायद आज जिंदगी से कोई शिकायत नहीं है मुझे, जो थोड़ा रोना आ गया...पता है, जिंदगी में ऐसे बहुत कम वक़्त आते हैं जब कोई रोना चाहे और रो पाए..यह  रू के लिए एक संदेश है, उसे जरूर बताना...
 उस से  यह कह देना, "अरे पगली, क्यूँ परेशान हो रही हो, क्य़ा खोने को डर रही हो, तुम्हारे पास जो कुछ है, वे सब तुम्हारा ही है,  💯 ". पिछले बार जब वह बहुत परेशान थीं, मन करता था,  उसे समझा दूँ, "अरे पगली, हम तुम्हें कैसे समझाए, जो शख्स को हम जानते थे, तुम्हारे साथ उनकी कोई ताल्लुक नहीं था, और जो आज तुम्हारा है, उस से तो हम वाकिफ भी नहीं है, वो तुम्हारा है, बिल्कुल तुम्हारा, तुम ने उस पर अपनी जिंदगी न्यौछावर कर दी है, तुम ने उन्हें घर, संसार दी है, उन को दुनिया के  सबसे अनोखा तोहफा दी है, माँ बन के  उस इंसान को तुम पिता होने का एहसास दिया है ....तुम ने उस की हर ग़म, हर खुशी, हर पल, हर मोड़ के साझेदारी निभायी है "...फिर उसे कोई कैसे तुम से ले जा सकता है.  और कुछ हो न हो यह भरोसा तुम मुझ पर बिल्कुल रख सकती हो, मैंने आजतक किसी का भरोसा नहीं तोड़ा है, यह मेरी जिंदगी की आखिरी और सबसे क़ीमती पूंजी है और इस जिंदगी के लिए यही  बहुत है...शायद किसी वजह से मैं तुम्हें यह कह न पाऊँ. हो सके तो यह तुम समझ जाना.  मेरा एक मानना है, की जो तुम खुद बनाए हो, वह तुम्हारा ही रहता है, कोई उसे क्या ले जाएगा. समुंदर से लेना क्या देना क्या  ! लोग कितने अजीब उलझन से जीवन के सुन्दर पल खो देते है.  किसी ने सच  ही कहा है, 
"मैं कल को तलाशते रहा, 
और शाम होते होते मेरा आज डूब गया "

आज जो तुम हो, जो कुछ तुम्हारे पास है, साथ है, उस का कद्र करो और हर पल को जितना हो सके जियो, कोई नहीं जानता , जिंदगी में यह जो " है " कब " था " में बदल जाता है. मेरी  छोटी-सी यह  जिंदगी  में एक मामूली समझ है, यह जीवन एक स्रोत है, कौन जाने कौन सी अनंत काल से अपने आप बहती जा रही है, जीवन का अंतिम लक्ष्य है अकेलापन से एकांत तक रास्ता तय करना, वह जितनी सफाई  से हो, जितनी गहराई से हो, उतना अच्छा है औऱ यह हम जैसे इंसानों को जितना जल्दी समझ आ जाए उतना अच्छा है. "

कितनी बड़ी सीख है.....  मेरी गुजारिश है दोबारा वह गलती कोई और न करें.  मेरे तरफ से उस से थोड़ा प्यार दे देना और समझा देना जो आज हमारे पास हैं उस के लिए खुदा के शुक्र करें और मेरी उमर उस से लग जाए.  पहले से जिंदगी तुम से बहुत कुछ ले चुकी है, बाकी जो कुछ है, वे सलामत रहें...मुझे कभी कुछ खोने का डर था ही नहीं, देता वह खुदा ही, ले तो वही सकता है.  इंसान इंसान को क्या दे सकता न ले सकता है....आजतक दुनिया में ऐसे रईस इंसान पैदा हुआ ही नहीं कि जो उसके  सारे जायदाद के बदले बीती हुई  एक पल भी खरीद सके.....  और आप और हम तो साधारण इंसान है, हम क्या दे सकेंगे, खरीद सकेंगे....मैंने तो एक एहसास के साथ कुछ लम्हे जी लिया जो मेरे अस्तित्व का अंश है, यह कर्ण का कवच-कुंडल भी नहीं जो मैं काट के किसी को दे सकूं.  जो मेरे साँसों के  साथ साथ सहज  चलते हैं, मेरे साथ ही जायेंगे, उस से अधिक मैं क्या कहूँ....यह तो कोई दैवी आशीर्वाद है....

मजे की बात है, अगर जब आप मेरे पास थे तब भी अगर वह वहां आ जाती थीं और आप को चाहती थीं, शायद मैं खुशी खुशी आपको उन्हें सौंप देती...प्यार तो दुनिया की सबसे अनोखा तोहफा है, अगर वह कोई दे पाए, तो उस से बड़ा भाग्य क्या हो सकता है?

उस से  यह कहना मेरी तरफ से....." इतना भरोसा मैं तुम्हें दिलाती हूं तुम्हें कभी कोई तकलीफ देना न मेरा मतलब रहेगी न मकसद.  ऐसे तो तुम्हारे मेरे ऊपर बड़ा एहसान है,जिंदगी में कुछ नाजुक मोड़ में तुमने ही उनके सहारा बने, प्यार लेने का नाम नहीं, देने का, मगर तुम तभी दे पाओगे जब तुम खुद पूर्ण हो, शायद तुम ने भी कुछ हदतक वही किया है मेरे अंदाज में, तो फिर क्यूँ परेशान हो? "

तुम्हारी उलझन, तुम्हारे परेशानी मुझे ताज्जुब तो नहीं किया था,  यह दुनिया की बहुत पहचानी सी दस्तूर है, कोई नया नहीं  है, फिर भी थोड़ा निराश तो ज़रूर हुई होगी मैं, क्योंकि  मेरा कुछ अलग  नजरिए रहे जिंदगी के तरफ, शायद कुछ थोड़ी देर लिए भी हो मैंने यह तुमसे उम्मीद कर ली होगी  की तुम शायद मेरी नजरिए से देख भी पाओगे, अंदर एक आवाज भी आई की, .....काश तुम मुझे समझ पाते, काश मैं तुम्हें समझा पाती....
खैर कोई बात नहीं, आज नहीं तो कल, इस जहां में नहीं तो कोई और जहां में शायद तुम यह समझ जाओगे.  तब तक के लिए यही दुआ है, कि तुम महफूज रहो, तुम्हारे सुन्दर दुनिया सलामत रहे, तुम्हारे हर ख़ाब पूरी हो जाए, और जो ख़ाब पूरी ना हो वह ख़ाब तुम्हें कभी न आए. "

खुदा हाफिज....


Saturday, 22 November 2025

तलाश

 मैंने तसव्वुर में एक तस्वीर खिंचा था 
आज आईने में झांकी तो दिखाई न दिया ....

जिंदगी जैसे अब धुंधली हो गई है 
अब सन्नाटे में वह ढूंढ रही है 
वह तस्वीर, वह तसव्वुर को 
वह बेमिसाल राह और बेजुबान अंदाज को...

आज बैठे बैठे माजी को परख रहा हूँ 
वह रास्ते जहाँ पर भटक गया था 
उसी राह को तरस गया हूँ 
उसी राह को बेइंतहा तलाश रहा हूँ...

कई रास्ते एक दूसरे से टकराते थे 
समझ नहीं आया था किस और जाएं 
कौन सा गलत और कौन सी सही है....
शायद वहीँ लडखडा गया 
वहीँ यह खयाल को पत्थरों की
लकीर मान लिया होगा ,
जैसे वही अड गया,
मैं सही हूँ, 
मैं ही सही हूँ...
यही ठान लिया...

कोई और भी है, 
कोई और भी सही है 
कई रास्ता सही होते हैं 
यह खयाल ही छोड़ दिया...

और शायद वहीँ पर, उसी वक़्त
अपने आपको खो दिया
वह तसव्वुर और तस्वीर भी
वहीँ छुट गया...

चलते चलते ढेरों अजनबी मिले,
कई पानी के बुलबुले जैसे बिखर से गए 
कुछ सामने होते हुए भी नजर नहीं आए 
मगर वह एक ही तस्वीर थी 
जो बिखर जाने के बाद भी वहीँ खड़ी थी...

तलाश रहे थे  हम वह पुरानी चेहरा 
तसव्वुर से निकल के जो सच हो गया 
मन के आईने में जब जब झाँकी 
वही तस्वीर दिल की गहराई से उभर आई ....

जो साया के जैसे साथ रहती थी 
आईना की तरह सच बोलती थी 
और बेइंतहा, बेहिसाब मोहब्बत करती थी 
हमें सारे दुनियादारी से आजाद रखती थी....

जिस  के भरोसे आसमान से ऊंचे 
जिस के दिल की गहराई सागर जैसे 
जो धरती जैसी  सह भी लेती थी 
दिया की तरह हमें राह दिखलाती थी ....

कैसे, क्यूँ, कहाँ, कब हमने उसे खो दिए 
वह तस्वीर से हम जुदा हो गए....
सदियाँ बीती, सैकड़ों चेहरे आ कर मिले 
मगर वह तस्वीर या तसव्वुर से कोई ना मिले...

ये खुदा, 
तेरे दरबार में  यह  आखिरी दुआ है 
हमें आज  वही तस्वीर दे दे 
वही तसव्वुर के साथ रहने दे ....

जिस को हम पालकों पर बिठाये रखें 
तमाम उम्र उसी को ही महफ़ूज़ रखें
अब और कोई आलम नहीं
दे पाओगे  तो दे दो मुझे तस्वीर वही....

जो तस्वीर हम जिंदगी भर 
तलाशते रहे, 
दुआओं में तो वही मांगे थे 
फिर भी क्या बदनसीब हैं 
समझ ही न पाए...

Monday, 17 November 2025

कौन अच्छा और कौन बुरा है

कौन अच्छा यहां कौन बुरा है?
कौन खोटा और कौन खरा है...
थोड़ी बुराई
 तो कर्ण में भी होगी 
दुर्योधन में भी कुछ अच्छाई तो हुई होगी....

हुस्न वालों के नगर में आज यह कैसा मेला 
हर किसी के हाथ में आईना टूटा हुआ....

बेशुमार भीड़ है 
फिर भी हर शख्स यहां 
दिख रहा है बेबसी में 
क्यूँ  अकेला खडा हुआ....

जिन्दगी का यह खेल है 
दो पल का तो मेल  है 
फिर भी क्यूँ हर कोई यहां 
परेशान बेशुमार हैं....

हर कोई क्यों यहां 
जीत के दौड़ में भाग रहा है 
भूल चुका है यह खेल है 
यहाँ हार जीत में क्या ही है 

वह सिकंदर हो गया 
सच में जो बेमिसाल खेल खेला....

खुदा, सिर्फ खुदा ही गवाह यहां 
सिर्फ वही है खेल के रेफरी और 
वही करेगा आखिरी फैसला यहां....

खेल के मैदान है यह 
जीवन का यही रंग मंच...
जो समझ पाया, 
वह अपना खेल बखूबी खेल गया 
अपना किरदार बेहतर निभा गया
जो ना समझा वह जीवन भर 
शतरंज के पासा में उलझा ही रह गया...

जो हार जीत के उलझन में फंस गया 
जीवन क्या है, खेल के मैदान में वह क्यूँ आया 
यही बात भूल गया, 
वह जीत कर भी हार गया 
सिकंदर बनते बनते रह गया 
और ऐसे कोई और भी होगा 
जो खुदा के मंजर को समझ पाया 
और हंसते हंसते खेल गया....

हार कर भी जीत गया 
हार जीत के कशमकश से परे हो गया....
जो समझ गया, 
ना यह रास्ता ज्यादा खूब सूरत है 
ना मंजिल बेमिसाल है 
यह साथ चलने वाले साथी ही है 
जो वाकई सिकंदर बनाते हैं...
रास्ता कोई भी हो, 
मंज़िल मिले या नहीं 
उसके परवाह किए बैनर 
जो साथ निभाते हैं 
वही साथी जीवन के 
अनमोल तोहफे होते हैं
हर मुकद्दर के सिकंदर बना जाते हैं....

फिर क्यूँ सोचना कौन अच्छा यहां 
और कौन बुरा 
क्या खोटा और क्या खरा....
जो मुकद्दर में वह तो अता हो गया 
पाप की झील में डूबकर भी 
कोई इंसान देवता हो गया....




Thursday, 6 November 2025

जिम्मेदारी

जिंदगी ने कुछ जिम्मेदारी दी थी, 
कुछ आप के हिस्से में 
कुछ हमारे हिस्से में 
कुछ हम दोनों के हिस्से में...

कुछ जिम्मेदारी निभाए हम ने 
कुछ आप भी  निभाए होंगे, 
कुछ वक़्त ने खुद निभा लिया होगा 
और कुछ जिम्मेदारियां दुनिया के 
दस्तूर ने बदल दिया होगा ...

कुछ किस्से अभी भी गुमनाम हैं 
कुछ ज़ज्बात अभी भी बेजुबान हैं...

कुछ जिम्मेदारी अभी भी बाकी है, 
कुछ हमारे हिस्से के 
कुछ आप के हिस्से के 
कुछ फिर ज़माने या हालात के हिस्से के 
या हम दोनों के हिस्से के....

कुछ जिम्मेदारी हमारे हिस्से के 
आप ने निभाए होंगे, 
कुछ हमने भी आप के हिस्से के 
कुछ दोनों के हिस्से के 
भाग  भी कोई और भी निभा लिए होंगे ....

कुछ अखिर जिम्मेदारियां बचे हैं 
तुम्हारे और मेरे जनाजे पर शामिल होने के 
थोड़ी देर वहां ठहर जाने के 
एक दूसरे के मजार पर कुछ लम्हें 
गुजार देने के, 
कुछ दुआएं मांग लेने के....


खुदा के दुनिया के  एक  ही शर्त है ....
अपने कंधे पर कोई रो नहीं सकता 
अपने को कंधा कोई अपने आप
 दे नहीं सकता...

ये जिम्मेदारियां वह औरों के कंधे पर 
रख दिये हैं, 
अपने हिस्से में भी 
नहीं लिए हैं....

चलो जिंदगी की यह अखिर जिम्मेदारी भी 
पूरी कर लेते हैं 
एक दूसरे के जनाजे पर आने  का 
और  एक दूसरे के मजार पर 
कुछ पत्तियाँ, कुछ फूल और कुछ यादें 
बिखर देने का और कुछ दुआएं 
मांग लेने  का...

कुछ आप के हिस्से के 
कुछ हमारे हिस्से के 
और कुछ हम दोनों के हिस्से के....

तुम तुम रह गए और हम हम रह गए

कौन कहता है तुम बदल गए 
या हम बदल गए, 
या हम दोनों ही बदल गए....

गलत कौन था या गलती कहाँ हुई 
शायद गलती नहीं 
कोई गलत फहमी हो गई...

धूल चेहरे पर थी 
और तुम जिंदगी भर आईना साफ़ 
करते रहे, 
शायद वही गलत हुआ 
तुम्हें जैसे कोई गलत फ़हमी हो गई...

और हम भी क्या कम जिद्दी थे 
तुम अगर तुम रह गए 
हम भी हम ही रहें 
रत्ती भर भी बदल ना पाए...

जिंदगी भर तुम्हारे लिए 
तुमसे ही लडते रहे 
मगर तुम्हें उसके 
अंदाज भी आने न दिए....

लोग तो अपनों के लिए 
दुनिया के साथ लडते हैं 
हरदम कुछ पाने के लिए 
बैचैन रहते हैं...

कमबख्त हम ही एक थे 
जिनके ऊपर खुदा के 
यह ग़ज़ब मेहरबानी देखिए...

कमबख्त हम भी ऐसे 
ग़ालिब बन गए 
जो जिंदगी भर तुम्हारे लिए 
तुम्हारे साथ लडते रहें...

और कुछ पाने के लिए नहीं 
तुमसे जो अश्कों उधार लाए थे 
वही चुकाने के लिए....

समुंदर में एक चुटकी नमक हो के 
घुल जाने के लिए 
हम खाक हो गए...

तुम तुम ही रह गए...
         और 
हम भी अखिर हम ही रह गए....


Tuesday, 4 November 2025

मैं हूँ ना....

तुम जानना चाहते थे यही ना 
हम तुमसे प्यार करते की नहीं 
और करते तो कितना करते...

हमें बड़ी हंसी आ गई...
तुम्हारे  यह बचपना हरकत पर 
और मासूमियत अंदाज पर....

अगर " हमें तुमसे मोहब्बत है "
कह देने से मोहब्बत के ज़ज्बात 
पूरी हो जाती 
और मोहब्बत मुकम्मल हो जाती 
और मिसाल कायम कर लेती 
 तो मीरा- गिरिधर या राधा- मुरलीधर 
दिलों में नहीं बसते,
बाजार में मिलते ...

मोहब्बत में कोई कहेगा क्या 
वह तो एक एहसास है 
उसे मेहसूस कर लिया 
तो मिल गया, नहीं मेहसूस किया 
तो भ्रम में जीवन भर भटकता रहा...

प्यार में कोई कुछ लेता नहीं 
प्यार देने का ही नाम है 
मगर,  अगर यह समझ पाओगे 
तो यह जरूर देख पाओगे 
जिसे सच्चा प्यार मिला है 
वह तो धनवान हो गया
 और जिसने 
दिया वह भी बांटते बांटते कंगाल नहीं 
 और भी धनवान और महान हो गया...

प्यार कोई रीति रिवाज नहीं, 
उसका कोई साझा रंग या रूप नहीं 
वह ऐसी रंग है जो एक बार लग जाए 
वह चुनरी या तो राधा बना जाए 
या मीरा कहलाये...
प्यार तो ऐसी कोई इबादत है, 
उस पूजा के थाली में धूप, दीप नहीं रहते
उस में साँसे और रूह की आहुति होती है...

प्यार कोई चांदी या पीतल नहीं 
जो आग में जलते ही भस्म हो जाए 
यह  तो वह खरा सोना है 
जो आग में जलते जलते 
और शुद्ध हो जाए 
कभी याज्ञसेनी तो कभी 
सीता बन जाए....

फिर तुम अब क्यों पूछते हो 
हमें तुमसे सच में मोहब्बत है या नहीं...
और है  तो भी कितना है यह भी...
हम तो आर्यभट्ट के जैसे विद्वान नहीं 
शून्य कहाँ से आया और कहाँ जाएगा 
इसका गणित तो समझते नहीं 
बाएं में रहें तो शून्यता कहलाए 
दाहिने में सैकड़ों बनाए 
अगर ऊपर रहा सभी फल को मिटाए 
 एक ही शून्य ही कर जाए 
नीचे आया तो अनगिनत संख्या हो जाए....

हमें यह हिसाब किताब से क्या करना 
तुम भी उस से दूर रहना...
जब कभी कुछ मासूमियत बिखरने चाहो 
कोई हंसी बांट कर हंसना चाहो 
या कभी तुम्हें रोने को कोई 
कंधा चाहिए 
पाँव रखने को भरोसा चाहिए...
हमें बस याद कर लेना...
बेझिझक हमारे यादों के शहर में जाना...
हम हैं ना....
हमेशा की तरह....

मोहब्बत को किसी रोज साँसों में 
जोड़ कर देख लेना...
कुछ साँसे जिनके ऊपर थोड़े से
 भी हक थे हमारे,
 हम आपके लिए वही छोड़ दिए हैं 
उन्हें छोड़ आए हैं आप के लिए...

उसको जुबानी कैसे बताये कोई 
उसका क्या गिनती करे कोई...
कुछ देर हमारे साथ चलना साया की तरह 
वह खामोशी ही आप को बता ही देगी 
और वह ज़मीन से आसमान के 
तरफ  एक नजर देख लेना...
हम तुम्हें वहीँ खडे मिलेंगे 
हमेशा की तरह....
अब तो समझ आ गया होगा...
मैं हूँ ना.....
तब से अब तक, 
फिर अब से तब  तक 
मैं हूँ ना....
हमेशा की तरह....


Saturday, 1 November 2025

मथुरा से वृंदावन तक....

मैं कृष्ण हूँ, 

मथुरा के कारागार में जन्मा हूँ...
उस भादों के अंधेरे रात में 
कृष्ण पक्ष आठवीं नक्षत्र के 
रात के सन्नाटे के आठवीं प्रहर में...

हाँ , मैं वही कृष्ण हूँ...
जन्म होते ही मेरे पिता के कन्धे पर 
यमुना पार कर किसी नंद राजा के 
आँगन में पहुंचा हूँ...

हाँ मैं वही कृष्ण हूँ 
देवकी माँ के कोख से जन्मा 
यशोदा माँ के आंगन में खेला हूँ 
वहीँ पर पला बढ़ा हूँ 

लोग मुझे नटखट कहते थे 
शरारती मानते थे 
कोई ग्वाला कहा, 
कोई माखन चोर भी कह दिया...

किसीने गोपियों का सरताज़ कहा 
किसीने तो मुझे रणछोड का 
नाम भी दे दिया 
फिर किसी ने यह भी पूछ लिया 
मैं  हूँ सच  में  किसका ?
मैं देवकी माँ का आठवां पुत्र हूँ 
या यशोदा माँ की नयन का पुतला...

क्या जवाब दूँ ?
मैं सच में कौन हूँ 
किसका हूँ 
क्या मैं मथुरा का रह गया हूँ 
या वृंदावन के पास हूँ....

सच तो यह है...
मैं देवकी माँ के 
कोख से जन्मा कान्हा हूँ 
कारागार में उनके अश्कों का 
दाग हूँ, 
बेड़ियों में बंधे उनके पैरों के 
निशान हूँ, 
उनके पीड़ा के साझेदार हूँ...

उतना ही मैं यशोदा माँ की भी रुणी हूँ 
उनके आँखों के सपनों में रहा हूँ...

कैसे कहूँ मेरे लिए कौन बड़ा है 
कौन छोटा, 
कौन कम है  कौन ज्यादा...
यह न ही सम्पत्ति है  मेरा 
ना कोई जायदाद के पिटारा...

यह कैसे किस किस मैं बंटवारा होगा?
कोई नौ महीने के कोख दिए 
बेड़ियों के बोझ उठाते उठाते 
मुझे धरती पर जन्म दिए...

फिर किसी ने मुझे 
सिर्फ़ उसके आंगन नहीं 
दिल में ही बसा लिए 
आँखों से ओझल हुए 
तो अश्कों से नाह लिए...

अब तुम्हीं बताओ दुनिया वाले!
मैं कृष्ण, तुम्हें क्या उत्तर दूँ 
मैं किसका था या किसका हूँ 
किस का रुणी था या किसका रूणी हूँ...

शायद मैं सदियों से वहीँ था, वहीँ हूँ 
वही कृष्ण था, वही कृष्ण हूँ 
जितना मैं देवकी माँ का था 
उतना ही यशोदा माँ का हूँ...

यह तो विधि के विधान है 
कभी वह मथुरा के कारागार के 
बंद कोठरी में 
देवकी होते हैं 
तो कभी नंद की गाँव में 
यशो माता कहलाते है...

मैं कृष्ण हूँ 
शायद कभी विधाता के हाथ से 
देवकी के कोख से जन्म लिया था 
तो कभी यशोदा के आंगन में 
पला बढ़ा हूँ....

ये दुनिया वाले, 
मैं तुम्हें क्या उत्तर दूँ,
कैसे समझाऊं
समझ पाओगे तो आभार है 
ना भी समझो तो कोई बात नही है...


मैं वह खुश नसीब इंसान हूँ...
जो देवकी की कोख भी देखा 
और यशोदा के गोद में भी खेला 
कहीं माधव कहलाया 
तो कहीं गिरिधर हो गया...

यहां कोई बड़ा नहीं होता 
ना ही कोई छोटा 
कान्हा तो भाग्य से  कभी 
देवकी के हुए तो यशोदा के 
कहलाये ....

मगर कर्म से वह शुद्ध हो गए...
देवकी और यशोदा...दोनों में लिन हो गए 
कान्हा से कृष्ण हो गए 
और दोनों जहां से परे हो गए....





क्यों ढूंढ़ते हो ???

यह इंसान भी क्या ग़ज़ब चीज है 
जो खुशबू उसकी साँसों में बसी है 
उसे ऊपर, नीचे, 
अंदर, बाहर ढूंढता रहता है ....

जो यह समझ गया, 
वह समझदार हो गया, 
जो नहीं समझा, 
वह उम्र भर नासमझ रह गया...

कभी जिसे पालकों पर 
बिठाये रखता था, 
उसे फिर  रुखसत  कर दिया 
अपने अश्कों से,अपने पलकों से 
और उम्र भर दरबदर 
उसको ही ढूंढता रह गया...

एक अजीब मंजर की है यह जिंदगी 
ना सुकून से मुलाकात हुआ 
ना मंजिल से बात कर पाया 
ना रास्ते अपने हुए 
ना सफर भी साथ रहे ....

जो बहार कभी  रख लिए थे 
धडकनों के जेब मैं, 
उसे   ताउम्र ढूँढते रहें 
कभी कारोबारी दोपहर में 
तो कभी बदमिजाज शाम में....

अब यहां किसी के लिए 
कौन सोचता है जनाब 
ना फुर्सत किसी के लिए
किसीके पास है ! ....

अब दुआओं के बरकत 
कौन मांगता है 
किसी अजीज दोस्त के लिए,
कौन देता है 
नसिहतें या हिदायतें 
आज  यहां कोई अपना किसी के लिए...

अब कहाँ  मिलते हैं  यहाँ 
दिल दुखाने वाले कोई सच्चा दोस्त 
इन जरूरतों के ख़ुलूस और 
मतलबों के सलाम के दुनिया में...

फिर क्यों ढूंढते हैं आज 
आप अपने आप को 
कोई खोए हुए सावन और 
पतझड़ के खयाल से ?.....

क्या ढूंढते हैं आप यहां?
क्या पाएंगे आप 
यह बनावटी दुनिया और 
बेरहम बुनियादी दस्तूर से....







Friday, 31 October 2025

अजीब इत्तफाक

कितनी अजीब इत्तफाक है दोस्त, 
समुंदर के गहराई से ताल्लुक रखने वाले भी 
कभी कभी तालाब जैसी बातेँ करते हैं ....

जिस समुंदर ने हजारों नदियां अपने सीने में 
समा लिया था,
उसी से ही पानी का हिसाब मांगते हैं....

जिस समुंदर ने सबकुछ लौटा दिया 
उसी की किनारे बैठे हुए 
खोने का एहसास जताते हैं ...

जिस दिया ने सदियों से एक ही लॅ
लेकर बैठी है 
उस से वफादारी की सबूत पूछते हैं ...

अजीब इत्तफाक है दोस्त 
हम जैसे एक अजीब दौर से गुज़रते हैं...

पास रहने वाले  अपनों को अपनों 
के खबर नहिं  है 
मगर अफवाह मिलों दूर फैली हुई है...

जिन अंधेरों ने सूरज को ढक लिया था 
वही सुबह से सवाल पूछते हैं...

जो  कभी कोई सवाल के जवाब नहीं देते थे 
वह आज खामोशी से हैरान हैं...

अजीब दास्तान है यह दोस्त, 
शायद हम कोई एक 
नायाब दुनिया में अब जीते हैं...

रात रानी के मुरझाने पर 
जिन के नजर भी नहीं गए थे कभी, 
आज वह एक पीले पत्ते के खातिर
 आँसू बहाते हैं...

जो इंसान को पत्थर समझ बैठे थे 
वह आज पत्थर में खुदा तलाश करते हैं...

अजीब इत्तफाक है दोस्त...
जो अश्कों के झील में नहाकर भी नमक की वजूद को नहीं समझ सके 
वही आज समुंदर के पानी में उसके ख्वाहिश को तलाशते हैं...

अजीब इत्तफाक है जनाब 
जो कल को तलाशते तलाशते 
अपनी आज को खो दिए 
वही आज बीते हुए लम्हों में 
अपने आप को, अपने आज को ढूंढते हैं....

अजीब इत्तफाक यह दोस्त
अजीब दास्तान है यह जिंदगी, 
जीते जी मौत से टकराती है 
और मरकर भी अमर कर जाती है...



ये खुदा, वाह रे तेरा यह क्या अदा...

ये खुदा, वाह रे तेरा यह क्या अदा!

तू आसमान पर दिखा नहीं 
जब तुझे मैं ख़ुद के खुदा मान लिया, 

पता नही, क्यों जमीन पे आकर बैठ गया 
ये खुदा, वाह रे तेरा यह क्या अदा....

जब हाथ से मैं तेरा 
कोई तस्वीर बना लिया 
अंगूठा मेरा काट कर
तूने मकसद पा लिया 
बताया भी नहीं  मैं क्या करूं 
लेकर बाकी बची ये उंगलियां...

ये खुदा, तू ही बता 
यह तेरी कैसी अदा...

सारे फूल कोई तोड़ लिया 
चमन तो किसी ने बेच दिया 
मगर ये खुदा तू ही बता 
वे तितलियों के क्या खता...

सारे बंधन छुट गया 
सारे उलझन मिट गया 
जब सारे सपने, सारे तारूफ
चिता के आग में जल गया....
तू ही बता वह ताल्लुक का मैं क्या  करूं 
जो दिल के आंचल में रह गया 

ये खुदा, तू ही बता 
वाह रे तेरा यह क्या अदा !....





Monday, 27 October 2025

घर

दिल में एक घर की तमन्ना थी, 
जिसको आज हम ढूंढ रहे थे...

ढेरों सपने बुने, नक्शे बनाएं 
यादें इकट्ठे किए 
पत्थर काटें,ईंटें जोड़ें 
चट्टानें बनाएं 
छत डालें ....

दिल में एक घर की तमन्ना थी,
जिसको आज हम ढूंढ रहे थे....

बगिचे में खूब गुलाब लगाए 
आन्गन पर दामी लन बनाए
सामने गेट पर सुइस कैमरे 
पोर्च पर संगमरमर चेहरे 
हर तरफ आर सी सी की दीवारें....

दिल में एक घर की तमन्ना थी, 
जिसको हम आज ढूंढ रहे थे....

जापानिज गाड़ियां गराज में 
चाइनीज वास ड्रॉइंग रूम में 
शानदार आर्ट दहलीज पे 
बोहेमियन सानडेलियर बालकोनी पे

दिल में एक घर की तमन्ना थी,
जिसको आज हम ढूंढ रहे थे....

पीछे मोड़ कर देखा,
तो वह घर कहीं नजर नहीं आया 
वह एक मकान ही बन गया था 
जैसे सपनों का वह घर से  मिलों दूर  
एक आलिशान महल वहां खडा था...

दिल में एक घर की तमन्ना थी,
जिसको आज हम ढूंढ रहे थे....

अर्से बीत गये, आंखें वही थे 
मगर सपने बदल गए थे 
चट्टानें  मजबूत तो हुए थे
मगर  वह मासूम आरजू कहीं खो गए  थे

दिल में एक घर की तमन्ना थी,
जिसको हम आज ढूंढ रहे थे....

इत्र के खुशबू से सारे मकान महक रहे थे 
मगर रिश्तों की चाहत कहीं छुट चुके थे 
वह तमन्ना वक़्त के रेत पर थके हारे 
 किसी एक कोने में सो गए थे 

दिल में  एक घर की तमन्ना थी...
जिसको हम आज ढूंढ रहे थे 

हम वहीँ खडे थे, 
मगर 
बर्षों पहले अपनों को, 
और अपने आपको कहीं
छोड़ आए थे....

दिल में एक घर की तमन्ना थी....
जिसको आज हम ढूंढ रहे थे....

घर के दहलीज पर खामोश खडे
दूर कहीं वह आंखें, वह सपने 
वह तमन्नाओं को ढूंढ रहे थे...

दिल में एक घर की तमन्ना थी...
जिसको हम आज ढूंढ रहे थे...


वहां वह घर  नहीं था , 
हम  एक बेजान, आलिशान 
मकान पर खडे हुए थे...

वह मासूम सपनों से मिलों दूर 
वह मकान की छाती  में 
वह घर को तलाश रहे थे...

दिल में एक घर की तमन्ना थी,
जिसको हम आज ढूंढ रहे थे....







Friday, 24 October 2025

क़ीमती तोहफ़ा

सुना है इस साल आप इस शहर में होंगे 
शायद तब मेरी सालगिरह की वक़्त होगा 


इतने साल के बाद फिर कुछ याद आ गई 
कुछ बीते हुए लम्हें ताजा हो गए 
कुछ खुशियां,  कुछ मायूसी 
बेफिक्र सामने खडे हो गए 

अर्सा बीत गया, मगर कुछ यादें 
बिल्कुल वेसे को वैसे ही  हैं
दुनिया के दस्तूर और समय के सैलाब भी 
उन्हें धुँधला नहीं कर पाए हैं...

एक सालगिरह याद आयी 
जिस दिन आप ने मुझे एक अजीब सी
तोहफ़ा दे दी थी....
कुछ वापस लेने की तोहफा..
अजीब इत्तफाक था वह  ....और 
अजीब  ताल्लुक़ है वह उस दिन से,
उस एक ही सालगिरह से मेरी 
कोई और सालगिरह ऐसे कोई तोहफा
लेकर कभी आयी नहीं...

बर्षों लगे समझने को 
कोई किसी अजीज के सालगिरह पर 
यह किस तरह तोहफा दिया...

"कुछ वापस लेने का"...

हर साल मेरी सालगिरह आती है, 
ढेरों लोग मुझे आशीर्वाद दे जाते हैं 
उस साल भी सभी ने मुबारक बात दी 
मेरी शुभकामनाएँ की 
माँ ने मेरे लिए मंदिर में दिया जलाई 
सब ने मेरे लिए दुआ मांगे 
मैं खुश रहूं, बेहद खुश...

किस्मत ने तो मुझे खूब आशिर्वाद दी है 
कभी बेसुमार आजादी से तो कभी 
किसी के बेमिसाल की समझ से ...
कभी रास्ता आसान करते हुए तो कभी 
मंज़िल मुकम्मल करते करते
कभी अचानक रेगिस्तान में
बारिश की मौसम भी लाके....
शुक्रगुजार हूँ मैं उसके
इस जिंदगी भर के लिए ही नहीं, 
यह जिन्दगी के बाद भी....

मैं हमेशा खुश नसीब रही 
हर सालगिरह मेरी अनगिनत लोगों के 
दुआओं से चहकते रहें हैं 
हमेशा की तरह ,आज भी रही...
मगर आज तक वह  एक ही उलझन 
उलझन ही रह गई 
वह एक की सालगिरह के पहेली 
अब भी  सुलझा ही नहीं....

आप ने मुझे ऐसे तोहफा क्यूँ दिया था...
वह आशीर्वाद  या कोई श्राप था..
वह आपके दुआ थी 
या आपने कोई मन्नत मांगी थी..
नहीं पता ....  यह सोचते सोचते 
बहुत वक़्त बीत गया है...

आप को याद होगा की नहीं 
यह भी मालूम नहीं 
आप ने ऐसे क्यूं किया था
यह भी  पता नहीं, 
उसका जवाब आज भी 
आप के पास है या नहीं, 
वह भी पता नहीं...

मगर मुझे इतना पता है 
आज मुझे यह सब आपसे 
पूछना भी नहीं...
जानना भी नहीं...

हो सके तो मेरे इस सालगिरह में 
मेरे लिए मन के अंदर एक दिया जला लेना..
अपने आप के साथ कुछ लम्हें गुजार देना 
अपने बालकोनी में खडे होकर 
किसी तारे के तरफ देख लेना 
और मेरे लिए दो मिनट के 
वक़्त निकाल कर दुआ कर लेना...
शायद उस में आपको समझ भी आ जाएगा 
किसीको कुछ "वक़्त " देना ही सबसे सुंदर, सबसे क़ीमती, सबसे अजीज तोहफा है...
शायद उस लम्हों में आप मुझे 
कहीं बेहतर समझ पाएंगे, 
और मेरी सालगिरह  भी
जरूर बेहतर गुजर जाएगी....

Monday, 20 October 2025

माफी

सबकुछ ठीक था, 
ठीक ही तो था 
कहीं कुछ भी कमी 
नजर नहीं आया था....

फिर अचानक कैसे 
सबकुछ बदल गया 
सबकुछ ठीक होते हुए भी 
जैसे कहीं कुछ बिगड़ गया 
सबकुछ ठीक होते हुए भी 
कहीं कुछ भूल हो गई, 
शायद कुछ गलत हो गया 
शायद बनते बनते कहीं कुछ टूट गया था ....

तमाम साल, महीने, सदियाँ बीत गए 
सन्नाटे में सैकड़ों बार अपने आप से बातें की 
रेगिस्तान से समुंदर तक ढूंढती रही 
एक जवाब, एक ही जवाब 
भूल कहाँ हो गई.....
सबकुछ ठीक तो था 
फिर भूल कैसे हो गई....

क्यों बना हुआ दुनिया बिखर सी  गयी 
हर ईंट में चट्टानों की मजबूती थी 
फिर वह घर तास के पत्तों की तरह
 क्यूँ धस गया , मिट्टी में मिल गया 
सबकुछ होते हुए भी
कैसे, कहां कुछ कमी रह गयी???

अर्से बीते, वह टूटे हुए सपने 
जुड़े तो नहीं, मगर खामोश हो गए 
आईना जो टूट गए थे, नए तो नहीं हुए 
मगर सवाल करना छोड़ दिये 
जो आँसू, रुकते नहीं थे
वे अब चुप हो गए 
जो मन बहुत से सवाल पूछता था, 
हर सवाल के जवाब तलाश कर रहा था, 
वह अब बिना जवाब से ही समझदार हो गया.. 

भूल कहाँ हो गई, 
किस से हो गयी 
मुझसे भूल हो गई 
या आपसे 
भूल हालात से हो गई    
या हम दोनों से हो गई?
आज भी यह सवाल सवाल हो कर रह गया...

मगर बात वहां नहीं रुकी
ऊपर  से कोई आवाज आई....
किसी ने तो अखिर  माफी  मांग ली 
और जैसे किसी ने माफ कर दिया...

भूल किस का था 
यह नहीं पता 
क्यूँ हो गया 
यह भी नहीं पता 
कैसे, कब ऐसी भूल हुई 
यह भी नहीं पता...
मगर शायद मैंने ही माफी मांग लिया 
सब से पहले अपने आप से 
फिर आप से 
फिर हम दोनों से 
और अखिर हालात से...

कभी सोचा है यह फिर कैसे हुआ ?...
यह भी नहीं पता था 
भूल किस की थी 
फिर मैंने माफी क्यों और कैसे मांग ली?

शायद मेरे आँसू आप को न सही
खुदा को मेहसूस हो गया 
उनका मन को कहीं धो लिया
मेरी कुछ सच्चाई उन्हें पिघला दिया...

वह एकदिन अचानक आसमान से 
ज़मीन पे उतरे, मुझे अपने कंधों पर उठा लिए और सारे आंसू पोंछ दिए और कहे
"माफ़ करने और माफी मांगने से 
बड़ा कुछ नहीं होता है....
क्यों ढूँढते हो भूल कैसे हो गई 
क्यों हो गई, और किस से हो गई 
यह सब मत पूछो अब, केवल 
माफी मांग लो ...उन से, हालात से, 
खुदा से, अपने आप से...
किसी और ने नहीं मांगी तो क्या हुआ, 
खुद के लिए माफी मांग लो 
उनके तरफ से भी मांग लो 
दोनों के तरफ से भी माफी मांग लो"

और शायद उसी पल, उस घडी
खुदा से दुआ की बारिश हो गई 
और मेरे सारे सवाल मिट गए, 
यकीन हो गया माफी मांगना जैसे कोई पूजा है 
और माफ़ करना कोई इबादत....
माफी मांगने वाले और माफ़ करने वाले 
दोनों ही बड़े नसीब वाले होते हैं 
खुदा के दुआ के हकदार होते हैं....
और मैंने आप को, हालात को 
अपने आप को माफ़ कर दिया...
खुदा  मुस्कुराते हुए मेरे 
हाथ में हाथ थामे, 
मेरे रास्ते पर एक सुकून की दिया जलाए 
और फिर जमीन से आसमान के लिए 
रवाना हो गए, 
मगर वे जो माफ़ी की दिया जलाए 
वह सदियों से मेरा, आप का और 
पूरी दुनिया के कितने रास्ते को रोशनी दी 
और उसी वक़्त दुनिया जन्नत हो गई...









शर्त

सासों पे शर्त, आँखों पे शर्त 
धडकनों पे शर्त,कदमों पे शर्त....

ये खुदा,
ये कैसी है तेरी खुदाई, तू ही बता
मैं तो तेरा ही गुलाम, तेरा ही बंदा
कैसा है यह जिंदा रखने का अंदाज तेरा 
हर कदम मेरी शर्त और शर्त से भरा.....

जीने पे भी शर्त 
मरने पे भी शर्त 
उंगलियों पे शर्त 
अंगूठे पर शर्त 
चिट्ठियों पे शर्त 
ज़ुबानों पे भी शर्त 
ज़ज्बात पर शर्त 
खामोशी पर भी शर्त....

खो जाने पे शर्त 
मिलने पे भी शर्त 


शर्त ही शर्त 
हर घडी,हर मोड़ 
हर पल, हर पग
सिर्फ शर्त ही शर्त....

वाह ! रे खुदा, 
कैसी है तेरी दुनिया 
और कैसे इन्साफ, कैसी तजुर्बा 
कैसी है तेरी खुदाई और दुआएं यहाँ....

ये खुदा, 
तू  ही बता 
यह जिंदगी  है या है तेरा कोई नया मक़सद  
समझ नहीं आया यह तेरी अदा का शतरंज..

ये खुदा तू ही बता 
यह कैसी दुआ की बारिश है तेरी 
क्या है भूल और क्या खता है मेरी.... 

ये खुदा, 
तू ही बता....
कैसे जी पाती 
यह शर्तें जिंदगी 
कैसे निभाता कोई 
ऐसी मोहब्बत ,ऐसी खुदाई....

ये खुदा, 
तू ही बता 
यह था मोहब्बतें शर्त तेरी 
या शर्तें मोहब्बत कोई....

कलियों पर शर्त 
चमन पर शर्त 
तारों पे शर्त 
चण्द्रमा  पर भी शर्त 

रात पर शर्त 
सेहर पे भी शर्त 
तितलियों पे शर्त 
भौरों पे भी शर्त....

थोड़े ही साँसे बाकी है, 
थोड़े ही धड़कन बचे हैं 
आखिर पडाव है मेरे खुदा 
तूने दे दिया है हर शर्त की दुआ 
मकसद तेरा पूरा हो गया
मौत भी खडी है यहां  देखता हुआ 

पहला और आखिरी  यह एक शर्त है मेरा 
खुद एक बार खुदाई से तू बाहर तो आ जा 
मेरी नजरिए में खुद को तरस जा 
खुद्दारी तेरा वहीँ छोड़ के  आ जा...

ये खुदा, 
मेरी एक ही ख्वाईश है आखिरी साँस से
एक ही शर्त, एक  ही अर्जी है तेरे दरबार पे

एक बार, सिर्फ एक बार तू आसमान से 
ज़मीन पे उतर  के आ जा 
सिर्फ एक दिन,सिर्फ एक ही बार
 तू  जी ले मेरे जैसा 
और मुझे एक बार ही जीने दे 
निसर्त, बेबाक, बेहिसाब ,तेरे जैसा 
साँस लेने दें अपनी मर्जी से 
मोहब्बत कर लेने दें अपने आप से 
शायद  तू  तभी समझ पाएगा 
खुदा की खुदाई पर ना सही 
तू भी हो जाएगा  फिदा 
देख कर तेरी ही अपनी अदा...

यह खुदा, तू ही बता 
सोच लें यह अदा, 
यह इंसाफ तेरा होगा 
सब से अलग और सब से जुदा...





Saturday, 18 October 2025

एक शिकायत, एक अमानत

सुना है आप आज इस नगर में आए हैं 
सुना है आप को बुद्धत्व मिला है 
और आप सिद्धार्थ गौतम से बुद्ध हो गए 

सुना है आपने बहुत कुछ पाया है 
बहुत कुछ खोया भी है...
किसी से पूछा मैंने 
क्या पाया बुद्ध ने 
क्या खोया सिद्धार्थ गौतम ने...

शायद कोई आप का अनुयायी होगा 
आप को बखूबी समझने वाला होगा 
या आप का कोई शिष्य होगा...
उस ने कहा, 
गौतम ने घर, परिवार, राज्य छोड़ दिए हैं 
ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, मोह, घृणा पार कर पाए हैं 
वह जो कपिलवस्तु के कुमार थे 
सिद्धार्थ गौतम से बुद्ध हो गए हैं...

खोज लिए मानवता के हर दुख के कारण 
पा लिए विधाता के अनमोल वरदान 
छोड़ चले सारे रिश्ते, सारे बंधन
मिटा दिए सारे फासले, सारे उलझन...
कोई चिराग ढूंढ पाए हैं 
सिर्फ अपने ही नहीं, सारे संसार के लिए 
दुख, दर्द मिटाने को निकल गए थे 
वह जो कभी सिद्धार्थ गौतम कहलाते थे 
वह अब बुद्ध बन गए, संत हो गए....

सुन रही थी मैं उनसे आप के व्यस्था, 
आप के संघर्ष की कहानी, साधना की गाथा 
केवल राज्य से नही ,राजा से नहीं 
पिता, माता,परिवार से नहीं 
पाखंड रूढ़िवादी धर्मान्धता से नहीं 
आपने ने तो संघर्ष किया है 
अपने आप से, मानवता के सारे 
दोष, सारे कमी, सारे दुखों के जड से 
तब जाकर तो आप संत बने  हैं 
सिद्धार्थ गौतम से बुद्ध हो गए हैं...

यह बुद्ध होना कोई आसान नहीं 
रोज रोज तो छोड़ो एक रोज़ भी नहीं ....

यह मैं कह रही हूँ गौतम, सिर्फ मैं कह रही हूँ, 
तुम्हारी यशु,तुम्हारी यशोधरा कह रही हूँ...
आप सारे संसार के लिए बुद्ध हो चुके हैं 
फिर भी यह  यशु की दिल की गहराई में 
एक कोना अब भी ऐसा ही रह गया है 
जहाँ आप पहले दिन जैसे 
सिद्धार्थ, गौतम ही रह गए हैं....

आप के सिद्धि कोई मामूली प्राप्ति नहीं 
सदियाँ बीत जाती है बहती हुई 
फिर भी लोग बुद्ध नहीं हो जाते हैं 
त्रस्त होकर जीवन से तो कई लोग चले जाते हैं 
घर, परिवार, राज्य छोड़ देते हैं 
मगर आप तो निकले थे स्वयं को ढूंढने 
किसी से त्रस्त होकर नहीं, ज्ञान की खोज में 
जो ज्ञान केवल सिर्फ़  आपके नहीं,
दुनिया के हर व्यक्ति के हो जाए 
और  हर किसी के पथ पर दिया जलाए 
और  हर  एक इन्सान को राह दिखाए...

आज आप को क्या ही बधाई देगी 
यह यशु,या यशोधरा आप की 
आप तो बुद्ध हो गए, 
सारे सुख दुख से परे हो गए 
यहीं एक दिया रख दिया है मैंने, 
आप के पथ के लिए ....
और इस दिया के अखिर लॉ के साथ 
कह देती हूँ आज ,
जो एक ही गिला है मेरी आप से 
कभी जो गौतम सिद्धार्थ होते थे, उन से...

मैं तो कोई गैर नहीं थी,
थी तो वही यशु आप की...
क्यूँ निकल गए आप  रात के सन्नाटे में 
कहकर जाते तो क्या होता मुझे
सिद्धि के मार्ग में क्या मुझे 
बाधा ही पाते !.....

        Xxxxx 

कोई आकर कहा  है मुझे 
आज कपिलवस्तु में बुद्ध आए हैं 
जन जन  जा रहे हैं मिलने उन्हें 
गौतम बुद्ध से आशीष पाने 
बुद्ध ने भी आप को बुलाया है...
"चलें आप भी उन के आशीष लेने "...

कहा मैंने फिर सज्जन से 
कहे आप फिर यह बुद्ध से 
"यशोधरा नहीं आएगी उनको मिलने 
मिलना चाहेंगे तो यहीं मिलेंगे..."

              Xxxxx
"भिक्षां देही" के आवाज सुनके
देखा मैं उन को बाहर आके 
वही सिद्धार्थ गौतम ही तो थे 
द्वार पर भिक्षु होकर खडे थे 
ज्ञान की ज्योति में झलक रहे थे 
सिद्धार्थ गौतम से बुद्ध हो गए थे....

"यशोधरा मैं...कभी आप जिसे यशु कहते थे 
सखा थे प्रभु,आज से आप मेरे गुरु हो गए "

क्या भिक्षा दूँ मैं आज आप के थाली में?
अखिर अमानत भेंट दी मैंने 
राहुल को आप को सौंप कर आज 
भेंट कर मेरी अखिर अमानत 
और दिल से बसा हुआ मेरी अखिर शिकायत 
मुक्त हो गई मैं अपने आप से  आज....







Thursday, 16 October 2025

क्या लौटाने आए हो?....

कुछ सामान देने आए थे तुम 
कुछ कपड़े  ,कुछ जुते ,  कुछ जेवर 
कुछ किताबें ,कुछ दस्तावेज
कुछ सामान लौटाने यहां थे आज तुम..


मगर वह कैसे वापस करोगे तुम 
जो लम्हें गुजर गए...
वह यादें जो किताबों के मुडे हुए 
पन्नों पर अटक गए हैं 

वह कैसे वापस करोगे जो खतों के 
कुछ मजमून में मिटा मिटा  है ...

उस वक़्त को कैसे लौटा सकोगे 
जिसमें एक मुस्कान अभी भी बाकी है 
और कुछ अश्क अभी भी
 पलकों पर छलक रहे है ..

लौटा सकोगे तो यह सब लौटा दो 
लौटा दो मेरे कुछ साँसे जो अभी भी 
तुम्हारें अंदर बाकी है...
लौटा सकते हो लौटा दो उस चौदवी के 
चांद के रोशनी , जो हम महसूस किए हैं 
लौटा सकते हो तो  लौटा दो 
वह नदी के किनारे पर बहती हुई हवा 
जहाँ हम कुछ घडी कभी बैठे थे 
लौटा सकते हो तो लौटा दो 
वह तारों के महफिल को जो 
आज भी यहां आते हैं 
वह ग़ज़लों के रूहानी रातों को
जो अब भी रुला देते है..
लौटा सकते हो तो लौटा दो 
वह खयाल, वह ज़ज्बात जो हम तुम पर 
और तुम हम पर खर्च किए हैं...

ये सब लौटा सकोगे???
 फिर नहिं तो क्यों और क्या लौटाने 
आए हो आज इधर ?????...

रख लो अपने पास 
वह कुछ गिने चुने साँसे हमारे
जो तुम्हारे पास हम रख आए हैं 
रख लो वह हंसी के कुछ झलक 
जो तुम्हारे पास हम छोड़ आए हैं....
रख लो हमारे कुछ धड़कनें 
जो हम तुम्हें दे चुके हैं 
रख लो हमारे कुछ आँसू जो अब भी 
तुम्हारे पलकों पे छलक रहे हैं...

शायद यही तुम्हारे लिए हमारे अंतिम उपहार 
रख लो यह खत,यह ज़ज्बात तब तक 
जब शायद किसी और जहां में हम तुमसे मिले और एक दूसरे के एहसान नहिं 
एहसास लौटा सकें....


बंटवारा

कभी कभी घरों में, परिवारों में 
दरारें पड जाते हैं 
बंटवारे हो जाते हैं 
आंगन के, जायदाद के 
 यहाँ तक बुनियादी रिश्तों के भी ...

कभी कभी तो सरहदों के भी 
बंटवारा हो जाता है 
नदी के पानी के भी बंटवारा हो जाता है 
आसमान तक बाद नहीं पडता बंटवारे से...

मगर कुछ एहसास के बंटवारा कैसे होगा 
कुछ सांसों के बंटवारा कैसे होगा 
कुछ वक़्त जो  बीत गया 
उसका बंटवारा कैसे होगा 
कुछ यादें जो दिल की किसी कोने में 
खामोशी से चुप हो गए 
उनके बंटवारा कैसे होगा....

जो देवकी की कोख है 
उसका बंटवारा कैसे होगा 

जो बासुदेव के आंसू हैं 
उनके बंटवारे कैसे होगा...

जीवन कोई बंटवारे के मोहताज नहीं 
उसके हर पल अलग ही है 
हर एहसास अपने आप में पूरी है 
देवकी अपने कोख से महान है 
यशोदा अपने ममता से...

बंटवारे की कोई जरूरत क्या है 
कोई क्या बांटेगा किसी के 
एहसास को, साँसों के जज्बातों को ...

यह कोई जायदाद या जमीन तो नहीं हैं 
ना कोई कीमत की मोहताज 
इनके बँटवारे कैसे हो सकता है...
यह जो एहसास की दुनिया है 
यह अपने आप में पूर्ण है...
चाहे वह देवकी की कारागार में 
जन्मे कृष्ण के पहला साँस हो 
या यशोदा के आंगन में खेलता हुआ 
कान्हा के पहला शरारत हो...
इनके कैसे कोई बंटवारा करे 
कृष्ण तो एक है, जीवन के स्रोत तो एक ही है 
फिर क्यों यहाँ बंटवारे की बात होती है???

Wednesday, 15 October 2025

वसीयत

घर के दहलीज पर बैठक है आज 
सब लोग आ चुके हैं 
दोस्त, रिस्तेदार, बच्चे सब बैठे हुए हैं 
डॉक्टर साहब अपने मोहर लगाएंगे 
मेरे होश आवाज ठीक है 
वकील सारे दस्तावेज तैयार करेंगे...
आज वसीयत बनाने की तारीख तय हुआ है...

किस को कौनसा घर, किस को कौनसा गाड़ी 
किस को कौनसा जायदाद दिया जाएगा 
कौन अलमारी में रखे हुए जेवर और पैसे लेगा 
किसको मिलेगा घर के आंगन, 
और किस को लॉन 
किस को कितना जमीन मिलेगा 
किस को कौन सा मकान....

ये सारे लिखे जाएंगे इस में, 
गवाह और  डाक्टर दस्तखत देंगे, 
वकील साहब मुहर  लगाएंगे...
जीवन का एक अखिर दायित्व है यह.
आज हो जाएगा मेरी वसीयत तैयार....

मगर घर के एक कोने में, 
एक बंद लिफ़ाफ़े में कुछ पुराने खत पडे हैं 
कुछ नज्म किसी पुराने डायरी में लिखे रखे  हैं 
कुछ पुराने क्यासेट  रेकॉर्ड प्लेयर के पास  हैं 
जिस में जमाने पहले के कुछ अफ़साने हैं..
लाइब्रेरी में आधे फटे आधे भीगे
 कुछ किताबों के पन्ने हैं....

यह सब के अंदर एक रूह के कुछ साँसे हैं 
कुछ अधूरे सपनों के खूब सूरत परछाई है, 
कुछ बेमिसाल खयाल है धडकनों के 
कुछ पुराने एल्बम के पन्ने में 
कुछ  खोए हुए अजीज धुंधले चेहरे हैं...
कुछ खूबसूरत लम्हें  हैं जिसे दिल ने 
तहखाने में बड़े प्यार से बर्षों से सजा रखा है...

ये किस के हिस्से में लिख दूँ?
किस वसीयत में लिख पाऊँ
इनके हकदार कौन हैं....
इसके ना कोई आज गवाह है 
ना  है कोई वकील 
ना कोई डॉक्टर इस पर मुहर लगा सकते हैं 
ना है कोई दावेदार मोहकिल...

शायद यह वसीयत में मैं कुछ लिख न पाऊँ 
और समय के समझ के लिए ही छोड़ जाऊँ....

Sunday, 12 October 2025

भरोसा

अर्से  पहले एक शाम मेरे कमरे में आयी 
कुछ खयाल और सवाल मेरे पास छोड़ गई .. 

महीनों लगे सवालों के जवाब ढूंढने 
वक़्त लगा वह खयाल को समझने 
फिर एक सुबह हमने तय किया 
वह शाम का  जो आभार रह गया 
वह सवाल का जवाब दे दिया जाए 
और वह खयाल का कद्र किया जाए ...

शायद वहीँ पर वह सुबह ने  शाम से
पहला मुलाकात कर लिया 
जिंदगी के साथ भी और जिंदगी के बाद भी 
कुछ सांसें साझा करने का वादा कर लिया...

वक़्त वहीँ ठहरे देखता रहा, 
शायद अन्दर कुछ बदल सा गया 
वही मुलाकात, वह घडी ,उस जगह 
कुछ एहसास को "भरोसे" में बदल  दिया...

हर एक वादे के पीछे एक वादा रह गया 
हर साँस ,हर वह भरोसे  का मंजर  हो गया...

फिर रास्ते में एक तूफान आया, 
वह घर बिखर गया 
कश्ती डूब गया 
और सपना टूट गया ....

वह तूफान क्यूँ, कैसे  आया 
कुछ याद नहीं रहा, 
मगर तूफान जाने के बाद लगा 
अन्दर कुछ टूट गया, कुछ खो दिया...

वह क्या टूट गया, 
वह क्या पिछे छूट गया 
क्या कश्ती के साथ साथ खो गया 
शायद वह मेरा " भरोसा " ही था...

तूफान क्या दिया, क्या लिया पता नहीं था 
मगर  एक गहरा ज़ख्म जेहन में रह गया था 
सारे अल्फाज़ मिट चुके थे 
साँसे कैसे अजीब सी चुप हो गए थे...
जीवन  फिर अपने पैरों पर  खडा हुआ 
वक़्त तो ज़ख्मों के इलाज कर लिया 
मगर लाख कोशिश कर के भी हार गया 
वह टूटा हुआ "भरोसा" जोड़ न पाया...

भरोसा, कोई दस्तावेज तो नहीं था 
उसे वक़्त बदल देता
वह एक बेहद नाजुक आईना था 
टूट गया एक बार, बिखर गया  
शायद वह फिर जुड़ नहीं पाया 

सब कुछ तो ऊपर से ठीक हो जाता है 
जीवन पटरी पर फिर चलने लगता है...
मगर कहीं अंदर से कुछ टूट जाता है 
कुछ यादें बिखर जाते हैं 
कुछ वादे अपने रास्ते भूल जाते हैं 
कुछ भरोसे पीछे छुट जाते हैं.....

वह शाम आज भी वह सुबह  का इंतजार में 
दिल की गहराई  में कुछ  ढूंढ रही है 
कुछ खोए हुए "यादें" और टूटे हुए "भरोसे "
को तलाश रही है...




Saturday, 11 October 2025

दो प्याले चाय

गाड़ी में धीमी धीमी आवाज में जगजीत जी के " यह जो जिंदगी की किताब है, यह किताब भी क्या किताब है " ग़ज़ल चल रही थी.  पिछले रात से बारिश बेहिसाब हो रही थी.  जैसे मानो आसमान ठान रखा था की इंसानों के फैलाए हुए सारे गंदगी धरती से साफ़ करने का. मैंने signal पे गाड़ी रोकी और window shield और सामने के कांच के ऊपर गिरता हुआ बारिश के बूँदों को निहारती रही.  जैसे लगा अभी अभी सावन ने कोई मायूस संदेश भेजा..
  रेड लाइट ग्रीन में तब्दील हो गई और सारे गाड़ियों के बीच में मेरी गाड़ी भी चल पडी ,मानो जैसे  conveyor बेल्ट में suitcases चुपचाप अपने लाइन में चल पड़े है...पता नहीं कब घर के पास वाले signal पर पहुंच गई.  गाड़ी में ब्रेक लगाई तो एहसास हुआ की इस बीच में कई और गजलें भी सुन चुकी हूँ..."तमाम शहर के रास्ते सजा दिए जाएं, हम आ गए हैं, कांटे बिछा दिए जाए ", " डूबना है तो इतने सुकून से डूबो की आसपास के लहरें को भी पता न हो "...फिर  " रफ्ता रफ्ता वह मेरे हस्ती का सामान हो गए "... गाड़ी अपने parking में लगा के मैं ऊपर चली गई, शायद बारिश के बूंदें अब भी  मेरी आत्मा को भीगे रखे थे...
       दरवाजा खोली,  लगा अंदर  से कैसी गिली मिट्टी कि खुशबु आ रही थी, मगर बारिश तो रात से इतनी हो रही थी की उस में  कोई रहम नहीं बची थी की वह कोई गिली मिट्टी की खुशबु की परवाह करें....  खैर, अब वह बारिश की ठंडक कम करने को चाय पिया जाए.  मैं कुछ और सोचते सोचते kitchen में पहुंच गई, मेरे favorite ग्लास वाली चाय की प्याली में पानी measure कर के saucepan में डाली, कुछ चाय पत्तियों मिलाई  अदरक, काली मिर्च की कुछ टुकड़े उस पानी में बिखेर दी, एक छोटी चम्मच चीनी डाल कर थोड़ी उबाल दी और glass के प्याले में छान ली चाय, थोड़ी milk powder मिला दी, बस हो गई चाय तैयार.  बर्षों से ऐसी ही चाय बनाने की आदत पड़ गई थी अब, जैसे की सामने कोई शख्स दूर से भी आ जाए  गाड़ी की break पे reflexly पैर आ  जाता है...जिंदगी भी ऐसी एक reflex ही है, जैसे जीने की आदत पड जाती है....

   मैं recliner सोफ़े के ऊपर आके बैठ गई, बारिश के धुन के साथ कुछ फैज के नज्म सुन ने को रिकॉर्ड player on की और चाय पीते पीते बारिश को साथ देते देते " यह काग़ज़ की कश्ती, यह बारिश का पानी..." गुनगुनाने लगी... यहां इस के अलावा कोई और शब्द ही न था....

   दरवाजे से घंटी की आवाज आई,  समझ नहीं आया ऐसे बारिश में कौन आ सकता... फिर वही पुरानी आदत...घर के किसी भी हिस्से से दरवाजे से घंटी आयी तो रोबोट जैसे दरवाजे के पास आके खोल देना, चाहे घर में कोई और हो ना हो दरवाजा खोलना मेरा ही काम का हिस्सा.  कुछ चीजें समय के साथ अपने अंदर ऐसे आ जाते हैं, मानो वह हमारे जहन के हिस्से बन जाते हैं, मेरे लिए घंटी सुनकर दरवाजा खोलना ऐसे ही एक हिस्सा बन गया था... दरवाजा खोल दिया...

आंखों को विश्वास नहीं हुआ " अरे अमित, आप...कैसे??? लफ्ज अटक गए थे आधे में.... आओ,आओ अंदर आओ, तुम्हारे raincoat से पानी  के धार छुट रहे थे... raincoat के बाबजूद भी तुम आधे भीग गए थे... मगर पता है मजे की बात क्या है...चालीस साल हो गए थे, हमें मिले हुए, मगर हम एक दूसरे को देखते ही पहचान गए... खुदा की रहम की क्या कमाल निशान है...चालीस साल में तो इंसान कई दफा मरकर भी पैदा हो सकता था...और यहां  हम दोनों में इतना बदलाव की बाकी तो थी की हम एक दूसरे को आसानी से पहचान पाए...समय और तकदीर ने कुछ बदलाव तो जरूर लाया होगा...तुम्हारे बाल कुछ ज्यादा ही सफेद हो गए थे और तुम पहले से थोड़े कमजोर हो गए थे और मेरे आंखें अभी बिना चश्मे के साफ़ नहीं देख सकती थी...
   पता नहीं मैंने तुम से कैसे कोई सवाल नहीं की, तुम यहाँ कैसे, इस शहर में, मेरे घर का पता कैसे मिला, कहाँ से मिला, मेरा खबर किस से मिली...यह चालीस साल में क्या क्या बदल गया...कुछ भी नहीं सवाल की मैंने... तुम्हें अंदर बुलाई, सोफ़े पर बैठने को कहा, तुम्हारे raincoat balcony में एक खुन्टि पर टांग दी, तुम्हें एक तौलिया बढ़ा दी,हाथ मुह पोंछ लेने को, बारिश जो तुम्हें भिगा दिया था...
   तुम्हें बैठने को कहा और मैं तुम्हारे लिए चाय बनाने चल दी kitchen में.  तुम्हें यह भी नहीं पूछा अब तुम चाय में चीनी लेते हो या नहीं, दूध कितना या milk powder डालूँ, अदरक और काली मिर्च तुम्हें पसंद है या नहीं अब...कुछ भी नहीं पूछा...चालीस साल हो गए थे Amit, चाय क्या चीज़ है, इंसान तो इंसान को पहचानने के नजरिए भी बदल देता है  एक दिन में, और यहां चालीस साल के बाद के बात कर रहे हैं...मैंने ऐसे ही चाय बनाई जैसे मैं रोज बनाने की आदत डाल दी हूं...मैं चाय बना रही थी, तुम drawing रूम के इधर उधर थोड़े देखे, बुक rack में, musical कैबिनेट में थोड़ी नज़र डालें और उठ कर balcony के garden chair पे बैठ गए... दूर तक बारिश के बूँदों के आवाज के अलावा बाकी सन्नाटा था...चाय बन गई थी.  मैं बीच के मेज पर चाय की tray रख दी, यह भी नहीं पूछा तुम से पानी दूँ या biscuit भी दूँ चाय के साथ..जैसे कुछ पूछना था ही नहीं... तुम चाय पीने लगे...कुछ बोलना चाहते थे शायद...चालीस साल हो गए थे, कहने को तो बहुत कुछ होगा, हर रास्ते के कई किस्से होंगे तुम्हारे पास भी और मेरे पास भी...पता नहीं कैसे कुछ सुनने सुनाने को मन नहीं किया, मैंने शायद खामोशी से तुम्हें देखती रही, चाय की प्याले से उठते धुएँ से शायद सारे गिले, शिक्वे पिघल गए थे, अदरक और काली मिर्च की सुगंध के  साथ बर्षों के जमे हुए सवाल, जवाब और कड़वाहट घुल कर हीना  और चंदन के कुछ अजीब सी खुशबु बन कर घर और मन को महका दी थी...मेरे आंखों से शायद तुम पहली बार पढ़ लिए थे, अब माजी को नहीं इस लम्हे में जीवन को तराशा जाए...पहली बार लगा चालीस साल के बाद तुम मुझे  और  जिंदगी  को पहले से कहीं बेहतर समझ पाए...

   चाय ख़तम हो गई थी...बारिश भी कम हो रही थी...तुम्हारे जाने का वक़्त हो रहा था...मैंने तुम्हारे raincoat पोंछ दी थी,कुछ देर एक खामोशी बीच में आ कर बहुत कुछ कह गई थी...मैंने तुम्हारे पैर छुने को झुक गई और शायद मेरी आंखे भर आयी थीं...तुम ने मेरे आंखें पोंछ ने को हाथ बढ़ाते बढ़ाते अटक गए और हम फिर कुछ देर सन्नाटे में jagjit जी को सुनते रहें..." लंबी दूरी तय करने को वक़्त तो लगता है....गांठ अगर पड जाए तो  फिर रिश्ते हो या डोरी, लाख कोशिश कर लो  खोलने को,   वक़्त तो लगता है,...हमने इलाजे  ज़ख्मों दिल के  ढूंढ लिया  है लेकिन...गहरे ज़ख्मों को भरने में वक़्त तो लगता है  ...नए परिन्दों को उड़ने में वक़्त तो लगता है..."

   तुम उठे, मैं दरवाजे तक तुम्हें छोड़ने को आई और तुम बिना पिछे मुड़े सीढ़ियों से नीचे उतर गए...मैं वापस घर के अंदर आई, कुछ देर balcony में जाकर बैठी और वे दोनों खाली चाय प्याले को देखती रही... जैसे चालीस साल के हर लम्हें उस गरम चाय के प्याले से उठे धुआं से पिघल कर चट्टानों की तरह मेरे रूह में मिल  जा रहे थे...वही हीना और चंदन के महक के साथ...बाहर बारिश लगभग रुक गयी थी...बादल के कुछ बूंदे सामने के पिपल के पत्तों से खेल रहे थे और रात की रानी की हर पत्ते कुछ ज्यादा ही रंग बिखर रहे थे...दो garden चेयर के बीच के मेज पर दो खाली चाय के प्याले खामोशी से कुछ कुछ कह रहे थे..

   बाहर कोई घंटी बजाया, मेरे आंखें खुल गईं, देखा तो " रसीद टिकट "  पढते पढते पता नहीं चला था कब आंख लग गई थी...दरवाजा खोली, दरवाजे पर खडा इस्त्री वाला बोला कबसे घंटी बजा रहा था, मैंने उस से कपड़े गिन के रख लिये, पैसे दिए और balcony में जाके बैठ गई...मेज के ऊपर दो नहीं एक ही चाय की खाली प्याला था...